Wednesday, October 14, 2026

ख़ामोशियों के दरमियाँ(पारंपरिक हिंदुस्तानी ग़ज़ल)

ख़ामोशियों के दरमियाँ
(पारंपरिक हिंदुस्तानी ग़ज़ल)
कभी ख़ामोश रहकर भी बहुत कुछ कह गए हम,
दिल में छुपे हुए दर्द को सह गए हम।

जिन्हें अपना समझकर दिल में जगह दी थी,
उनकी ख़ातिर हर सितम चुपचाप सह गए हम।

वफ़ा की राह में अपना सब कुछ लुटाकर,
आँखों में अश्क लेकर भी बह गए हम।

वो समझ न सके दिल की सच्ची कहानी,
अपने ही दर्द को ख़ामोशी से कह गए हम।

जिनकी ख़ुशी के लिए हर दर्द सहते रहे,
उनकी बेरुख़ी के साए में रह गए हम।

उम्मीद थी कि वो एक दिन समझेंगे हमें,
उम्मीद के सहारे ही उम्र भर रह गए हम।

जी. आर. के दिल की कहानी कौन समझे,
ग़ज़लों में अपने दर्द को कह गए हम।

 ज़ी आर कवियुर 
13 10 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी याद दिलाती हैं(हिंदुस्तानी ग़ज़ल)

तेरी याद दिलाती हैं
(हिंदुस्तानी ग़ज़ल) 
शहर की गलियाँ तेरी याद दिलाती हैं,
दिल की तन्हाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

तेरे क़दमों के निशाँ ढूँढ़ता हूँ आज भी,
सूनी राहों की परछाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

चाँद को देखूँ तो तेरा चेहरा याद आए,
रात की गहराइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

फूल खिलते हैं तो महक उठता है दिल मेरा,
मौसम की अंगड़ाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

हँसता रहता हूँ मगर दिल उदास रहता है,
बीते लम्हों की रुसवाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

जी. आर. के अशआर में छुपा है दर्द तेरा,
मेरी ग़ज़ल की तन्हाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

रचना
जी. आर. कावियूर
12 10 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

Thursday, October 8, 2026

कौन जानता है (ग़ज़ल)

कौन जानता है (ग़ज़ल)
टूटे दिलों की अंजुमन का हाल कौन जानता है,
चारों तरफ़ बिखरी तन्हाई का सवाल कौन जानता है।

आँखों में ठहरा हुआ दर्द दिखता तो है सभी को,
मन के भीतर छिपा कोई ख़याल कौन जानता है।

हँसते हुए चेहरों को सुखी मान लेते हैं सब ही,
किसके हृदय में कितना मलाल कौन जानता है।

कुछ लोग समय के साथ बदल जाते हैं चुपचाप,
रिश्तों में आएगा कब ज़वाल कौन जानता है।

जिसे अपना समझकर मन ने जीवन भर चाहा था,
वही बन जाएगा एक दिन सवाल कौन जानता है।

कितनी रातें जागकर गुज़रीं उसकी यादों में,
आँखों से पूछेगा कौन यह हाल कौन जानता है।

‘जी आर’ की ख़ामोशी का कोई हाल कौन जानता है,
दिल में छिपा बैठा उसका सवाल कौन जानता है।


जी आर कवियुर 
07 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

Tuesday, October 6, 2026

अभी लिखा जाना बाकी है

अभी लिखा जाना बाकी है

बीते पन्नों को फाड़कर मत फेंको,
उनमें गुज़री राहों के निशान हैं;
मिटे हुए अक्षरों के बीच भी
जीवन ने कुछ अर्थ छिपाए हैं।

जो तुम्हारी कहानी को खत्म समझते हैं,
उन्हें क्या पता—कहानी अभी जारी है;
बंद दरवाज़ों के उस पार भी
अनखुले आकाश तुम्हें बुलाते हैं।

कल ने जहाँ सीमाएँ खींची थीं,
कल के बाद नई राह निकल सकती है;
जिस पल को अंत समझकर रुक जाओ,
वहीं से शुरुआत जन्म ले सकती है।

इसलिए अपनी कलम मत छोड़ना—
अंतिम पंक्ति अभी लिखी नहीं गई;
जीवन नाम की इस किताब का अगला पन्ना
तुम्हारे हाथ में है—इसे तुम ही लिखोगे।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

कल की दस्तख़त

कल की दस्तख़त

बीते कल के घावों को गिनते हुए नहीं,
आज की दहलीज़ पार करनी है;
बीते समय की राख से ही
एक नया सपना गढ़ना है।

भविष्य कोई लिखी हुई तक़दीर नहीं,
हर कदम पर लिया गया फैसला है;
हाथ में कलम न हो फिर भी जीवन
हर पल अपनी एक पंक्ति लिखता है।

भटकी हुई राहें भी व्यर्थ नहीं थीं,
उन्होंने भी कोई दिशा दिखाई;
जिन पलों को हमने हार समझा था,
उन्होंने ही जीत की नींव बनाई।

इसलिए कल के आने का इंतज़ार मत करो,
उसकी पहली पंक्ति आज ही लिख दो;
जब समय पूछे—तुम कौन थे?
तुम्हारा जीवन ही तुम्हारी दस्तख़त हो।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

गिरने का सबक

गिरने का सबक

ऊँचाइयों की ओर बढ़ते हुए एक दिन,
एक कदम फिसला और नीचे आ गिरा;
टूटे सपने नहीं थे उस पल—
अपने बारे में कुछ भ्रम टूटे थे।

राह किनारे जब अकेला पड़ा था,
साथ चलने वाले कई लोग दूर हो गए;
उस खामोशी में, जहाँ कोई हाथ नहीं था,
अपने ही हाथों की ताकत पहचान ली।

गिरने ने दर्द दिया, मगर सिखाया—
ऊँचाई ही जीवन का पैमाना नहीं;
गिरी हुई मिट्टी में भी बीज उगते हैं,
और वहीं से जंगल जन्म लेते हैं।

अब गिरने से डरने की ज़रूरत नहीं,
जब हर टूटन एक सबक बन जाए;
जहाँ गिरा था, वह हार की निशानी नहीं—
वहीं से उठने का प्रमाण है।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

दूर एक प्रकाशस्तंभ

दूर एक प्रकाशस्तंभ

समुद्र-सी डगमगाती जीवन की राह में,
जब दिशा कहीं दिखाई नहीं देती;
लहरों के पार एक रोशनी झिलमिलाती है—
दूर एक प्रकाशस्तंभ पुकारता है।

चारों ओर अँधेरा गहराता जाए,
हवाएँ चाहे कितनी भी तेज़ चलें;
थकी हुई जीवन-नाव के भीतर
बस उम्मीद ही बुझने से इनकार करती है।

मंज़िल भले बहुत दूर दिखाई दे,
वह रोशनी फिर भी राह दिखाती है;
जिस किनारे का भरोसा भी नहीं,
दिल फिर उसी ओर चल पड़ता है।

कुछ रोशनियाँ पाने के लिए नहीं होतीं,
वे बस राह भटकने से बचाती हैं;
जीवन चाहे अँधेरे में डूबा रहे—
जहाँ उम्मीद है, वहीं सवेरा है।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

बंद मुस्कान

बंद मुस्कान

होंठों पर एक मुस्कान ठहरी रहती है,
फिर भी आँखों में कुछ बारिशें बाकी हैं;
हँसी के पीछे छिपी खामोशी में
टूटे हुए सपने अब भी सोते हैं।

दुनिया के सामने रोशन खड़े रहकर,
भीतर का अँधेरा कोई देख नहीं पाता;
एक शब्द के इंतज़ार में बैठा दिल
कितनी अनकही बातें निगल जाता है।

समय सिखाई खामोशी की भाषा में
दर्द भी धीरे-धीरे आदत बन जाता है;
बंद पड़ी मुस्कान की चाबी खोजते-खोजते
आख़िर दिल खुद ही दरवाज़े तक पहुँचता है।

फिर उस मुस्कान को मुखौटे की ज़रूरत नहीं,
आँसुओं को भी छिपने का बहाना नहीं;
खुद को पहचान लेने का एक पल ही काफी है—
भूली हुई मुस्कान फिर से खिल उठने के लिए।


जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

Thursday, October 1, 2026

मनुष्य के भीतर का यात्री

मनुष्य के भीतर का यात्री

दूरियाँ तलाशते हुए जो समय बीता,
वह पैरों की धूल बनकर रह गया;
अनजाने शहरों से गुज़रता रहा,
फिर भी स्वयं से अनजान ही रहा।

एक अनदेखे द्वार की खोज में
भीतर कोई चलता रहा,
खामोशी की सँकरी गलियों में
पुराने सवाल जाग उठे।

आईने में दिखते चेहरे के पीछे
एक और चेहरा छिपा था,
दुनिया से अनसुनी आवाज़ में
वह मुझसे कुछ कहता रहा।

जब बाहर जाती सारी राहें थम गईं,
भीतर जाने की राह चमक उठी;
वहाँ पहुँचने के उस पल में
मेरे भीतर का यात्री मुस्कुरा उठा।

तब जाकर समझ में आया—
दुनिया घूम लेने से भी आगे
मनुष्य की सबसे लंबी यात्रा
स्वयं को खोज लेने का एक कदम है।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

एक पेड़ की छाँव

एक पेड़ की छाँव

राह किनारे अकेला एक पेड़,
धूप का सारा ताप सहता रहा,
राहगीरों के लिए चुपचाप
ठंडी-सी जगह बनाता रहा।

उसकी डालों पर पंछियों ने
कुछ पल के घरौंदे बनाए,
उड़कर दूर चले जाने पर भी
पंखों की सरसराहट छोड़ गए।

जब कोई थका हुआ पथिक आया,
उसने बिना पूछे अपना लिया;
नाम न जाना, देश न जाना,
फिर भी पत्तों ने सुकून दिया।

बरसात में बूँदों का भार उठाया,
गर्मी में तपन को सहता रहा,
अपनी थकान कभी न कहकर
जीवन भर छाँव देता रहा।

तब जाकर समझ में आया—
अकेले खड़ा होना तन्हाई नहीं;
अपनी तपिश भूलकर
किसी और के लिए शीतल बन जाना ही
जीवन को एक छाँव बनाता है।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

सत्य की ओर छोटी-सी राह

सत्य की ओर छोटी-सी राह

बड़ी-बड़ी राहों पर चलकर
मैं दूर बहुत निकल गया,
एक छोटी-सी पगडंडी ही
मुझे अपने भीतर ले गई।

चमकती दुनिया के बीच
बहुत कुछ सच-सा लगा,
आईने के सामने खड़ा हुआ तो
चेहरा ही एकमात्र साक्षी था।

दूसरों की तालियों के लिए
मैंने कई चेहरे ओढ़े,
अकेलेपन की उस घड़ी में
सारे मुखौटे उतर गए।

बिना पदचिह्नों वाली राह पर
एक उजली किरण सामने थी,
उसकी रोशनी का अनुसरण किया तो
मैं अपने ही भीतर पहुँच गया।

तब जाकर समझ पाया—
यात्रा दूरी घटाने का नाम नहीं,
अहंकार से सत्य की ओर
मुड़ता हुआ एक कदम ही
सबसे छोटी राह है।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

वह निशान जिसे समय मिटा नहीं सकता

वह निशान जिसे समय मिटा नहीं सकता

समय जिस राह से गुज़र गया,
उस पर कदमों के निशान मिट गए,
पर हृदय में अंकित एक एहसास
बारिश भी धो न सकी।

वर्षों ने रंग भले फीके कर दिए,
एक चेहरा अब भी साफ़ है,
पुराने गीत की किसी धुन में
एक पूरा दौर फिर जाग उठता है।

हवा में बिखरे वे ख़त
भले अपना पता भूल गए,
उनमें बसी स्नेह की गर्माहट
उँगलियों पर आज भी ठहरी है।

जीवन ने राह बदल ली फिर भी
वह स्पर्श कभी नहीं बदला,
दूरियाँ चाहे बढ़ती गईं,
रिश्ते का धागा नहीं टूटा।

अंततः समझ में आया—
समय देह का रूप बदल सकता है,
पर उस पल को कोई युग नहीं मिटा सकता
जिसने सच में आत्मा को छुआ हो।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

धूल जमे सपनों का कमरा

धूल जमे सपनों का कमरा

बंद पड़े एक दरवाज़े के भीतर
धूप भी आने से ठहर गई थी,
खिड़की की महीन-सी दरार से
बस एक किरण भीतर उतरी थी।

दीवार से लगी पुरानी अलमारी में
पीले पड़ चुके पन्ने थे,
अनछुई इच्छाओं के ऊपर
समय की उँगलियों के निशान थे।

कभी आकाश रचने वाला
एक चित्रफलक नीचे पड़ा था,
अधूरी रह गई यात्रा का
नक्शा तह करके रखा था।

धूल की महीन परत के नीचे
एक छोटी-सी मुस्कान चमकी,
उसी पल समझ में आया—
मरा सपना नहीं था,
बस उसे जगाने वाली आवाज़ खो गई थी।

जी आर कवियुर 
30 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Friday, September 25, 2026

नज़र आई है ( ग़ज़ल )

नज़र आई है ( ग़ज़ल )

मेरे अरमानों की ख़ातिर तू नज़र आई है,
दिल में छुपी थी जो, वही अब नज़र आई है।

तेरी यादों में बसी एक तन्हाई नज़र आई है,
सूनी रातों में तेरी परछाई नज़र आई है।

तेरे जाने से हुई दिल में जो रुसवाई नज़र आई है,
मेरी आँखों में मोहब्बत की गहराई नज़र आई है।

तेरे आने की ख़बर पाकर जो अंगड़ाई नज़र आई है,
सूखे होंठों पे फिर से मुस्कुराई नज़र आई है।

जी आर, तेरी ग़ज़ल में दिल की गहराई नज़र आई है,
हर एक मिसरे में तेरी ही परछाई नज़र आई है।


जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

खामोशी का जवाब

खामोशी का जवाब

एक सवाल बनकर आई आहट
होंठों पर ही ठहर गई,
उत्तर खोजती निगाहें
दूर कहीं देखती रहीं।

कहने को बहुत कुछ था,
फिर भी स्वर राह में खो गया,
अर्थहीन शब्दों से कहीं अधिक
मौन सच्चा लगा।

समय कुछ उत्तर ऐसे देता है
जिन्हें पूछना नहीं पड़ता,
बंद दरवाज़ों के उस पार
रास्ते स्वयं उजागर होते हैं।

जिसे खोना समझा था कभी,
वह किसी और रूप में लौट आता है,
और जब खामोशी लंबी हुई,
उत्तर भीतर ही जन्म ले चुका था।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

कदमों की आहट सुनता घर

कदमों की आहट सुनता घर

बंद पड़े दरवाज़े के उस पार
जैसे कोई गुज़र जाता है,
पुरानी लकड़ी की तख़्तियों के बीच
एक आहट धीरे से जागती है।

जब हवा शीशे को छूती है,
परदा हल्के से काँप उठता है,
और समय द्वारा भुला दी गई
एक शाम की ख़ुशबू फैल जाती है।

सीढ़ियों के मोड़ पर
अचानक एक परछाईं उभरती है,
ऊपरी द्वार के पीछे
एक सपना अब भी अनखुला है।

दीवार पर टँगी तस्वीर में
वह मुस्कान अब भी जीवित है,
और खाली पड़ी कुर्सी पर
किसी की मौजूदगी अभी शेष है।

कभी यहाँ गूँजी हँसी की
वह धीमी-सी प्रतिध्वनि,
आज भी गलियारे से होकर
किसी अनजानी राह पर चलती है।

रात गहराती है तभी
यह पुराना आशियाना जागता है;
कोई अदृश्य उपस्थिति
अंदर की गहराइयों को छूती हुई गुजरती है।

सुबह की रोशनी आते ही
सब फिर शांत हो जाता है,
फिर भी बीता हुआ समय
फ़र्श पर अपनी एक रेखा छोड़ जाता है।

लोग भले ही दूर चले जाएँ,
उनके स्नेह का स्पर्श
इन दीवारों के बीच
समय से संवाद करता रहता है।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

आँसू का बीज

आँसू का बीज

गालों से उतरती वह बूँद
जब चुपचाप धरती पर गिरी,
किसी अनदेखे पल में
धरती ने अपना हृदय खोल दिया।

जो कुछ कह न सके कभी,
वह मौन में घुलता गया,
टूटी हुई उम्मीदें
गहराई में सोती रहीं।

समय की तपती धूप में भी
वह नमी सूख न सकी,
अँधेरे की गहराइयों में
धीरे-धीरे जीवन जाग उठा।

फिर एक सुबह
सूखी डाल पर हरियाली लौटी,
और कभी झुका हुआ हृदय
फिर आकाश की ओर उठ गया।

तभी समझ आया—
विछोह का मौन भी
सृजन की शक्ति रखता है;
नीचे गिरी हर बूँद
रोशनी की ओर उठने का
एक स्वप्न सँवार रही थी।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

विस्मृति के उस पार

विस्मृति के उस पार

जिसे भूल जाना चाहा था,
वही मन में फिर उभर आता है,
जैसे धुंधली-सी तस्वीर में
रंग धीरे-धीरे जाग उठते हैं।

समय से सहलाए घावों पर
जब केवल निशान रह जाते हैं,
कहा न गया कोई एक शब्द
फिर से हृदय में गूँज उठता है।

जो राहें दूर निकल गई थीं,
वे स्मृतियों में लौट आती हैं,
जिन पत्थरों पर कभी चले थे,
वे भी परिचित स्वर में बोलते हैं।

कुछ चेहरे, कुछ पल,
जिन्हें विस्मृति में खोया समझा था,
अचानक हवा के झोंके बनकर
फिर सामने आ जाते हैं।

जिन आँसुओं ने कभी भिगोया था,
वे आज मोती बन गए हैं,
जो समय कभी पीड़ा लगा था,
वही आज एक सीख बन गया है।

भूल जाना मुक्ति नहीं,
स्मृतियों से शांति करना है;
और विस्मृति के उस पार
हमारी प्रतीक्षा में
हम स्वयं ही खड़े मिलते हैं।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

सोता नहीं वह दरवाज़ा

सोता नहीं वह दरवाज़ा

आधी रात भी बीत गई,
पर दरवाज़ा अब भी सोया नहीं,
हवा की उँगलियाँ आकर
धीरे से उस पर दस्तक देती हैं।

दहलीज़ के पास पड़ा है
किसी पुराने पदचिह्न का स्मरण,
जो कभी लौटकर नहीं आया,
उसकी परछाईं आज भी वहीं ठहरी है।

ठंडी पड़ी चाबी की दरार में
चाँद एक आँख बनकर ठहरता है,
और भीतर का सारा मौन
बाहर निकलने की राह खोजता है।

कितनी यात्राएँ देखीं इस दरवाज़े ने,
कितनी विदाइयाँ देखीं;
मुस्कुराकर जाने वालों में से
कुछ फिर कभी लौटे ही नहीं।

बरामदे का दीपक बुझ जाए फिर भी
यह दरवाज़ा आँखें नहीं मूँदता,
किसी के लौट आने का विश्वास
आज भी इसमें ठहरा है।

जब भोर की पहली किरण
दहलीज़ पर आकर गिरती है,
तब भी यह खुला नहीं, प्रतीक्षारत रहता है—
क्योंकि उम्मीद के कोई दरवाज़े नहीं होते।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Tuesday, September 22, 2026

बरसे नैना ( ग़ज़ल )

बरसे नैना ( ग़ज़ल )
बरसे नैना, तरसे जैसे बिखरे बादल की तरह
बिरहा में ढूँढूँ तेरे पदचिह्न, पागल की तरह

तेरी यादों के बादल दिल पे बरसते रहे
हम तड़पते ही रहे इक पागल की तरह

तेरे जाने से ये दिल हो गया कितना घायल
दर्द छुपता ही नहीं, कोई घायल की तरह

तेरी आहट की तलाश में भटकता है दिल
हर निशाँ दिखता रहा फिर भी ओझल की तरह

तेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखा
इश्क़ में जीते रहे तेरे कायल की तरह

जी आर, तेरी ग़ज़ल में वही तेरा ग़म है
दिल ने हर दर्द को लिख डाला बादल की तरह

जी आर कवियुर 
22 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर


Friday, September 18, 2026

പൂക്കളെ ചിത്രശലഭങ്ങൾ | फूलों को तितलियाँBilungal gazhal by GR kaviyoor

പൂക്കളെ ചിത്രശലഭങ്ങൾ | फूलों को तितलियाँ

Bilungal gazhal by GR kaviyoor 

പൂക്കളെ ചിത്രശലഭങ്ങൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു,
നിൻ ഓർമ്മകൾ എന്നെയും നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

फूलों को तितलियाँ सताती हैं,
तेरी यादें मुझे भी सताती हैं।

മൗനത്തിൻ താഴ്‌വരയിൽ തനിച്ചിരിക്കുമ്പോൾ,
പറയാതെ പോയ വാക്കുകൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

ख़ामोशी की वादियों में जब मैं तनहा होता हूँ,
कहे बिना रह गए लफ़्ज़ बहुत सताते हैं।


നിലാവിൻ ജാലകത്തിലൂടെ നിന്നെ തിരയുമ്പോൾ,
തിരികെ വരാത്ത രാത്രികൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

चाँदनी की खिड़की से तुझे जब ढूँढता हूँ,
गुज़र गईं जो रातें, बहुत सताती हैं।


വസന്തം പൂക്കളുമായി മുറ്റത്തെത്തുമ്പോൾ,
നീ തന്ന സമ്മാനങ്ങൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

जब बहार फूलों को लेकर आँगन में उतरती है,
तेरी दी हुई सौग़ातें बहुत सताती हैं।


തിരകളായ് തീരത്തെത്തും ഓർമ്മകളെല്ലാം,
പിരിയാതെ നിന്ന നിമിഷങ്ങൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

लहरों की तरह यादें जब साहिल से टकराती हैं,
तेरे साथ बिताई घड़ियाँ बहुत सताती हैं।

ജീ ആർ, ഹൃദയത്തിൽ കുറിച്ചുവെച്ച പ്രണയവരികൾ,
മായാതെ നിൽക്കുമ്പോൾ അവ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

जी आर, दिल में लिखी मोहब्बत की वो दास्ताँ,
मिटती नहीं, इसलिए बार-बार सताती है।

जब घड़ी रुक गई


जब घड़ी रुक गई

दीवार पर समय की सुइयाँ
जब एक जगह आकर ठहर गईं,
दौड़ती हुई ज़िंदगी भी जैसे
एक पल को साँस लेने लगी।

खिड़की के बाहर का नज़ारा
आज कुछ ज़्यादा शांत लगा,
कमरे की गहरी ख़ामोशी में
एक पुरानी मुस्कान सुनाई दी।

मेज़ पर रखी उस तस्वीर में
एक भूला हुआ चेहरा था,
उन आँखों ने मिटा दीं दूरियाँ
जिन्हें बरसों ने बढ़ाया था।

कुछ पलों की कीमत भला
किसी घड़ी से आँकी जा सकती है?
दिल में सँजोई हुई यादों को
समय भी कभी मिटा नहीं सकता।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

शब्दों से पहले का प्यार

शब्दों से पहले का प्यार

जब तुम बिना कुछ कहे आए,
दिल ने तुम्हें पहचान लिया,
एक मुस्कान की छाँव तले
एक रिश्ता चुपचाप बन गया।

बिना पूछे तुम समझ गए
आँखों की हल्की सी नमी,
बिना कहे ही थाम लिया
जब भी डगमगाई ज़िंदगी।

दूर खड़े होकर भी तुम
हमेशा पास से लगे,
खामोशियों के उन पलों में
दिल के गीत खुद ही जगे।

शब्दों के जन्म से पहले ही
प्यार हमारे बीच खिला था,
जो बात कभी कही न गई
वही रिश्ता आज भी मिला था।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अनखुला ख़त

अनखुला ख़त

एक पुरानी सी संदूक में
एक ख़त अब भी रखा है,
समय मिटा न सका उन शब्दों को
जो उसमें अब तक लिखा है।

लिखने वाले हाथ बदल गए,
पढ़ने वाली आँखें दूर हुईं,
फिर भी हर एक अक्षर में
कुछ अधूरी बातें छिपी रहीं।

कई बार मन हुआ खोलूँ उसे,
मगर उँगलियाँ रुक गईं,
डर था कि सोई हुई यादें
फिर से जाग न जाएँ कहीं।

शायद कुछ ख़त अनखुले ही
दिल के लिए बेहतर होते हैं,
कहे बिना रह गए जज़्बात
यूं ही पवित्र बने रहते हैं।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अपनी परछाई से आगे निकल गया

अपनी परछाई से आगे निकल गया

पीछे चलती परछाई को
उसने मुड़कर देखा नहीं,
राह कठिन थी सामने फिर भी
कदम कभी पीछे रखा नहीं।

गुज़रे हुए उन दिनों को
यादों में उसने सहेज लिया,
हार गए जिन पलों से कभी
वहीं से हौसला ले लिया।

रास्ते में बाधाएँ आईं,
फिर भी वह रुका नहीं,
अपने भीतर की रोशनी लेकर
किसी मोड़ पर झुका नहीं।

जब आखिर पीछे मुड़कर देखा,
परछाई भी पीछे रह गई,
खुद को जीत चुका था जो इंसान,
उसकी राह नई बन गई।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

टूटी डाल पर खिला फूल


टूटी डाल पर खिला फूल

टूटी हुई एक डाल के सिरे पर
एक नन्हा फूल खिल आया,
हवा ने जब धीरे से छूकर उसे,
वह चुपके से मुस्कुराया।

सहारा देने वाला कोई न था,
फिर भी रंग बिखेरता रहा,
गिर जाने के डर को भूलकर
सूरज की ओर देखता रहा।

जिन राहों पर दर्द मिला हो,
वहाँ उम्मीद मरती नहीं,
एक छोटे से फूल के भीतर भी
जीवन की कमी होती नहीं।

घायल शाख पर भी एक सपना
नई सुबह बनकर आया,
उस फूल की सुंदरता ने मुझको
जीना फिर से सिखलाया।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Thursday, September 17, 2026

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी ने मुझे
लिखने की आदत दी,
मेरी बदतमीज़ी की
कमीज़ फाड़कर रख दिया।

जो शब्द ज़ुबाँ तक आकर
हर बार लौट जाते थे,
तेरी आँखों ने उन शब्दों को
काग़ज़ पर उतार दिया।

मैं ख़ुद को समझता रहा
बेपरवाह और बेख़बर,
तेरी एक ख़ामोश नज़र ने
मेरा सारा गुरूर उतार दिया।

अब दर्द भी शायरी है,
और ख़ामोशी भी ग़ज़ल,
तूने कुछ कहा भी नहीं—
फिर भी मुझे लिखना सिखा दिया।

जी आर कवियुर 
17 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Wednesday, September 16, 2026

ज़िंदगी एक कारवाँ

ज़िंदगी एक कारवाँ


ज़िंदगी है क्या, ज़िंदादिलों का कारवाँ,
हर कदम पर मिलती नई एक दास्ताँ,
ग़म की घटाएँ हों या खुशियों की बहार,
चलते रहें तो खिलता रहे आसमाँ।

राहों में काँटे हों या फूलों की महक,
हौसला हो दिल में तो आसान हर सफ़र,
हार को भी जीत में बदल दे ये जुनून,
मुस्कुराते चल पड़े तो मिटे हर डर।

कल की फ़िक्र छोड़, आज को सँवार ले,
बीते लम्हों से कुछ सीख, आगे निहार ले,
ज़िंदगी तो नाम है चलते रहने का,
हर नई सुबह को दिल से पुकार ले।

दोस्तों के साथ हो तो राहें हसीन हैं,
अपनों की मोहब्बत में खुशियाँ यक़ीन हैं,
दिल में उम्मीद हो, आँखों में रोशनी,
ज़िंदगी के रंग फिर कितने रंगीन हैं।

जी आर कवियुर 
16 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Saturday, September 12, 2026

तेरे जाने के बाद (ग़ज़ल)

तेरे जाने के बाद (ग़ज़ल)

सुकूँ फिर दिल को मिला तेरे जाने के बाद,
हर एक बात में गिला तेरे जाने के बाद।

उदास शाम ने पूछा मेरा हाल-ए-दिल,
कोई जवाब न मिला तेरे जाने के बाद।

तमाम उम्र जिसे अपना समझ के चाहा,
वही तो दूर जा बसा तेरे जाने के बाद।

मन का दीप भी बुझा, रोशनी भी रूठ गई,
अँधेरा मन में पला तेरे जाने के बाद।

तेरी यादों ने मगर साथ मेरा छोड़ा नहीं,
हर एक घाव फिर खिला तेरे जाने के बाद।

न जाने कौन-सा रिश्ता था तुझसे ऐ हमदम,
कि ख़ुद से भी मैं जुदा तेरे जाने के बाद।

‘जी आर’ मन को तेरी याद से बहलाता रहा,
मगर न दर्द ये टला तेरे जाने के बाद।

रचनाकार
जी आर कवियुर  
13 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

हज़ार बार (ग़ज़ल)

हज़ार बार (ग़ज़ल)
हज़ार बार तुझसे मिन्नतें किया करते हैं,
 तेरा ही चेहरा दिल में लिए प्यार किया करते हैं।

तेरी राहों में बिछी रहती हैं मेरी नज़रें, 
तेरे आने का हर पल इंतज़ार किया करते हैं।

तेरी ख़ामोश निगाहें बहुत कुछ कहती हैं,
 हम उन्हीं आँखों से दिल का इज़हार किया करते हैं।

तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखते हैं, 
तेरे दीदार की ख़ातिर दिल बेकरार किया करते हैं।

तेरी उल्फ़त ने हमें ऐसा बना दिया है, 
हर ख़ुशी तेरे नाम से निसार किया करते हैं।

‘जी आर’ तेरी यादों में ग़ज़ल लिखते हैं, हर एक शेर को तेरा ही दीदार किया करते हैं।


रचनाकार
जी आर कवियुर  
12 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Thursday, September 10, 2026

न मिटने वाले शब्द

न मिटने वाले शब्द

कुछ पल दिल में गहराई से उतर जाते हैं,
कुछ आवाज़ें खामोशी में भी सुनाई देती हैं।
अनजाने में कहा गया एक शब्द भी,
वक़्त से न मिटने वाला निशान बन जाता है।

कहने वाला मन आगे बढ़ जाता है,
पर सुनने वाला दिल वहीं ठहर जाता है।
मुस्कान के पीछे छिपा हुआ दर्द भी,
कभी एक पंक्ति में झलक जाता है।

कितने ही दिन बीत जाएँ फिर भी,
उसका अर्थ कभी धुंधला नहीं पड़ता।
कुछ एहसास आख़िरी साँस तक रहते हैं,
दिल के पन्नों पर सदा जीवित रहते हैं।

जी आर कवियुर 
10 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

न मिटने वाले शब्द

न मिटने वाले शब्द

कुछ पल दिल में गहराई से उतर जाते हैं,
कुछ आवाज़ें खामोशी में भी सुनाई देती हैं।
अनजाने में कहा गया एक शब्द भी,
वक़्त से न मिटने वाला निशान बन जाता है।

कहने वाला मन आगे बढ़ जाता है,
पर सुनने वाला दिल वहीं ठहर जाता है।
मुस्कान के पीछे छिपा हुआ दर्द भी,
कभी एक पंक्ति में झलक जाता है।

कितने ही दिन बीत जाएँ फिर भी,
उसका अर्थ कभी धुंधला नहीं पड़ता।
कुछ एहसास आख़िरी साँस तक रहते हैं,
दिल के पन्नों पर सदा जीवित रहते हैं।

जी आर कवियुर 
10 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Tuesday, September 8, 2026

मन का रहस्यमय नक्शा

मन का रहस्यमय नक्शा

एक नक्शा है, रेखाओं से परे,
मेरे मन की गहराइयों में,
भटके हुए सपने भी जहाँ
अपने घर की राह पहचानते हैं।

कुछ अनकहे शब्द छिपे हुए हैं
अनदेखी घाटियों के भीतर,
छुए बिना रह गई प्रेम की नदियाँ
चुपचाप बहती हैं अंतर्मन में।

यादों की पहाड़ी ढलानों पर
एक पुराना समय ठहरा है,
जहाँ कदम कभी पड़े ही नहीं,
वहीं अनजाने कल बुलाते हैं।

उस नक्शे को कोई पढ़ न सका,
मैं भी उसकी राहें पूरी नहीं जानता;
हर नई सुबह आँखें खोलती है,
मन एक नई राह फिर बनाता है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

वह कदम जो लौटकर नहीं आया


वह कदम जो लौटकर नहीं आया

आँगन की मिट्टी पर रह गया
एक कदमों का निशान,
जो मिटने का नाम न लेता था,
द्वार पर ठहरी थी उम्मीद।

कितनी साँझें बीत गईं,
राहें चुप होती चली गईं;
हवा में सुनाई दी हर आहट को
दिल ने समझा — तुम लौट आए।

बारिश आई, राह धुल गई,
फिर भी निशान रहा मन में;
वर्षों के बीत जाने पर भी
यादों की उम्र नहीं बढ़ती।

अंततः समझ आया मुझे —
तुम लौटने वाली दूरी से परे हो;
फिर भी उसी पदचिह्न के पास
मेरा इंतज़ार आज भी है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

जड़ों से विहीन वृक्ष


जड़ों से विहीन वृक्ष

माटी की गोद में जगह न पाकर
एक वृक्ष खड़ा है अकेला,
हवा के हाथों झूमते हुए भी
आँखों में वन की स्मृतियाँ लिए।

जड़ों को खोजती हुई नीचे तक
एक लंबी खामोश परछाईं,
जिस मिट्टी को छुआ वह पराई थी,
छाँव को भी अपना घर न मिला।

एक बूढ़ा पंछी आया था,
डाली पर घोंसला बनाने को;
बची हुई हरियाली के बीच
बस बीता कल गाता रहा।

जड़ें नहीं थीं फिर भी वृक्ष को
आकाश छूने की चाह थी;
धरती पर खोए सारे रिश्ते
मन में जड़ बनकर बढ़ते रहे।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

वे सब तारे बनकर मिले।

सिला हुआ आसमान

टूटे हुए नीले आकाश के
टुकड़े किसी ने चुन लिए,
यादों के धागों से फिर
बिखरे बादल सिल दिए।

घायल हुई उस साँझ के माथे पर
जब लालिमा की बिंदी खिली,
जो सपने कभी खो गए थे
वे सब तारे बनकर मिले।

हवा की उँगलियाँ छू गईं तो
कुछ सिलाइयाँ ढीली पड़ीं,
फिर भी गिरी हुई रोशनी की किरचें
रात ने बाँहों में भर लीं।

पूरा नहीं है यह आसमान,
फिर भी इसकी सुंदरता कम नहीं;
टूटे हुए दिल को जोड़ लिया जाए,
तो जीवन भी आकाश बन जाता है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

धूसर सुबह

धूसर सुबह

धूसर रंग में ढली थी भोर,
बिना चमक के जागा था शहर;
ओस से भीगी राहों के बीच
खामोशी करती रही पहरेदारी।

पंछियों की चहचहाहट दूर रही,
हवा को भी जैसे थकान लगी;
कल की परछाइयाँ साथ लिए
सूरज भी धीरे-धीरे चला आया।

खिड़की पर ठहरी आँखों में
आधा-सा सपना खो गया था;
फिर भी दूर बादलों की ओट में
रोशनी का एक बीज उग आया था।

आसमान पर धूसर रंग रहे,
उम्मीद का रंग फीका नहीं होता;
नया दिन जब द्वार खोलता है,
जीवन फिर से मुस्कुराता है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

नशे में रखा(ग़ज़ल)

नशे में रखा
(ग़ज़ल)
सपने में आकर, जगाकर हमें नशे में रखा,
दिल में ग़ज़ल के नग़मे सजाकर नशे में रखा।

ख़ामोश रातों में चाँदनी बनकर उतरते रहे,
पलकों पे ख़्वाबों को सजा कर नशे में रखा।

जब भी तन्हाई ने दिल को उदास कर दिया,
यादों की महफ़िल को बुलाकर नशे में रखा।

ज़ख़्मों को छूकर भी दर्द का एहसास न होने दिया,
हँसते हुए हर ग़म को भुलाकर नशे में रखा।

राहों में जब भी अँधेरों का साया घिर आया,
उम्मीद का दीपक जला कर नशे में रखा।

लब पर न आया राज़-ए-मोहब्बत कभी मगर,
आँखों से दिल का हाल बता कर नशे में रखा।

“जी आर” ये कैसा असर था तेरी यादों का,
हर साँस को तेरी याद में ढलाकर नशे में रखा।


रचनाकार जी आर कवियूर
09 09 2026

कहीं तो सुनी थी ( ग़ज़ल)

कहीं तो सुनी थी ( ग़ज़ल)

कहीं तो सुनी थी वो मीठी सी आवाज़ याद आता है,
भुला दी थी जो दिल ने बरसों पहले, वो साज़ याद आता है।

हवा छू के गुज़री तो दिल फिर से गुनगुनाने लगा,
किसी अनकही धुन का वही अंदाज़ याद आता है।

चाँदनी रातों में जब ख़ामोशियाँ गीत बन जाती हैं,
तेरे पास बिताया हुआ हर आग़ाज़ याद आता है।

कभी फूलों की ख़ुशबू में, कभी सावन की बूंदों में,
बिना बोले जो दिल ने सुनी थी, वो आवाज़ याद आता है।

वो भूली हुई शामें, वो आँखों में ठहरे हुए ख़्वाब,
हवा में घुला हुआ उनका हर राज़ याद आता है।

न जाने किस जनम से जुड़ा है ये रिश्ता उस धुन का,
जिसे सुनते ही धड़क उठे दिल, वही साज़ याद आता है।

“जी आर” जब भी लिखता है दिल की पुरानी दास्ताँ,
हर मिसरे में अपना ही कोई हमराज़ याद आता है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
08 09 2026 

Monday, September 7, 2026

यहीं है जन्नत

यहीं है जन्नत

सुंदर स्वर्ग की वो कहानियां,
मन में नई आस जगाती हैं।
सांसों के रुकने पर मिलेंगी,
धर्म की बातें समझाती हैं।

फिर भी कोई जाना न चाहे,
धरती का यह मोह निराला।
हंसते फूलों संग जीने की,
चाहत में हर दिल मतवाला।

बांट सको जब दर्द किसी का,
मिलता सच्चा सुकून यहीं है।
ढूंढने मत जाओ अंबर में,
प्रेम बसे जहां, जन्नत वहीं है।

जी आर कवियुर 
08 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Sunday, September 6, 2026

दरवाज़े पर ठहरी याद

दरवाज़े पर ठहरी याद

दरवाज़ा खुला तो हवा के संग
एक पुरानी खुशबू भीतर आई;
जिस पल को भूला समझा था,
वह फिर आँखों के सामने आया।

आँगन में फूल खिले तो भी
मन में एक खालीपन उतर आया;
कभी यहाँ जो हँसी गूँजती थी,
वह दीवारों पर ठहरी रही।

दरवाज़ा धीरे से बंद किया,
फिर भी याद बाहर नहीं गई;
समय चाहे जितना दूर ले जाए,
कुछ अपनापन घर लौट ही आता है।


जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

जिस मन का झरना कभी नहीं सूखता

जिस मन का झरना कभी नहीं सूखता

धूप भरी राहों में भी
उसने थोड़ी ठंडक बचाए रखी;
दर्द जब आकर घेरते रहे,
करुणा की राह खुली रही।

समय ने बहुत कुछ छीन लिया,
फिर भी अच्छाई का दीप न बुझा;
थके हुए उन क्षणों में भी
उम्मीद ने साथ नहीं छोड़ा।

सूने आकाश के नीचे भी
आँखें बादलों को ढूँढ़ती रहीं;
दुनिया चाहे सूख जाए सारी,
मन का झरना बहता रहा।


जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

दूसरे किनारे की तलाश में नाव

दूसरे किनारे की तलाश में नाव

शांत नदी की धारा में
एक नाव धीरे-धीरे चली;
अनजाने किनारे की चाह में
आशा मन में साथ रही।

लहरों का अंदाज़ बदलता रहा,
फिर भी चप्पू थमे नहीं;
पीछे छूटी धरती से बढ़कर
आगे का सपना बड़ा था।

दूर एक किनारा दिखा तो
मन में उजियारा भर गया;
मंज़िल मिलना ही सब कुछ नहीं,
सफ़र भी अनमोल था।

जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

हवा में बंधी गाँठ


हवा में बंधी गाँठ

हवा संग उड़ते एक धागे में
किसी ने एक गाँठ बाँधी थी;
उसे खोलने की कोशिश में
पुरानी टीस जाग उठी।

ठहरती ही नहीं जब तेज़ हवा,
गाँठ भला कैसे टिक पाए?
अनकहे शब्दों की तरह कुछ रिश्ते
धीरे-धीरे दूर हो जाएँ।

आखिर गाँठ खुद ही खुल गई,
धागा दूर कहीं बह गया;
समय ने चुपके से समझाया—
हर खोई चीज़ नुकसान नहीं।

जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अनपहचाना चेहरा

अनपहचाना चेहरा

भीड़ भरी राह में एक चेहरा मिला,
जाने क्यों अपना-सा लगा;
नाम नहीं मालूम, जगह भी अनजान,
फिर भी दिल में ठहर गया।

उन आँखों में कोई कहानी थी,
होंठों पर गहरी खामोशी थी;
वह अनजाना-सा एहसास मगर
पुराना कोई रिश्ता लगा।

वह चेहरा राह से दूर चला गया,
फिर मुड़कर देखा भी नहीं;
फिर भी उसकी छवि आज तलक
यादों से कभी मिट पाई नहीं।


जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Saturday, September 5, 2026

आत्मसाक्षात्कार

आत्मसाक्षात्कार
पावन तीर्थों में नहाते हैं हम,
कई व्रत रखकर चलते हैं हम,
धन का दान देकर पुण्य कमाते हैं,
मन न बदले तो फल क्या पाएँ हम?

गंगा सागर जाकर भी क्या होगा,
दान-दक्षिणा देकर भी क्या होगा,
कितने ही व्रत रख लें जीवन में,
ज्ञान बिना फिर मोक्ष कैसे होगा?

पावन नदियों में डुबकी लगाएँ,
क्या मन के पाप सभी धुल जाएँ?
मन की मैल जब तक दूर न होगी,
बाहर की पूजा अधूरी होगी।

अँधेरे में रस्सी साँप लगती है,
उजाला होते ही भूल मिटती है,
यह देह भी एक दिन मिट जाएगी,
आत्मा की सच्चाई समझनी होगी।

बाहर के कर्मों से क्या मिलेगा,
मन का यह प्यासा दिल कब भरेगा?
बाहर नहीं, भीतर हमें देखना है,
आज ही अपना सत्य खोजना है।

केवल आचार से मुक्ति नहीं मिलती,
यह दुनिया भी माया-सी लगती,
गोविंद नाम हृदय में बसाकर,
ज्ञान की राह पर आगे बढ़ना है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
06 09 2026

तेरी तस्वीर से (ग़ज़ल)

तेरी तस्वीर से (ग़ज़ल)
तेरी तस्वीर से दिल फिर से बेकरार हो गया
एक नज़र क्या मिली, मौसम-ए-प्यार हो गया

तेरी आँखों में जो देखा, वो ख़ुमार हो गया
मेरी तन्हाई का हर लम्हा गुलज़ार हो गया

तेरे ख़यालों ने छुआ जब से मेरे दिल को
सूना-सूना सा ये जीवन भी बहार हो गया

तेरी आहट की तमन्ना में कटी शामें मेरी
हर घड़ी अब तेरे आने का इंतज़ार हो गया

तू नहीं पास मगर साँसों में महकता है
तेरा एहसास ही जीने का करार हो गया

मेरी ख़ामोश दुआओं में तेरा नाम रहा
दर्द भी तेरी मोहब्बत में दिलदार हो गया

“जी आर” अब तो वही ख़्वाब है आँखों में बसा
तेरे मिलने का गुमाँ भी मेरा संसार हो गया

रचनाकार
जी आर कवियुर 
05 09 2026

Friday, September 4, 2026

तेरी यादों की महफ़िल” (ग़ज़ल)

तेरी यादों की महफ़िल” 
(ग़ज़ल)
जब से तुझे याद किया, दिल में हलचल मची है,
तेरी यादों की महफ़िल दिल में हर पल सजी है।

तेरी तस्वीर आँखों में अब तक बसी है,
हर एक साँस में तेरी खुशबू बसी है।

रात तन्हा है, मगर चाँदनी कुछ कह रही है,
तेरी यादों में ये रात धीरे-धीरे ढली है।

दर्द जितना भी मिला, मुस्कुराकर सह लिया,
तेरी चाहत की मेरे दिल में लौ अब भी जली है।

तेरे आने की उम्मीद आज भी बाकी है दिल में,
इसी उम्मीद से ये ज़िंदगी मेरी चली है।

कौन समझेगा भला दिल की ये ख़ामोशियाँ,
हर धड़कन में तेरी ही एक कहानी छिपी है।

जी आर ने भी तुझे दिल से भुलाना चाहा था,
मगर हर बार तेरी याद ही आगे खड़ी है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
04 09 2026
( तिरुवल्ला , कवियुर) 

कान्हा के चरणों की ओर

कान्हा के चरणों की ओर


घनश्याम बनकर कान्हा आए,
यमुना तट पर मुस्कुराए,
मधुर मुरलिया जब वो बजाए,
गोकुल सारा प्रेम में नहाए।

अष्टमी की वो पावन रात,
झिलमिल करते नभ के तारे,
नंद भवन में दीप जले हैं,
गूँजे हर ओर नाम तुम्हारे।

नन्हे कान्हा की पायल सुन लें,
मुरली वाले के दर्शन कर लें,
माखन चुराकर हँसते कान्हा,
वृंदावन को आनंद से भर दें।

घनश्याम बनकर कान्हा आए,
यमुना तट पर मुस्कुराए,
मधुर मुरलिया जब वो बजाए,
गोकुल सारा प्रेम में नहाए।

राधा के मन में राग हो तुम,
गोपियों के मधुर स्वप्न हो तुम,
दुख हरने वाला नाम हो तुम,
धर्म बचाने वाले श्याम हो तुम।

अधर्म मिटाने धरती पर आए,
दीनों के तुम सहारा बन जाए,
करुणा के नील सागर कान्हा,
कलियुग में तुम दीप जलाए।

जन्माष्टमी की रात सजाएँ,
कृष्ण नाम हम मिलकर गाएँ,
प्रेम दया संसार में बाँटें,
कान्हा के पथ पर कदम बढ़ाएँ।

हरे कृष्णा... हरे कृष्णा...
गोविंदा... गोपाला...
कान्हा के चरणों की ओर,
चलता जाए मन मतवाला...

कृष्ण कृपा बरसे जीवन में,
हर पल प्रेम का दीप जले,
मुरलीधर तुम साथ रहो तो,
हर दुख दूर हो... सुख ही मिले...

रचनाकार
जी आर कवियुर 
04 09 2026
( तिरुवल्ला , कवियुर) 

दिल में छपी बातें (ग़ज़ल)

दिल में छपी बातें (ग़ज़ल)
दिल में छपी बातों को दिल में ही रहने दो,
धरोहर हैं ये यादें, इन्हें महफ़ूज़ रहने दो।

जो ज़ख़्म दिए तुमने, वो ज़ख़्म भी अपने हैं,
इन दर्द के फूलों को चुपचाप ही खिलने दो।

जो ख़्वाब सजाए थे, आँखों ने कभी मिलकर,
उन ख़्वाबों को पलकों पर धीरे से ठहरने दो।

कुछ बात अधूरी है, कुछ राज़ छुपे दिल में,
इन राज़ की परतों को ख़ामोश ही रहने दो।

जो प्यार बचा दिल में, उसको न मिटाओ तुम,
नफ़रत की हवाओं को इस दिल से गुज़रने दो।

कल फिर ये मुलाक़ातें हों या न हों, क्या मालूम,
जो आज मिला हमको, उस पल को सँवरने दो।

‘जी. आर.’ तेरी यादों का ये सिलसिला रहने दो,
जो दिल में बसी मोहब्बत है, उसे दिल में ही रहने दो।

जी आर कवियुर 
03 09 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

Wednesday, September 2, 2026

സ്വപ്നങ്ങളിൽ — सपनों में 🌹Bilungal gazhal in hindi and malayalam By GR kaviyoor

സ്വപ്നങ്ങളിൽ — सपनों में 🌹
Bilungal gazhal in hindi and malayalam 
By GR kaviyoor 

भर लूँ तुझे आँखों में, जो तू आए स्वप्नों में,
प्रेम के भावों में, भर जाए तू स्वप्नों में।

നിറയട്ടെ നീയെൻ മിഴികളിൽ, നീ വരുമെൻ സ്വപ്നങ്ങളിൽ,
പ്രണയത്തിൻ വികാരങ്ങളിൽ, നിറയട്ടെ നീ സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

जब तू मुझसे दूर होता है,
फिर भी रहती है आसक्ति स्वप्नों में।

നീ എന്നിൽനിന്നകലുമ്പോൾ,
ശേഷിക്കുന്നു ആസക്തി സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

तेरी दी हुई स्मृतियाँ रहती हैं मन में,
दूर होकर भी जागता है अभिनिवेश स्वप्नों में।

നിനവിലും നീ എനിക്ക് നൽകിയതും,
അകലുമ്പോൾ അഭിനിവേശം സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

यादों में बसता है तू हर पल,
फिर भी दूरियाँ बन जाती हैं विराम स्वप्नों में।

ഓർമ്മകളിൽ നിറയുന്നു നീ,
എങ്കിലും അകലുന്നു വിരാമങ്ങളായ് സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

मेरी नस-नस में तू ही फैलता है,
नींद में भी बहते हैं प्रवाह स्वप्नों में।

എൻ സിരകളിൽ നീ പടരുന്നു,
നിദ്രയിലും പ്രവാഹങ്ങൾ തീർക്കുന്നു സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

जी आर का अनुराग भले विरह बन जाए,
मेरे ख़यालों में तू ही, स्वप्नों में।

ജീ ആറിന് അനുരാഗം വിരഹമായി മാറിയാലും,
എൻ ചിന്തയിൽ നീ മാത്രം, സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

GR kaviyoor 
02 09 2026

Tuesday, September 1, 2026

इश्क़ का एहसास — പ്രണയത്തിന്റെ അനുഭവംBilungal gazhal by GR kaviyoor

इश्क़ का एहसास — പ്രണയത്തിന്റെ അനുഭവം
Bilungal gazhal by GR kaviyoor 
दिल की गहराई तक जाकर तेरा प्यार महसूस हुआ,
दौलत नहीं, मुझे तेरा इज़हार महसूस हुआ।

ഹൃദയത്തിൻ ആഴത്തിലിറങ്ങി നിൻ സ്നേഹം അറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ,
ധനമല്ല, നിൻ പ്രണയത്തിൻ വിലയെന്നറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

तेरी ख़ामोश निगाहों ने जो बातें कह दीं,
बिन कहे दिल को वही इक़रार महसूस हुआ।

നിശ്ശബ്ദമായ നിൻ മിഴികൾ പറഞ്ഞതെല്ലാം കേട്ടപ്പോൾ,
മൊഴിയാത്തൊരു പ്രണയത്തിൻ സമ്മതമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

दूर रहकर भी तू दिल के बहुत क़रीब रहा,
फ़ासलों में भी तेरा प्यार महसूस हुआ।

അകലെയായിരുന്നിട്ടും നീയെൻ ഹൃദയത്തിൽ ചേർന്നപ്പോൾ,
അകലങ്ങൾക്കപ്പുറവും നിൻ സ്നേഹമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

तेरी यादों की महक जब भी चली शामों में,
सूने मौसम में भी बहार महसूस हुआ।

നിൻ ഓർമ്മകൾ കാറ്റിലലിഞ്ഞു വന്ന സന്ധ്യകളിൽ,
വിരഹത്തിലും വസന്തത്തിൻ മധുരമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

ज़ख़्म कितने भी मिले तेरी मोहब्बत से मुझे,
हर दर्द में तेरा प्यार महसूस हुआ।

നിൻ സ്നേഹം നൽകിയ മുറിവുകൾ ഏറെയായിരുന്നെങ്കിലും,
ഓരോ വേദനയിലും നിൻ സ്നേഹമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

जी आर, इश्क़ में जब ख़ुद को भुलाया मैंने,
अपने भीतर ही तेरा दीदार महसूस हुआ।

ജി ആർ, പ്രണയത്തിൽ സ്വയം മറന്നുപോയ നേരം,
സ്വന്തം ഹൃദയത്തിൽ നിന്നെ ഞാൻ കണ്ടറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

GR kaviyoor 
01 09 2026

कहने वाले

कहने वाले

कहने वाले बहुत कुछ कहते हैं,
मीठी बातों से मन भर देते हैं,
लेकिन जब वचन निभाने का समय आता है,
कई लोग पीछे हट जाते हैं।

वादा करना बहुत आसान है,
मीठे शब्द कहना भी आसान है,
लेकिन जब उसे निभाने का समय आता है,
लोगों के पास कई बहाने होते हैं।

शब्दों से ज्यादा मूल्यवान
वचन निभाने वाला मन है,
जो कहते हैं, वही करके दिखाते हैं,
वही जीवन में सच में महान हैं।

 जी आर कवियुर 
31 08 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

Saturday, August 29, 2026

बाप की ख़ामोश मोहब्बत | അച്ഛന്റെ നിശ്ശബ്ദ സ്നേഹം Bilungal gazhal

बाप की ख़ामोश मोहब्बत | അച്ഛന്റെ നിശ്ശബ്ദ സ്നേഹം
हर खुशी अपनी वो बच्चों पे लुटाता जाता है,
दर्द दिल का मगर हँसकर वो छुपाता जाता है।

മക്കളുടെ ചിരിയിൽ സ്വന്തം ദുഃഖം മറന്ന് പോയിരിക്കും,
അവരുടെ സന്തോഷത്തിൽ സ്വന്തം ജീവിതം നിറഞ്ഞ് പോയിരിക്കും.

धूप खुद सह के हमें छाँव दिलाता जाता है,
टूट जाए भी तो हिम्मत को निभाता जाता है।

വെയിലേറ്റു നിന്നവൻ തണലായി മാറി,
സ്വന്തം വേദനകളെല്ലാം ഉള്ളിലൊതുക്കി മറഞ്ഞ് പോയിരിക്കും.

अपनी ख़्वाहिश को हमारी खुशी पर वार दिया,
अपने अरमानों को चुपचाप मिटाता जाता है।

സ്വന്തം സ്വപ്നങ്ങൾ മക്കൾക്കായി നൽകി,
അവരുടെ വഴികളിൽ വെളിച്ചമായി തെളിഞ്ഞ് പോയിരിക്കും.

घर की दीवार से मज़बूत है साया उसका,
वक़्त की आँधियों से घर को बचाता जाता है।

വീടിന്റെ താങ്ങായി കാലം മുഴുവൻ നിന്നു,
കൊടുങ്കാറ്റിലും പാറപോലെ ഉറച്ച് നിന്നുപോയിരിക്കും.

नींद आँखों में लिए रात गुज़ारता है वो,
हमको आग़ोश में लेकर वो सुलाता जाता है।

ഉറക്കമില്ലാ രാത്രികൾ മക്കൾക്കായി നൽകി,
താരാട്ടിൻ ഈണമായി അരികിൽ ലയിച്ച് പോയിരിക്കും.

हम समझते रहे फ़र्ज़ है ये सब उसका,
वो मोहब्बत को मगर दिल से निभाता जाता है।

കടമയെന്ന് മാത്രം നമ്മൾ കരുതിയ സ്നേഹം,
അതിന്റെ ആഴമറിയാതെ കാലം കടന്ന് പോയിരിക്കും.

माँ की ममता का ज़माना तो समझ लेता है,
बाप ख़ामोश रहे, दर्द छुपाता जाता है।

അമ്മയുടെ സ്നേഹം ലോകം പാടിപ്പുകഴ്ത്തുമ്പോൾ,
അച്ഛന്റെ സ്നേഹം നിശ്ശബ്ദമായി മറഞ്ഞ് പോയിരിക്കും.

जी.आर., जब समझ आई बाप की ख़ामोश मोहब्बत,
तब तलक़ दूर बहुत बाप चला जाता है।

ജി.ആർ., അച്ഛന്റെ സ്നേഹം തിരിച്ചറിയും നേരം,
തിരികെ വരാത്ത ദൂരത്തേക്ക് അച്ഛൻ പോയിരിക്കും.

GR kaviyoor 
28 08 2026

तेरे आँचल से कफ़न तक — അമ്മയുടെ ചേലത്തുമ്പിൽ നിന്ന് കോടി വസ്ത്രം വരെ Bilungal gazhal

तेरे आँचल से कफ़न तक — അമ്മയുടെ ചേലത്തുമ്പിൽ നിന്ന് കഫൻ വരെ
तेरे आँचल की छाँव माँ, जीवन का पहला सहारा था,
आज बहू के आँचल में ही, मेरा अपना घर-द्वारा था।

അമ്മേ, നിൻ ചേലത്തുമ്പിൽ
എൻ ബാല്യം ഒരു തണലായിരുന്നു,
ഇന്ന് അവളുടെ ചേലത്തുമ്പിൽ
എൻ ജീവിതവും ഒരു തണലായിരുന്നു.

तेरी गोदी में बीता बचपन, तेरी लोरी में रातें थीं,
उसके संग जो राह मिली, उसमें भी जीवन की बातें थीं।

നിൻ താരാട്ടിൻ ഈണത്തിൽ
എൻ രാവുകൾ പൂക്കളായി വിരിഞ്ഞു,
അവളുടെ മൗനസ്നേഹത്തിൽ
എൻ പകലുകൾ നിലാവായിരുന്നു.

तेरे हाथों की रोटी में माँ, ममता घुलती जाती थी,
उसके हाथों के स्वाद में भी, घर की खुशबू आती थी।

നിൻ കൈകളിലെ ചോറിൽ
മമതയുടെ മണമുണ്ടായിരുന്നു,
അവളുടെ കൈകളിലെ ഊണിൽ
വീടിൻ്റെ മധുരമുണ്ടായിരുന്നു.

तेरी उँगली थामे मैंने, जग की राह पहचानी थी,
अब उसकी उँगली थामे चलना, जीवन की नई कहानी थी।

നിൻ വിരൽ പിടിച്ചുനടന്ന
വഴികളൊക്കെയും കിനാവായിരുന്നു,
അവളുടെ കൈപിടിച്ചപ്പോൾ
പുതുവഴികളൊക്കെയും കിനാവായിരുന്നു.

तेरे आँचल में बचपन था, उसके आँचल में संध्या है,
एक ने जीवन दिया मुझे, एक में जीवन की संध्या है।

നിൻ ചേലിൽ എൻ ബാല്യം,
അവളുടെ ചേലിൽ ജീവിതസന്ധ്യ,
ഒന്നിൽ ഞാൻ ജനിച്ചുവെങ്കിൽ,
മറ്റൊന്നിൽ ജീവിതം പൂർണ്ണമായിരുന്നു.

मोह-माया के इस जग में, कितने रिश्ते छूट गए,
जिसे समझकर अपना समझा, वो भी समय के साथ छूट गए।

മോഹമായ ഈ ലോകത്തിൽ
എത്ര ബന്ധങ്ങൾ മാറിപ്പോയി,
എൻതെന്ന് കരുതിയതെല്ലാം
കാലത്തിൻ കൈയിലെ നിഴലായിരുന്നു.

जी. आर., अब क्या किसी आँचल की तमन्ना बाकी है,
तेरे छोड़े उस आँचल को, कफ़न समझकर पकड़ना है।

ജി. ആർ., ഇനി എന്തിനു
ഈ ലോകത്തിൻ ചേലത്തുമ്പിൻ മോഹം?
ഒടുവിൽ എന്നെ മൂടുവാൻ
കാത്തിരുന്നത് കോടി വസ്ത്രമായിരുന്നു.

GR kaviyoor 
28 08 2026

Friday, August 28, 2026

तेरा ही इंतज़ार रहा है(ग़ज़ल)

तेरा ही इंतज़ार रहा है
(ग़ज़ल)

तेरी आँखों में कैसा ख़ुमार रहा है,
मेरे दिल को तेरा इंतज़ार रहा है।

तेरी बातों की वो मीठी रवानी,
दिल पे अब तक वही क़रार रहा है।

चाँद निकला तो तेरा ख़याल आया,
रात भर दिल में इक बहार रहा है।

तेरे ख़ामोश लबों की वो मुस्कान,
दिल में छुपा हुआ इज़हार रहा है।

दूर होकर भी तू करीब है इतना,
हर घड़ी तेरा ही दीदार रहा है।

तेरी यादों ने जब छुआ दिल को,
साँस में फिर वही ख़ुमार रहा है।

जी आर लिखता रहा तेरी चाहत,
दिल में बस तेरा ही प्यार रहा है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
28 08 2026
( तिरुवल्ला , कवियुर) 
 

Wednesday, August 26, 2026

तुमसे इतना चाहत था (एक महफ़िलनुमा ग़ज़ल)

तुमसे इतना चाहत था 
(एक महफ़िलनुमा ग़ज़ल)
आज ये मन में ठान लिया, तुमसे इतना चाहत था,
दिल ने हर पल मान लिया, तुमसे इतना चाहत था।

तेरी हँसी को फूल समझकर दिल ने जान लिया,
तेरी हर एक बात में अपना अरमान लिया।

तेरी आँखों की चमक को मन ने पहचान लिया,
तेरे संग बीते पलों को जीवनदान लिया।

दूर रहे तुम फिर भी दिल ने तुमको पास लिया,
तेरी यादों को ही अपना सारा जहान लिया।

जी. आर. ने दिल से तुम्हें अपना जान लिया,
हर धड़कन ने बस तुमको पहचान लिया।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
27 08 2026
( तिरुवल्ला , कवियुर) 
 


Tuesday, August 25, 2026

कालातीत पल

कालातीत पल

एक पल को घड़ी की सुइयाँ,
जैसे थमकर रह गईं,
समय के सारे हिसाब मिटे,
बस धड़कनें कुछ कह गईं।

बरसात के थम जाने पर,
पत्ती पर एक बूँद चमकी,
बीते दिनों की यादों में,
खामोशी कोई धुन बन गई।

बिछड़ी हुई राहों के पार,
एक स्नेह-स्पर्श रह गया,
धीरे-धीरे मिटते चेहरों में,
एक मुस्कान फिर भी चमकती रही।

रुकना जिसे कभी न आया,
वह समय आगे बढ़ता गया,
फिर भी जीवन के कुछ अनमोल पल,
दिल में सदा के लिए ठहर गए।

जी आर कवियुर 
22 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

पंछी की पहली उड़ान


पंछी की पहली उड़ान

नन्हे से घोंसले की गर्मी में पला,
पंखों में सपनों को सँजोए रहा,
नीले गगन का अद्भुत विस्तार देख,
मन में एक अनजानी चाह जगी।

माँ के पंखों की छाँव छोड़कर,
धीरे से बाहर झाँकने लगा,
हवा की लय को सीने में भरकर,
डर के भीतर साहस जाग उठा।

एक पल को आँखें मूँदकर,
दोनों पंख खुले आकाश में,
नीचे की दुनिया छोटी लगने लगी,
ऊपर नया क्षितिज सामने था।

गिरने का डर पीछे छोड़कर,
हवा के संग ऊपर उठता गया,
पहली उड़ान की उस थरथराहट में भी,
आजादी का मधुर गीत सुनाई दिया।

जी आर कवियुर 
22 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

राह पहचानती रोशनी

राह पहचानती रोशनी

अँधियारे से घिरी हुई राह पर,
दूर कहीं एक दीपक जल उठा,
थके हुए कदमों के पास आकर,
चुपचाप एक विश्वास जग उठा।

हवा ने आकर छूना चाहा,
बूँदों ने भी खूब सताया,
फिर भी वह लौ बुझ न सकी,
राहगीरों का साथ निभाया।

बिछड़ी हुई राहों के आगे,
एक किरण ने मोड़ दिखाया,
बिन कुछ बोले, बिन कुछ कहे,
अगला कदम कहाँ हो बताया।

टूटे सपनों के टुकड़ों में,
भोर के रंग उतरने लगे,
सूने पड़े उस जीवन-उपवन में,
फिर से कोमल फूल खिलने लगे।

खुद जलकर उस छोटी लौ ने,
चारों ओर उजियारा बाँटा,
अपना दर्द भुलाकर उसने,
दूसरों का सफर सँवारा।

जीवन की इस लंबी राह में,
जब थामने को हाथ न मिले,
नेकी की एक छोटी किरण ही,
इंसान को सवेरे तक ले चले।

जी आर कवियुर 
22 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

मिट्टी के बर्तन का गीत

मिट्टी के बर्तन का गीत

माटी की गोद में जन्मा एक दिन,
साथ लिए बारिश की सौंधी खुशबू,
कुम्हार के हाथों आकार मिला,
घूमते चाक पर खिला एक सपना।

उँगलियों की ममता पाकर,
नरम मिट्टी में जीवन जागा,
अग्नि की तपिश से गुजरने पर,
नया सा साहस मन में जागा।

माँ की रसोई के एक कोने में,
घर के स्वाद सँभालता रहा,
धधकती चूल्हे की गर्मी के पास,
कितने भूखे मनों को तृप्त किया।

समय बदला, बर्तन भी बदले,
रसोई का रूप भी बदल गया,
फिर भी मिट्टी की उस सौंधी खुशबू-सा,
वह बीता कल दिल में रह गया।

टूटकर भी मिट्टी में मिल जाएगा,
जहाँ से इसकी शुरुआत हुई,
अग्नि में तपे इस जीवन ने,
बस प्रेम की एक धुन छोड़ दी।

इंसान भी तो मिट्टी का बेटा है,
अंततः मिट्टी में लौट जाना है,
अहंकार सभी यहीं छोड़कर,
माटी की गोद में समा जाना है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
22 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

तू ग़ज़ल बनके (ग़ज़ल)

तू ग़ज़ल बनके 
(ग़ज़ल)
तू ग़ज़ल बनके मेरे दिल में उतर जाओगे,
गर मेरी ज़िंदगी में आके सँवर जाओगे।

तेरी आँखों में मोहब्बत का अगर रंग भरा,
मेरी दुनिया के अँधेरों में निखर जाओगे।

तेरी आवाज़ में जब मेरा भी नाम आएगा,
मेरी ख़ामोश धड़कनों में ठहर जाओगे।

तेरे आने से महक जाएगा वीरान ये दिल,
सूखे मौसम में भी सावन-से बिखर जाओगे।

मैंने चाहा है तुझे टूट के इस आलम में,
मेरी पलकों से हसीं ख़्वाब-से गुज़र जाओगे।

“जी आर” को है यक़ीं, इश्क़ की इस राह में तुम,
मेरी ग़ज़लों की तरह दिल में उतर जाओगे।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
23 08 2026

सोच के पार — एक रूहानी ग़ज़ल

सोच के पार — एक रूहानी ग़ज़ल
अब आ गया वो वक़्त, एक नज़र के पार
जब कोई हो गया इस क़दर के पार

तेरी ख़ामोशियों में छुपी थी एक ख़बर
मैं पढ़ता रहा तेरी आँखों की नज़र के पार

न कोई राह बची थी, न कोई रहगुज़र
तू साथ था तो आसान था हर सफ़र के पार

तेरे ख़याल ने ऐसा किया मुझ पर असर
कि भूल बैठा मैं दुनिया की हर ख़बर के पार

जहाँ ख़त्म हो गई थी मेरी सारी तलाश-ए-नज़र
वहीं मिल गया मुझे तेरा शहर के पार

नाप सकता नहीं कोई मोहब्बत की ये गहराई
ये दिल उतर गया तेरी नज़र के पार

जी आर, अब तो यही हाल है इस दिल का
वो ले गया मुझे अपनी नज़र के पार

रचनाकार
जी आर कवियुर 
22 08 2026

ख़ामोश दिल (ग़ज़ल)

ख़ामोश दिल (ग़ज़ल)
तेरी ये बात कहने को दिल चाहता था,
मगर मासूम दिल चुप ही रहा करता था।

तेरी महफ़िल में यार, ऐसा तकल्लुफ़ भी रहा,
दिल क़रीब आके भी फ़ासला करता था।

तेरी आँखों में जो कुछ था, समझता था मैं,
फिर भी हर बात से ख़ुद को जुदा करता था।

तूने पूछा भी कभी हाल मेरे दिल का मगर,
मैं मुस्कुराकर तुझे ठीक कहा करता था।

कितनी बातें थीं जो होंठों पे ठहर जाती थीं,
मेरा ख़ामोश सा चेहरा ही कहा करता था।

‘जी.आर.’ अपने दिल की ये हालत न पूछना,
जो कह न सका, वही उम्र भर कहा करता था।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
21 08 2026

Friday, August 21, 2026

बूँद में बसा आकाश

बूँद में बसा आकाश

जब एक बारिश की बूँद
पत्ती की नोक पर काँप रही थी,
उसके पारदर्शी हृदय में
एक नीला आकाश झिलमिला रहा था।

बादलों के गुज़र जाने के रास्ते,
उड़ चुके पंछियों की परछाइयाँ,
और दूर कहीं सूरज की मुस्कान—
सब कुछ उस छोटी-सी बूँद में समाया था।

उसे छोटा समझकर
किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया;
लेकिन उसके भीतर छिपी थी
एक पूरी दुनिया।

जब वह धरती पर गिरी,
तो स्वयं को खोया नहीं—
वह एक बीज का सपना बन गई,
और नई हरियाली को जीवन दे गई।

बूँद ने कहा—
“मेरे छोटे होने के कारण
मेरे आकाश को छोटा मत समझना;
एक बूँद के भीतर भी
पूरा ब्रह्मांड छिपा हो सकता है।”

और इस तरह एक बारिश की बूँद में
आकाश ने स्वयं धरती को छू लिया—
चुपचाप यह समझाते हुए कि
छोटी-सी चीज़ के भीतर भी
एक विशाल संसार जीवित हो सकता है। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

क्षितिज का निमंत्रण

क्षितिज का निमंत्रण

कहीं दूर उस मायावी छोर पर,
जहाँ आकाश और सागर एक हो जाते हैं,
संध्या के सुनहरे रंगों में सजा
क्षितिज मुझे पुकार रहा है।

दूरियों के पार उड़ने को आतुर
इस मन से वह धीरे से कहता है—
“आओ…”
और लहरें राह दिखाने लगती हैं।

डूबते सूरज की लालिमा में
जब एक नया सपना खिलता है,
हृदय बीते कल की राहों को पीछे छोड़कर
आने वाले कल की तलाश में चल पड़ता है।

क्षितिज ने कहा—
“मुझे छूने के लिए तुम्हें मेरे पास आने की आवश्यकता नहीं,
मेरी ओर बढ़ते हुए
बस अपने भीतर की सीमाओं को पार कर लेना।”

और यूँ दूर की एक रोशनी बनकर
क्षितिज सदा पुकारता रहता है—
यह याद दिलाते हुए कि
जहाँ सब कुछ समाप्त होता दिखाई देता है,
वहीं से एक नई यात्रा शुरू होती है। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

पहाड़ की साँस

पहाड़ की साँस

बादलों के स्पर्श से जागती पर्वत-ढलानों पर,
जब धुंध की उँगलियाँ धरती को धीरे से सहलाती हैं,
हवा की लय पर पत्ते गाते हैं—
जैसे पहाड़ के भीतर कोई साँस चलती हो।

चट्टानों के मौन हृदय में
छोटी-छोटी धाराएँ जन्म लेती हैं;
घाटियों की ओर बहती हर बूँद में
पहाड़ अपना जीवन बाँटता है।

जहाँ पेड़ काट दिए गए हैं,
वहाँ अब केवल खामोशी उगती है;
जड़ों को खोजती मिट्टी की आँखों में
एक पुराना दर्द उभर आता है।

पहाड़ ने कहा—
“याद रखना, मेरी साँस केवल हवा में नहीं,
तुम्हारी साँसों में भी बसी है;
अगर तुम मेरी रक्षा करोगे,
तो धरती कल भी साँस ले पाएगी।”

इसलिए पहाड़ के सीने पर
आओ, एक पेड़ लगाएँ—
और जब वह बढ़े,
तो हमारे भीतर भी
एक हरी साँस जन्म ले। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

खाली घोंसला

खाली घोंसला

पुरानी पेड़ की डाल पर
बस एक घोंसला झूल रहा था,
जो सुबहें कभी गीतों से गूंजती थीं,
अब केवल हवा में सुनाई देती थीं।

कभी पंखों की फड़फड़ाहट से भरा
वह छोटा-सा आशियाना,
आज खामोश था,
फिर भी वहाँ यादें कभी सोई नहीं थीं।

जहाँ से बच्चे उड़ चले थे,
उस राह में आकाश बहुत विशाल था,
माँ-पक्षी की प्रतीक्षा में
बस प्रेम ही था, जो कभी छोटा नहीं हुआ।

वह खाली घोंसला कह रहा था—
बिछड़ना शून्यता नहीं है;
यह वही प्रेम है, जिसने उड़ना सिखाया,
और अंततः वही प्रेम
सबसे बड़ा घोंसला बन जाता है।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

घास की मुस्कान

घास की मुस्कान

भोर की ओस की बूँदों में
घास की नोकें मुस्कुराईं।
जब कोई देख भी नहीं रहा था,
धरती ने हरियाली ओढ़ ली।

हवा ने आकर जब छुआ,
वे धीरे से झुक गईं।
पैरों के स्पर्श से गुज़रने पर भी
उन्होंने कोई शिकायत नहीं की।

जब धूप की तपिश उतरी,
वे बिना छाँव के भी खड़ी रहीं।
बारिश की एक बूँद मिली तो
फिर से ताज़गी में जाग उठीं।

तभी समझ आया—
सुंदर जीवन के लिए बड़ा होना ज़रूरी नहीं;
छोटा होकर बढ़ना भी पर्याप्त है,
यदि हृदय मुस्कुराना जानता हो।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Wednesday, August 19, 2026

दिल का दर्द छुपाएँ कैसे | ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെBilingual Hindustani–Malayalam Ghazal

दिल का दर्द छुपाएँ कैसे | ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെ
Bilingual Hindustani–Malayalam Ghazal
दिल का दर्द छुपाएँ कैसे,
ज़ख़्म कितना भी गहरा हो, दिखाएँ कैसे।

ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെ,
ആഴമേറിയ മുറിവുകൾ കാണിക്കാം എങ്ങനെ.

मिज़रों में जो अश्क हैं, बताएँ कैसे,
ख़ामोश इन आँखों को समझाएँ कैसे।

മിഴികളിൽ നിറയുന്ന കണ്ണുനീർ പറയാം എങ്ങനെ,
മൗനമായ കണ്ണുകളെ ആശ്വസിപ്പിക്കാം എങ്ങനെ.

तेरी यादों को दिल से मिटाएँ कैसे,
बीते लम्हों को फिर से बुलाएँ कैसे।

നിന്റെ ഓർമ്മകൾ ഹൃദയത്തിൽനിന്ന് മായിക്കാം എങ്ങനെ,
കടന്നുപോയ നിമിഷങ്ങളെ തിരികെ വിളിക്കാം എങ്ങനെ.

इस दिल की कहानी सुनाएँ कैसे,
छुपे हुए जज़्बात जताएँ कैसे।

ഈ ഹൃദയത്തിന്റെ കഥ ചൊല്ലാം എങ്ങനെ,
ഒളിപ്പിച്ച വികാരങ്ങൾ അറിയിക്കാം എങ്ങനെ.

‘जी आर’ इस दिल को तुझसे जुदा करें कैसे,
तेरे बिना ये ज़िंदगी बिताएँ कैसे।

‘ജി ആർ’ ഈ ഹൃദയത്തെ നിന്നിൽനിന്ന് അകറ്റാം എങ്ങനെ,
നീയില്ലാതെ ഈ ജീവിതം നയിക്കാം എങ്ങനെ.

GR kaviyoor 
19 08 2026
( Thiruvalla, kaviyoor)

Sunday, August 16, 2026

The Invisible Bridge

The Invisible Bridge

Between two shores
The river kept flowing,
While distances stretched between them
Like a bond that could never be touched.

Without speaking a single word,
Two eyes spoke to each other.
Along forgotten pathways,
Memories crossed to the other side.

An unseen bridge
Rose quietly between two hearts;
To cross beyond time and distance,
Faith alone was enough.

There was no longer an “here” or “there”—
The moment two hearts became one,
The bridge was nowhere to be seen,
Yet no one was far away anymore.

GR kaviyoor 
17 08 2026
(Thiruvalla, kaviyoor)

मरुस्थल की बारिश की बूँद

मरुस्थल की बारिश की बूँद

तपती रेत के विस्तार के बीच,
जहाँ गर्मी की साँस बसी थी,
एक दिन अचानक
आकाश ने एक बूँद उपहार में दी।

प्यासी रेत की लहरों ने
उसे हथेलियों की तरह थाम लिया।
एक सूखे हुए बीज के भीतर
एक नया स्वप्न जाग उठा।

वह केवल एक बूँद थी,
फिर भी छोटी नहीं थी;
मरुस्थल की निस्तब्धता में
वह जीवन का पहला शब्द बन गई।

बारिश फिर लौटकर न आई,
फिर भी आशा वहाँ नहीं मिटी।
उस एक बूँद ने सिखाया—
बंजर भूमि में भी वसंत जन्म ले सकता है।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

नदी का जन्म


नदी का जन्म

कहीं पर्वत के हृदय में
एक बूँद पिघलकर उतर आई।
चट्टानों की सँकरी राहों से
वह नई दिशा खोजती चली।

जिसे कोई सुन न सका,
उस स्वर में उसने धरती से कहा;
एक छोटी धारा बनकर जन्मी
और दूर की घाटियों का स्वप्न देखा।

राह में मिले पत्थरों को
उसने टाला नहीं, उन्हें छूकर बहती रही।
एक छोटी-सी जलधारा भी
अपना लक्ष्य नहीं भूली।

अंततः जब कई धाराएँ मिलकर
एक नदी बन गईं,
पर्वत की निस्तब्धता में जन्मी वह बूँद
दुःख के लवण-स्वाद से भरे
समुद्र की कहानी बन गई।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

हरियाली की साँस

हरियाली की साँस

भोर की ओस की बूँदों में
हरियाली ने धीरे से आँखें खोलीं।
पत्तों की निःशब्द हलचल में
धरती ने साँस ली।

जिन राहों से होकर हवा गुज़री,
घास ने सिर झुका लिया।
एक नन्ही कोंपल की थरथराहट में भी
जीवन का संगीत सुनाई दिया।

धूप की तपिश के बीच भी
हरियाली ने आशा नहीं छोड़ी।
सूखी धरती की छाती पर
एक नई कोंपल जन्मी।

तभी समझ आया—
प्रकृति शब्दों में नहीं बोलती,
हरियाली की हर छटा में
जीवन की साँस बसी है।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

तितली की परछाईं

तितली की परछाईं

फूल से फूल तक उड़ती तितली
जब रंग बिखेरती चली गई,
घास की नन्ही-सी नोक पर
उसकी परछाईं चुपचाप ठहर गई।

उसे थामने बढ़ी उँगलियों से पहले
वह हवा में विलीन हो गई।
छू न सकने वाली उस सुंदरता का
बस एक क्षण शेष रह गया।

पंख दूर चले गए फिर भी
परछाईं वहाँ से मिट न सकी।
एक गुज़रता हुआ अस्तित्व
हृदय पर चित्र बनकर ठहर गया।

तभी समझ आया—
कुछ सुंदरताएँ पाने के लिए नहीं होतीं,
वे बिना छुए भी गुज़र जाएँ
तो हृदय में रंग भर जाती हैं।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

तेरी ख़ामोशी (ग़ज़ल)

तेरी ख़ामोशी (ग़ज़ल)
तेरी यह ख़ामोशी मुझे वाग्मी बना देती है
तेरी हर इक अदा मुझे दीवाना बना देती है

तेरी आँखों में छुपा कोई अफ़साना बना देती है
एक नज़र मेरी धड़कनों को परवाना बना देती है

तेरी यादों की महक जब साँसों में उतरती है
सूना दिल भी मेरा एक आशियाना बना देती है

तेरे मिलने की तमन्ना दिल में जब जागती है
हर राह को मेरी तेरे दर का ठिकाना बना देती है

तेरी बातों में मोहब्बत का जो रंग घुलता है
ज़िंदगी को मेरी इक हसीन तराना बना देती है

तेरी दूरी भी अजब रंग दिखाती है मुझको
आँखों में दर्द का गहरा ख़ज़ाना बना देती है

‘जी आर’ तेरी मोहब्बत का ये कैसा अफ़साना
मेरी ख़ामोशियों को भी तराना बना देती है


जी आर कवियुर 
16 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

कहता है वो(ग़ज़ल)

कहता है वो
(ग़ज़ल)
कहता है वो, मगर बात बताता नहीं है वो,
अंगारों में चमकता है, दिल में गूँजता है वो।

राज़-ए-दिल को होंठों पे कभी लाता नहीं है वो,
चुप रहकर भी हर बात समझाता है वो।

दूर रहके भी मेरी साँसों में समाता है वो,
याद बनकर हर घड़ी दिल को सताता है वो।

रात की तन्हाइयों में चाँद बन जाता है वो,
टूटते तारों में मुझको मुस्कुराता है वो।

मैं उसे भूलूँ भी तो कैसे भुला पाता है वो,
मेरी हर धड़कन में फिर लौट आता है वो।

‘जी आर’ पूछता है दिल से, ये कैसा राज़ है,
दूर रहकर भी जो हर पल पास आता है वो।

जी आर कवियुर 
15 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात, आँखों से आँखें मिलीं,
दिल की ख़ामोश धड़कनों को जैसे राहें मिलीं।

तेरी नज़रों में जाने कैसी कशिश थी उस घड़ी,
बुझी-बुझी सी मेरी आँखों को फिर चाहें मिलीं।

तेरी बातों की महक अब तक बसी है साँस में,
सूने दिल को तेरी यादों की पनाहें मिलीं।

एक पल में उम्र भर का फ़ासला मिटता गया,
जब मेरी तन्हा डगर को तेरी बाहें मिलीं।

चाँद भी ठहरा हुआ था, रात भी मदहोश थी,
तेरी यादों से सजी कितनी ही शामें मिलीं।

“जी आर” उस पहली नज़र को भूल पाएगा कहाँ,
ज़िंदगी को जब तेरी चाहत की निगाहें मिलीं।

जी आर कवियुर 
14 08 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात, आँखों से आँखें मिलीं,
दिल की ख़ामोश धड़कनों को जैसे राहें मिलीं।

तेरी नज़रों में जाने कैसी कशिश थी उस घड़ी,
बुझी-बुझी सी मेरी आँखों को फिर चाहें मिलीं।

तेरी बातों की महक अब तक बसी है साँस में,
सूने दिल को तेरी यादों की पनाहें मिलीं।

एक पल में उम्र भर का फ़ासला मिटता गया,
जब मेरी तन्हा डगर को तेरी बाहें मिलीं।

चाँद भी ठहरा हुआ था, रात भी मदहोश थी,
तेरी यादों से सजी कितनी ही शामें मिलीं।

“जी आर” उस पहली नज़र को भूल पाएगा कहाँ,
ज़िंदगी को जब तेरी चाहत की निगाहें मिलीं।

जी आर कवियुर 
14 08 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

Thursday, August 13, 2026

मेरे लिए — എനിക്കായ്Bilungal gazhal

मेरे लिए — എനിക്കായ്
Bilungal gazhal 
तुम्हारे लिए मैंने छोड़ दिए दिल के सारे अरमान,
तुमने छोड़ दिया आँखों में दर्द और इंतज़ार मेरे लिए।

നിനക്കായ് ഞാൻ ത്യജിച്ചുവല്ലോ ഹൃദയത്തിലെ മോഹങ്ങൾ,
നീ നീക്കി വെച്ചതോ കണ്ണീരിൻ വേദനകൾ എനിക്കായ്.

तेरी यादें आज भी मेरी रातों में खिलती हैं,
अधूरे उन सपनों का रहा इंतज़ार मेरे लिए।

നിന്റെ ഓർമ്മകൾ ഇന്നും എൻ രാത്രികളിൽ പൂക്കുന്നു,
ഉണരാത്തൊരു സ്വപ്നമായി അവശേഷിച്ചു എനിക്കായ്.

तेरी राहों में मैं कितनी देर तक ठहरा रहा,
फिर वही तन्हाई बनी मेरा संसार मेरे लिए।

നിനക്കായി ഞാൻ കാത്തിരുന്ന വഴികൾ ഇന്നും നിശ്ശബ്ദം,
പിരിയാത്തൊരു ഏകാന്തത മാത്രം ശേഷിച്ചു എനിക്കായ്.

तेरी हँसी में मैं अपने सारे दुख भूल गया था,
तेरी ख़ामोशी बन गई दिल की पुकार मेरे लिए।

നിന്റെ ചിരിയിൽ ഞാൻ മറന്നുപോയി എൻ ദുഃഖങ്ങളെല്ലാം,
നിന്റെ മൗനം മാത്രം ഒരു ശിക്ഷയായി എനിക്കായ്.

साथ देखे हुए सपने जब समय ने धीरे-धीरे मिटा दिए,
टूटे हुए दिल का रह गया बस इज़हार मेरे लिए।

ഒരുമിച്ച് കണ്ട സ്വപ്നങ്ങൾ കാലം പതിയെ മായിച്ചപ്പോൾ,
തകർന്ന ഹൃദയത്തിൻ കഷണങ്ങൾ മാത്രം എനിക്കായ്.

तुझे पाने की चाह में जो कुछ मैंने खो दिया,
मेरी ज़िंदगी बन गई एक सवाल बार-बार मेरे लिए।

നിന്നെ സ്വന്തമാക്കാൻ ഞാൻ നഷ്ടപ്പെടുത്തിയതെല്ലാം ഓർക്കുമ്പോൾ,
എൻ ജീവിതം തന്നെ ഒരു ചോദ്യമായി എനിക്കായ്.

जी आर, अपने ही शब्दों में लिख दिया दिल का इज़हार,
शायद ये ग़ज़ल बन जाए एक यादगार मेरे लिए।

ജീ ആർ, നീയെന്ന പേരിൽ ഞാൻ കുറിച്ചുവച്ച ഈ വരികൾ,
കാലം മായ്ക്കാത്തൊരു ഓർമ്മയായി നിലനിൽക്കട്ടെ എനിക്കായ്.

GR kaviyoor 
12 08 2026
( Thiruvalla , kaviyoor)

Wednesday, August 12, 2026

काल / കാലംBilingual Hindustani Ghazal

काल / കാലം

Bilingual Hindustani Ghazal
वक़्त हाथों से हमारे यूँ गुज़रता रहा,
हर नया दिन भी कहानी-सा गुज़रता रहा।

കാലം കൈവിട്ടു മൗനമായി കടന്നുപോയി,
ഓരോ ദിനവും പുതുകഥയായ് കടന്നുപോയി।

कल की यादों में दिल अक्सर ही खोया रहा,
बीता मौसम भी मगर दिल से गुज़रता रहा।

ഇന്നലെയോർമ്മകളിൽ മനസ്സു പലപ്പോഴും അലഞ്ഞുനിന്നു,
പോയ വസന്തം ഹൃദയത്തിലൂടെ കടന്നുപോയി।

सालों की राह में कितने ही मौसम बदले,
हर नया रंग पुराने रंग में ढलता रहा।

വർഷങ്ങളുടെ വഴിയിൽ എത്രയോ കാലങ്ങൾ മാറി,
ഓരോ നിറവും പഴയ നിറമായ് മാറിപ്പോയി।

जिन लम्हों को सँजोया था बड़ी उम्मीद से,
वक़्त की लहरों में हर सपना बिखरता रहा।

പ്രതീക്ഷയോടെ കാത്തുവെച്ച നിമിഷങ്ങൾ പലതും,
കാലത്തിൻ തിരകളിൽ ഓരോ സ്വപ്നവും അലിഞ്ഞുപോയി।

उम्र बढ़ती रही, चेहरे पे निशाँ आते रहे,
आईना चुपचाप मगर सच को दिखाता रहा।

വയസ്സു കൂടിയപ്പോൾ മുഖത്തും മാറ്റങ്ങൾ വന്നു,
കണ്ണാടി മൗനമായ് ജീവിതം കാട്ടിപ്പോയി।

कुछ निशाँ दिल में आज भी महफ़ूज़ हैं मेरे,
वक़्त मिटाता रहा, यादों में बसता रहा।

ചില അടയാളങ്ങൾ ഇന്നും ഹൃദയത്തിൽ പതിഞ്ഞുനിന്നു,
കാലം മായ്ച്ചിട്ടും ഓർമ്മയായി കടന്നുപോയി।

‘जी आर’ ने भी लिख दिया उम्र का अफ़साना,
वक़्त गुज़रता रहा, गीत मगर रहता रहा।

‘ജി ആർ’ കൂടി എഴുതിയീ ജീവിതകഥയിതാ,
കാലം കടന്നുപോയാലും പാട്ടായി ശേഷിച്ചുപോയി.

GR kaviyoor 
12 08 2026
( Thiruvalla , kaviyoor)

Tuesday, August 11, 2026

भूली हुई घंटी की ध्वनि

भूली हुई घंटी की ध्वनि

एक पुराने मंदिर के आँगन में
एक घंटी निःशब्द खड़ी थी।
बीते वर्षों की उँगलियों के निशान
उस पर जम चुके थे।

कभी उसकी ध्वनि से
प्रभात जाग उठता था।
बिना राह के आने वाले भी
उसकी आवाज़ में दिशा पाते थे।

वर्ष बीतते गए,
किसी ने उसे याद नहीं किया।
फिर एक दिन हवा की उँगलियों ने
उसे धीरे से छू लिया।

अचानक उठी उस घंटानाद में
सोई हुई स्मृतियाँ जाग उठीं।
वह सचमुच भूली नहीं थी—
वह समय द्वारा सँजोकर रखी गई एक पुकार थी।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

स्वतंत्रता का बीज

स्वतंत्रता का बीज

धरती के भीतर छिपा हुआ
एक छोटा-सा बीज स्वप्न देखता रहा।
चारों ओर के अँधेरे से अधिक
उसे अपने भीतर के प्रकाश पर विश्वास था।

बंधन की चट्टानों के बीच भी
जड़ों ने अपना मार्ग खोज लिया।
ऊपर खुला हुआ आकाश
उसके स्वप्न का आह्वान बन गया।

जब वर्षा की एक बूँद ने छुआ,
सोया हुआ जीवन जाग उठा।
पहली हरियाली की पत्ती पर
भोर ने स्वतंत्रता लिख दी।

तब मानो धरती ने कहा—
स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं,
वह उस बीज का साहस है
जो स्वयं को चीरकर ऊपर उठता है।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

कोयल का विराम

कोयल का विराम

कोयल के गीतों के बीच
एक पल का मौन उतर आया।
अनसुने संगीत की तरह
सारा वन प्रतीक्षा में ठहर गया।

पत्ते निःशब्द खड़े रहे,
हवा भी धीरे से मुड़ गई।
आने वाले स्वर की प्रतीक्षा में
भोर ने भी कान लगा दिए।

वह अनगाया हुआ क्षण
गीत से भी अधिक मधुर था।
मौन की गहराई में छिपकर
अगली धुन जन्म ले रही थी।

तभी समझ आया—
संगीत को केवल स्वर नहीं चाहिए,
हृदय को छूने के लिए
कभी-कभी एक विराम भी चाहिए।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

उँगलियों के बीच का समय

उँगलियों के बीच का समय

उँगलियों के बीच से
पानी-सा समय बहता गया।
जब उसे थामने की कोशिश की,
हथेलियों में केवल यादें रह गईं।

एक पल मुस्कान बन गया,
दूसरा आँसू में ढल गया।
बीते समय के पदचिह्न
हृदय पर अंकित रह गए।

जो कुछ लौटाया नहीं जा सकता था,
वह चुपचाप दूर होता गया।
आने वाले पल ही
द्वार पर प्रतीक्षा करते रहे।

तभी जाना—
समय हमसे दूर नहीं जा रहा,
हर बीतता हुआ क्षण
हमारे भीतर एक जीवन रच रहा है।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

कागज़ की नाव

कागज़ की नाव

बरसाती जलधारा में धीरे-धीरे
कागज़ की नाव बहती चली गई।
किनारे खड़ा एक बालमन
दूर के क्षितिज निहारता रहा।

कागज़ की छोटी-सी तह में
एक लंबी यात्रा छिपी थी।
लहरों की भाषा जाने बिना
उसने धारा पर विश्वास किया और बहती रही।

जब किनारे पीछे छूट गए,
मन फिर लौटना नहीं चाहता था।
सपनों के पंख भले न हों,
फिर भी उनमें आगे बढ़ने का साहस था।

अंततः भीगकर मिट गई वह,
फिर भी यात्रा व्यर्थ नहीं थी।
जिन-जिन लहरों को उसने छुआ,
उनमें एक सपना जीवित रह गया।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

धूल का ब्रह्मांड

धूल का ब्रह्मांड

धूल के एक कण में भी
समय की कहानी बसी थी;
अनदेखे संसारों को सँजोए
वह हवा के संग बहता रहा।

उसमें मिट्टी की सुगंध थी,
बीज का मौन स्वप्न भी;
कहीं तारों की धूल-सा
सृष्टि का रहस्य झिलमिला उठा।

हथेली से छुआ तो जाना—
कुछ भी वास्तव में छोटा नहीं;
अणु जितनी सूक्ष्म दुनिया में भी
पूरा ब्रह्मांड साँस लेता है।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अक्षरों के सिलसिल (गज़ल)

अक्षरों के सिलसिल (गज़ल)
एक ख़त और लिख दूँ, यही दिल का ख़याल रह गया,
जो कहना था तुमसे, वही बनकर सवाल रह गया।

तन्हाइयों की राहों में लिखता रहा तुझे,
हर अक्षर में छुपा हुआ दिल का मलाल रह गया।

गुज़रे हुए लम्हों की आहट मिली कभी,
मुड़कर जो देखा, बस तेरा ही ख़याल रह गया।

सूखे हुए पत्तों की तरह शाम ढल गई,
भीगी हुई यादों में बीता हुआ हाल रह गया।

चुपचाप मेरी आँख से आँसू निकल पड़े,
लब पर न आ सकी जो, वो बात कमाल रह गया।

जिन राहों पर कभी तेरे संग चला था मैं,
उन राहों में आज भी अपना सा विसाल रह गया।

वक़्तों ने मुझसे छीन लिए कितने ही ख़्वाब मगर,
तेरी यादों का दिल में अजब सा बहाल रह गया।

कितनी ही बातें थीं जो तुमसे कह न सका मैं,
होंठों पे ख़ामोशी थी, आँखों में मलाल रह गया।

तेरे आँसुओं में भीगी हुई वे बातें आज तक,
मेरी रूह की धड़कन में बनकर सवाल रह गया।

सोचा था भूल जाऊँगा तुझे उम्र के साथ मैं,
लेकिन तेरी यादों का मौसम बहाल रह गया।

‘जी आर’ ने अक्षरों में अपना दर्द लिख दिया,
जो दिल से निकल गया, वही उसका कमाल रह गया।

जी आर कवियुर 
10 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Sunday, August 9, 2026

तेरे मेरे दिल का तराना | നിന്റെ എന്റെ ഹൃദയത്തിൻ താളം

तेरे मेरे दिल का तराना | നിന്റെ എന്റെ ഹൃദയത്തിൻ താളം
A Bilingual Hindustani–Malayalam Ghazal
तेरे मेरे दिल का तराना बरसे,
तनम तनम का फ़साना बरसे।

നിന്റെ എന്റെ ഹൃദയത്തിൻ താളം പെയ്യുന്നു,
തനം തനം എന്നൊരു കാവ്യം പെയ്യുന്നു.

चाँदनी रातों में ख़्वाबों का बहाना बरसे,
तेरी यादों का कोई अफ़साना बरसे।

നിലാവിൻ രാവിൽ സ്വപ്നത്തിൻ മധുരം പെയ്യുന്നു,
നിന്റെ ഓർമ്മകളിൽ പ്രണയത്തിൻ കാവ്യം പെയ്യുന്നു.


सूनी राहों पे तेरी आहटें गूँजें,
मेरे होठों पे नया तराना बरसे।

ശൂന്യമായ വഴികളിൽ നിൻ കാൽച്ചുവടുകൾ മുഴങ്ങുന്നു,
എൻ ചുണ്ടുകളിൽ പുതുമയൊരു ഗാനം പെയ്യുന്നു.


भीगी पलकों में छुपे दर्द को छूकर,
तेरे प्यार का मीठा ज़माना बरसे।

നനഞ്ഞ മിഴികളിൽ ഒളിച്ച വേദനയെ തൊട്ട്,
നിൻ സ്നേഹത്തിൻ മധുരകാലം പെയ്യുന്നു.


रूह की गहराई में जब तू उतर जाए,
हर धड़कन में तेरा अफ़साना बरसे।

ആത്മാവിൻ ആഴങ്ങളിൽ നീയിറങ്ങുമ്പോൾ,
ഓരോ ഹൃദയമിടിപ്പിലും നിൻ കാവ്യം പെയ്യുന്നു.


दूरियों की ये दीवारें पिघल जाएँ,
मिलन का कोई ख़ूबसूरत बहाना बरसे।

അകലത്തിൻ മതിലുകളെല്ലാം അലിഞ്ഞുപോകുമ്പോൾ,
മിലനത്തിനൊരു മനോഹര നിമിത്തം പെയ്യുന്നു.


साँस-साँस में तेरी ख़ुशबू महकती रहे,
दिल की दुनिया में रंगीन ज़माना बरसे।

ശ്വാസംതോറും നിൻ സുഗന്ധം നിറഞ്ഞുനിൽക്കുമ്പോൾ,
ഹൃദയലോകത്ത് വർണ്ണമാർന്ന കാലം പെയ്യുന്നു.


तेरे नाम से रोशन हो मेरी हर शाम,
मेरी तन्हाई में तेरा तराना बरसे।

നിൻ നാമത്താൽ എൻ സന്ധ്യകൾ പ്രകാശിക്കുമ്പോൾ,
എൻ ഏകാന്തതയിൽ നിൻ ഗാനം പെയ്യുന്നു.

GR kaviyoor 
09 08 2026
( Thiruvalla, kaviyoor)