बाहर दुनिया चुप और खाली है,
पेड़ बिना पत्तों और फूलों के खड़े हैं।
ठंडी हवाएँ सुनसान गलियों में बहती हैं,
पर अंदर, गर्माहट और सुकून है छाई।
सोचें छुपे प्रकाश में फूल बनकर खिलती हैं,
कविता दिलों में रातभर पलती हैं।
खिड़कियाँ दूर पेड़ों की मौनता पकड़ती हैं,
अंदर, सृजन स्वतंत्र रूप से विचरता है।
बाह्य ब्रह्मांड में शिशिर का शासन है,
पर अंदर, सपनों में वसंत जागता है।
हर पंक्ति में उम्मीद के रंग हैं,
एक गुप्त उद्यान, शांत और दिव्य है।
यादों के पत्ते, इच्छाओं के फूल,
हृदय को हल्की गर्मी देते हैं।
प्रकृति चाहे सो रही हो और समय का इंतजार करे,
अंदर, आत्मा अनंत रूप से गाती रहती है।
जी आर कवियुर
26 12 2025
(कनाडा, टोरंटो)
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