Saturday, June 20, 2026

योग से निरोग जीवन

 योग से निरोग जीवन



जीवन का सहारा, जीवन की छाँव,
स्वास्थ्य का दीप जलाता है योग।
नियमित अभ्यास की शक्ति से,
हर दिन नव उत्साह जगाता है योग।

ऋषियों ने जो पावन पथ दिखलाया,
उसका सुंदर संदेश है योग।
संयम, शांति और श्रेष्ठ विचारों का,
मन में मधुर संचार है योग।

हर प्रभात इसे अपनाइए,
रोग और दुःख दूर भगाइए।
स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति हेतु,
जीवन का अनुपम वरदान है योग।

नई किरणें जीवन में भरकर,
आशा के फूल खिलाता है योग।
तन और मन दोनों के लिए,
सुख-समृद्धि का मधुर राग है योग।

जी आर कवियुर
21-06-2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

अनिद्र स्वप्न

अनिद्र स्वप्न

रात में पलकों ने विश्राम न पाया,
मन में अनेक चित्र उभरते रहे,
अभिलाषाओं ने रंगों को सजाया,
आने वाले कल की राहें दिखीं।

चाँदनी ने पथों पर उजास बिखेरा,
विचार दूर क्षितिजों तक पहुँच गए,
कल्पनाओं ने अपने पंख फैलाए,
लक्ष्य दीपक बनकर आगे चमका।

नई भोर की प्रतीक्षा बनी रही,
जागृति ने नए मार्ग खोज लिए,
संकल्प ने भीतर शक्ति संजोई,
जीवन ने उपलब्धियाँ लिख डालीं।

जी आर कवियुर 
21 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

उस पार का प्रकाश

उस पार का प्रकाश

दूर किनारे पर एक उजाला चमका,
लहरें अपना संदेश तट तक लाई,
इच्छा नाव बनकर आगे बढ़ी,
साहस ने हर कदम का मार्ग दिखाया।

विशाल विस्तार नदी-सा फैला,
चप्पुओं में उम्मीद की गति जागी,
अनदेखे दृश्य पास चले आए,
हृदय में विस्मय के पुष्प खिले।

उस आभा में नया युग दिखाई दिया,
कल्पना ऊँचाइयों की ओर बढ़ी,
सफलता मुस्कान लेकर आई,
जीवन सुंदरता के साथ चलता रहा।


जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

ओस की बूंद की यात्रा

ओस की बूंद की यात्रा

भोर में पत्ते पर मोती बनकर जन्मी,
शीतलता की गोद में चुपचाप ठहरी,
किरणों ने छूकर चमक भर दी,
प्रकृति ने स्नेह से उसे अपनाया।

पंखुड़ी के किनारे धीरे-धीरे चली,
सुगंध भरे मार्गों का अनुसरण किया,
मंद समीर के संग दूरियाँ देखीं,
अनुभवों को अपने भीतर संजोया।

सूरज की ऊष्मा में विलीन हो गई,
असीम गगन की ओर ऊपर उठी,
बदलते रूपों में सत्य को पहचाना,
उसकी कथा नए सफर में आगे बढ़ी।

जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

खिड़की के उस पार

खिड़की के उस पार

प्रभात मधुर मुस्कान सजाकर खड़ा है,
पक्षियों का समूह सुरीले स्वर बिखेरता है,
घास पर ओस मोतियों-सी चमकती है,
मन को सुंदर दृश्य सहला जाते हैं।

दूर कहीं एक पगडंडी मुड़ती जाती है,
यात्राएँ नई कथाएँ बुनती रहती हैं,
समीर सुगंध लेकर पास चली आती है,
आशाएँ अंतर में चुपचाप खिलती हैं।

नीले गगन में मेघ रथ तैरते हैं,
विचार पंख फैलाकर उड़ने लगते हैं,
अनुभूतियाँ नए रंगों से सजती हैं,
सृष्टि अद्भुत रूप धारण कर लेती है।

जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Wednesday, June 17, 2026

कौन कहता है मैं ?!!

 कौन कहता है मैं ?!!



नमस्कार मित्रों, मैं हूं जी आर कवियूर। लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, "क्या सचमुच आप कवि हैं?"

तब मैं हंसकर कह देता हूं—

कौन कहता है मैं कभी कवि हूं, हां, मैं कपी जरूर हूं आज भी। चंचल होकर कूदता रहता, कभी-कभार कुछ लिखता भी।

मन में जो भी खुराफात आई, शब्दों में उसे ढाल दिया। हां, मैं रहने वाला कपीयूर का, कहते-कहते कवियूर हुआ।

डाल-डाल पर मन उड़ जाता, सपनों का संसार सजाता। हंसी, शरारत, यादों के मोती, कागज़ पर चुपचाप बिखराता।

न नियमों में खुद को बांधा, न राहों का हिसाब रखा। दिल ने जो भी बात सुनाई, उसका सीधा जवाब लिखा।

कभी धूप का गीत सुनाया, कभी सावन की बात कही। जीवन की छोटी घटनाओं में, अपनी एक दुनिया गढ़ी।

कपी हूं तो चंचलता मेरी, कवि हूं तो संवेदना भी। दोनों मिलकर साथ निभाते, यही पहचान है अब मेरी।

यदि मेरी बातों में आपको अपना अक्स दिख जाए, तो समझ लीजिएगा— मेरी खुराफात सफल हो जाए।

जी आर कवियुर 
15 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

इकसठ का सफ़र (ग़ज़ल)

 

इकसठ का सफ़र (ग़ज़ल)




मैं आज इकसठ का हूँ मगर दिल से जवान हूँ,
ज़िंदगी के नशे में अब तलक डूबा हुआ हूँ।

सच को लेकर इस जहाँ में कब किसी से क्या कहा हूँ,
अपने ही एहसास की दुनिया में अक्सर रह गया हूँ।

मन में जो आया उसे काग़ज़ पे लिखना चाहता था,
जाने कितनी बार ख़ुद को रोक कर फिर रह गया हूँ।

अंगूठे की कैद में दिन-रात यूँ उलझा रहा मैं,
मोबाइल के जाल में अनजाने ही फँस गया हूँ।

चाँद खिड़की पर खड़ा था, चाँदनी आवाज़ देती,
स्क्रीन की चमक में लेकिन उससे भी कट गया हूँ।

दोस्त मिलते हैं मुझे अब सिर्फ़ तस्वीरों के भीतर,
भीड़ में रहकर भी देखो किस क़दर तनहा हुआ हूँ।

अपनों के उजले कल की ख़ातिर दूरियों को चुन लिया,
आज उनको कामयाब देख कर खुश हो रहा हूँ।

मैं 'जी आर' कहता हूँ, सुन लो मेरी पहचान भी,
उम्र के इस मोड़ पर भी ख़्वाब में जीता हुआ हूँ।

जी आर कवियूर
16 06 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

सच्ची मित्रता: सबसे सुरक्षित निवेश (बाजार जोखिम से परे)

 सच्ची मित्रता: सबसे सुरक्षित निवेश  
(बाजार जोखिम से परे)

ऐसे संबंध खोजो जो समय के साथ रहें,  
जहाँ अपनापन हर पल सदा बहें,  
साझी मुस्कान दिन को रोशन बनाए,  
सहारा बनकर जीवन को संभाले।  

विश्वास की डोर दूरी मिटा देती है,  
मीठे शब्दों से पीड़ा घटा देती है,  
निष्ठावान मित्र बोझ हल्का करते हैं,  
शांत उपस्थिति घाव भर देती है।  

सच्चा साथ हर वर्ष को समृद्ध बनाए,  
निर्मल रिश्ते भय और चिंता भगाए,  
ऐसी मित्रता ही असली कमाई है,  
जो हर परिस्थिति में साथ निभाई है।  

जी आर कवियुर 
16 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Sunday, June 14, 2026

तुम अभी भी युवा हो

तुम अभी भी युवा हो

उम्र सिर्फ एक संख्या है  
सपने मन को जगाते रहते हैं  
हर सुबह नए रास्ते खोलती है  
और आगे बढ़ने की ताकत देती है  

भविष्य के दरवाज़े कभी बंद नहीं होते  
आशा चुपचाप साथ चलती है  
लक्ष्य आगे बढ़ने की हिम्मत देते हैं  
और संदेह धीरे-धीरे मिट जाते हैं  

अपनी सोच को साफ और मजबूत रखो  
दिल में हिम्मत बनाए रखो  
हर पल जीवन फिर से शुरू होता है  
जब तुम नया आरंभ चुनते हो

जी आर कवियुर 
14 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)



तेरे बिना(ग़ज़ल)


तेरे बिना
(ग़ज़ल)

कैसे इंकार करूँ इन बीती यादों को,
दिल ने सँभाल रखा है सारी यादों को।

बरसात की हर बूँद तेरा ज़िक्र छेड़ती है,
मैं सुनता रह जाता हूँ तेरी बातों को।

तन्हाई की चादर में जब रात सिमटती है,
आँखें ढूँढ़ा करती हैं गुज़री रातों को।

भीगा हुआ मौसम भी तेरा नाम लेता है,
दिल याद किया करता है उन बरसातों को।

वक़्त की धूल ने ढक डाले कितने चेहरे,
दिल गिनता ही रहता है उन मुलाक़ातों को।

तेरी महक अब भी साँसों में बसी है ऐसे,
जैसे कोई सँजोए रखे अपने जज़्बातों को।

दुनिया ने बदल डाले कितने रंग मगर,
हम भूल न पाए अपने ही हालातों को।

मैं 'जी आर' अब भी भूल न पाया उसे,
दिल से न मिटा पाया बीती यादों को।


जी आर कवियुर 
12 06 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

ईर्ष्या की आग — അസൂയയുടെ തീ(द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ)

ईर्ष्या की आग — അസൂയയുടെ തീ
(द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ)

जलन की आग में इंसान खुद ही जल जाता है,
दूसरों को हराने चला, अपना घर भी जल जाता है।

അസൂയയുടെ തീയിൽ മനുഷ്യൻ താനേ കത്തിപ്പോകുന്നു,
മറ്റൊരാളെ തോൽപ്പിക്കുവാൻ സ്വന്തം വീടും കത്തിപ്പോകുന്നു।

किसी के फूल खिलें तो उसे तकलीफ़ होती है,
वो काँटे बो के भी खुशियों का सपना सजाता है।

മറ്റൊരാളിൽ പൂക്കൾ വിരിയുമ്പോൾ മനസ്സ് വേദനിക്കും,
മുള്ളുകൾ വിതച്ചിട്ടും സന്തോഷത്തിൻ സ്വപ്നം കാണുന്നു।

उसे आईना दिखाओ तो नज़रें फेर लेता है,
हर इक कमी को अपनी वो पर्दों में छुपाता है।

കണ്ണാടി കാട്ടിയാലും മുഖം തിരിച്ചു നടക്കുന്നു,
സ്വന്തം കുറവുകൾ എല്ലാം മറവിയിൽ ഒളിപ്പിക്കുന്നു।

परिंदे उड़ रहे हों तो उसे चैन कहाँ मिलता,
वो आसमान को भी अपनी हदों में बाँधता है।

പറവകൾ പറന്നുയർന്നാൽ അവന് ശാന്തി ലഭിക്കില്ല,
ആകാശത്തെയും തൻ വേലിക്കുള്ളിൽ പൂട്ടാൻ നോക്കുന്നു।

जो दिल से साफ़ होते हैं वो सबका मान करते हैं,
मगर तंग दिल हमेशा फ़ासलों को बढ़ाता है।

വിശാല ഹൃദയമുള്ളവർ എല്ലാരെയും ചേർത്തിടും,
ഇടുങ്ങിയ മനസ്സ് മാത്രം അകലങ്ങൾ വർധിപ്പിക്കുന്നു।

न सूरज रुक सका है, न नदी ठहर सकी है,
जहाँ सृजन है सच्चा, वहीं उजाला आता है।

സൂര്യനും നിൽക്കുകയില്ല, നദിയും നിന്നുപോകില്ല,
സത്യമായ സൃഷ്ടിയുള്ളിടത്ത് പ്രകാശം ജനിക്കുന്നു।

मैं 'जी आर' कहता हूँ, ये दुनिया जलन से कब तलक जी पाएगी,
मोहब्बत का दिया ही आख़िर हर अँधेरा हराता है।

ഞാൻ എന്ന 'ജി ആർ' പറയുന്നു, അസൂയയുടെ വഴി ലോകം എത്ര ദൂരം പോകും,
സ്നേഹത്തിൻ ദീപമത്രേ ഒടുവിൽ എല്ലാ ഇരുളും അകറ്റുന്നത്।

ജി ആർ കവിയൂർ
(GR Kaviyoor)
12 06 2026
( Kaviyoor, thiruvalla)

मन जो रूठा (गीत)

मन जो रूठा (गीत)

गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम,
मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम।
अपने जैसा तुझे गर बना ना सके,
खुद को ही तेरे जैसा बना लेंगे हम...

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

दिल जैसा भी हो, करीब पाएंगे हम,
शिकवे भुला कर, गले से लगाएंगे हम।
हो बैर दुनिया से तो परवाह नहीं,
तेरी खातिर तो दुश्मनी भी भूल जाएंगे हम।

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

फासलों के दाग जितने भी हों दरमियां,
मोहब्बत की बारिश से मिटाएंगे हम।
तेरे दीदार की हसरत कुछ ऐसी जगी,
कि दुनिया के आगे बेनकाब हो चुके हैं हम।

गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम...

जी आर कवियुर 
11 06 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

कृत्रिमता और पाखंड | കൃത്രിമത്വവും കപടതയും (Ghazal) | GR kaviyoor

कृत्रिमता और पाखंड | കൃത്രിമത്വവും കപടതയും (Ghazal) | GR kaviyoor 



ज़ुबां पे अमन है, पर दिल में नफ़रत का साया है,
कौवे ने मोर के पंखों का रूप सजाया है।

വാക്കിൽ മതേതരത്വം, ഉള്ളിൽ കറുപ്പിൻ്റെ വേഷമാണ്,
പീലി ചൂടും കാക്ക തൻ കപട വിലാസമാണ്.

दौलत बहा कर उसने ये मसीहा का नाम कमाया है,
सच को छुपाने के लिए भेड़ की खाल में भेड़िया आया है।

പണം വാരിയെറിഞ്ഞു ചുളുവിൽ വാങ്ങിയ പൊങ്ങച്ച നാട്യമാണ്,
സത്യം മറയ്ക്കാൻ തീർത്തൊരു ആട്ടിൻതോലണിഞ്ഞ ചെന്നായുടെ കപടമാണ്.

महफ़िल सजाता है वो हरसू अमन की बातें कर,
अंदर मगर उस शख़्स ने मज़हब को छुपाया है।

വേദികൾ തീർത്തു മതേതരത്വം പ്രസംഗിക്കും നേരം,
ഉള്ളിൽ മതത്തിൻ്റെ കറുത്ത വംശീയ രൂപമാണ്.

महफ़िल में जो मारता है पत्थर पीठ पीछे सदा,
ख़त में उसी ने भाई कह के गले लगाया है।

കൂട്ടത്തിൽ വന്ന് ഒളിയമ്പെയ്തു ചിരിക്കും മനുഷ്യൻ,
നേരിൽ വന്ന് പുകഴ്ത്തിപ്പാടും കപട ഭാവമാണ്.

मेरी कला को वो कागज़ का फूल कहता है मगर,
उसने तो ख़ुद को ही एक बुत बनाया है।

കൃത്രിമമെന്നു പറഞ്ഞ് എൻ കലയെ അളക്കാൻ വരും,
നിർജ്ജീവമായൊരു കല്ലിൻ്റെ ഉള്ളുള്ള കോലമാണ്.

दूसरों से नफ़रत कर के वो समझता है जीत अपनी,
पर नफ़रत की आग में उसने अपना ही घर जलाया है।

മറ്റുള്ളവരെ വെറുത്തു താൻ ജയിച്ചു എന്നു കരുതും,
ഉള്ളിലെ തീയറിയാതെ വെന്തുരുകും സ്വന്തം ജന്മമാണ്.

ज़िंदा दिल हैं जो, वो तो जेल को भी चमन कर दें,
काले दिलों ने तो जन्नत को भी दोज़ख़ बनाया है।

നരകത്തെയും സ്വർഗ്ഗമാക്കും ശുദ്ധമാം ഹൃദയങ്ങൾ,
ഇടുങ്ങിയ ചിന്തയാൽ സ്വർഗ്ഗവും നരകമാക്കും കോലമാണ്.

हाथी चलेगा अपनी ही धुन में सदा ऐ 'जी आर',
कुत्तों के भौंकने से किसने अपना सुकूँ गँवाया है।

പട്ടി കുരച്ചാലും ആന തൻ പാതയിൽ നീങ്ങിടും 'ജി ആർ',
നിൻ വരികളിൽ എന്നും ഉണരുന്നത് ആത്മാവിൻ്റെ പ്രകാശമാണ്.
GR kaviyoor 
11 06 2026

रहे राह पर,

रहे राह पर,

नयना बिछाए रहे राह पर,
तेरे आने की आस रही आह पर।

ठहरी हुई थी मेरी निगाह पर,
तेरी यादों की छाँव रही पनाह पर।

दिल ने सजाए ख़्वाब हर चाह पर,
अश्कों की मुहर लग गई गवाह पर।

मौसम ने लिख दी दास्ताँ चाह पर,
फूलों की हँसी मिट गई तबाह पर।

रातें गुज़र गईं तेरी निगाह पर,
साँसें ठहरी रहीं एक आह पर।

दुनिया ने लाख प्रश्न किए राह पर,
हम चलते ही रहे अपनी चाह पर।

तन्हाइयों का राज रहा आह पर,
यादों का कारवाँ चला राह पर।

मिलने की एक लौ जली चाह पर,
दिल की नज़र टिकी रही राह पर।

मैं "जी आर" लिखता रहा दिल की चाह पर,
एक उम्र कट गई तेरी ही राह पर।


जी आर कवियुर 
11 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

श्वास बनता जीवन

श्वास बनता जीवन

भोर की पहली साँस के साथ,
जीवन फिर से जाग उठा।
हर पल की लय में,
समय ने अपना संगीत बिखेरा।

हँसी और पीड़ा दोनों में,
अर्थ खिलते चले गए।
यात्रा के हर कदम पर,
अनुभव फूलों से खिल उठे।

अनजाने बीत गए दिन,
हृदय में प्रकाश बन गए।
श्वास बनता यह जीवन,
आशा बनकर चलता रहा।

GR kaviyoor 
10 06 2026

अदृश्य सत्य

अदृश्य सत्य

अनदेखी राहों के बीच,
सत्य कहीं छिपा हुआ था।
जो शब्द कभी कह न सके,
उसे खामोशी ने प्रकट किया।

छायाओं से भरे क्षणों में,
प्रकाश ने अपना अर्थ पाया।
ओट की पतली परत के पीछे,
जीवन ने अपना चेहरा दिखाया।

बिना खोजे मिले उत्तर,
मन में उजाला बन गए।
उस अदृश्य सत्य के साथ,
ज्ञान भी बढ़ता गया।

Gr kaviyoor 
10 06 2026

स्थिर लहर

स्थिर लहर

समुद्र तट की खामोशी में,
एक लहर स्थिर हो गई।
आगे बढ़ने की चाह होते हुए भी,
वह एक पल को ठहर गई।

आकाश की नीली आँखों में,
संध्या के रंग झिलमिला उठे।
लहरों का छिपा हुआ संगीत,
हृदय में गूंजता रहा।

गति के भीतर की निस्तब्धता,
जीवन का पाठ सिखा गई।
उस स्थिर लहर में,
समय स्वयं प्रतिबिंबित हुआ।


जी आर कवियुर 
10 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

सूर्य और अंधकार का संवाद

सूर्य और अंधकार का संवाद


गहरे अंधकार ने एक दिन चमकते सूर्य से पूछा
मैं तुम्हें देखूँ तो कैसे मन के इस विचार ने पूछा

उत्तर मिला कि मिटना होगा तुम्हें मेरे प्रकाश में
क्या तुम खो सकते हो खुद को इस अनोखे द्वार ने पूछा

अस्तित्व अपना खोकर ही कोई पा सकता है तुमको
दीये ने टिमटिमाते हुए रातों के संसार से पूछा

जो छुपाता है वही तो रूप देता है उजाले को
यही भेद सुबह होते ही गिरते हुए अंधकार ने पूछा

पतंगा जानता है जलकर ही उसकी पहचान बनती है
सुलगती आग से फिर क्यूँ दिल की इस पुकार ने पूछा

जिसे हम अंत कहते हैं वो बस एक नई शुरुआत है
पतझड़ के डर से खिलते हुए फूलों के हार ने पूछा

मैं ढूँढूँ कहाँ तुमको जब तुम हर कण में समाए हो
राहगीर ने समंदर के बहते हुए पानी की धार ने पूछा

जहाँ तुम हो वहाँ तो कोई और रह नहीं सकता
यह सुंदर दृश्य देखने की चाह में इस संसार ने पूछा

कह रहे 'जी आर' कविता मौन बातचीत का रूप है
जो सदियों से जीवन और मृत्यु के इस पार ने पूछा

जी आर कवियुर 
08 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽद्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ

मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽ
द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ


मौन में तेरी याद की ठहरी नमी है ग़ज़ल,
दिल से उठती दर्द की गहरी नमी है ग़ज़ल।

മൗനത്തിൽ നിൻ ഓർമ്മയുടെ തങ്ങി നനവാം ഗസൽ,
ഹൃദയത്തിൽ വേദനയുടെ ആഴ്നനവാം ഗസൽ।

आँख में ठहरा हुआ इक अश्क जब कहने लगे,
वेदना की बोलती फिर ख़ामुशी है ग़ज़ल।

കണ്ണീരായ് തങ്ങി നിൽക്കുന്നൊരു തുള്ളി സംസാരിക്കിൽ,
വേദനയുടെ മൗനഭാഷ വെളിപ്പെടുത്തും ഗസൽ।

रात की तन्हाइयों में चाँद जब सुनता मुझे,
चाँदनी के लब पे आकर जो थमी है ग़ज़ल।

രാവിൻ ഏകാന്തതയിൽ ചന്ദ്രൻ ചെവികൊടുക്കുമ്പോൾ,
നിലാവിൻ അധരങ്ങളിൽ മൗനമായി തങ്ങും ഗസൽ।

तेरी यादों की फुहारों में भीगता है दिल,
अश्क की धारा में बरसों से धुली है ग़ज़ल।

നിൻ സ്മൃതികൾ മഴയായി ഹൃദയത്തിൽ പെയ്യുമ്പോൾ,
അശ്രുനദിയിൽ കഴുകി തെളിഞ്ഞു നിൽക്കും ഗസൽ।

सूने घर के हर किसी कोने में तेरी आहटें,
इक उदासी की सदा बनकर जमी है ग़ज़ल।

ശൂന്യമായ വീടിൻ ഓരോ കോണിലും നിൻ ചുവടൊച്ച,
ഏകാന്തതയുടെ സ്വരമായി മുഴങ്ങിനിൽക്കും ഗസൽ।

खोए लम्हों की महक सी साथ चलती है सदा,
बीते सपनों की कोई प्यारी गठरी है ग़ज़ल।

മാഞ്ഞുപോയ നിമിഷങ്ങൾ സുഗന്ധമായി കൂടെവന്ന്,
സ്വപ്നങ്ങളുടെ ഭാണ്ഡമേന്തി നടന്നുപോകും ഗസൽ।

जब सफ़र में हमसफ़र कोई न मेरे साथ था,
मेरे क़दमों के निशाँ संग ही चली है ग़ज़ल।

ജീവിതയാത്രയിൽ കൂട്ടായി ആരുമില്ലാതിരുന്നപ്പോൾ,
എൻ കാൽപ്പാടുകൾക്കൊപ്പം നടന്നുപോയി ഗസൽ।

मैं 'जी आर' अपनी ख़ामोशी को जब आवाज़ दूँ,
दिल की हर धड़कन में तब से बसी है ग़ज़ल।

ഞാൻ 'ജി ആർ' എൻ മൗനത്തിന് ശബ്ദമേകിയ നാളിൽ,
എൻ ഹൃദയമിടിപ്പിനുള്ളിൽ വസിക്കുന്നിതാ ഗസൽ।

GR kaviyoor 
08 06 2026
(Kaviyoor, thiruvalla)

വിരഹത്തിൻ്റെ ഗസൽ / विरह की ग़ज़ल

വിരഹത്തിൻ്റെ ഗസൽ / विरह की ग़ज़ल

तेरे बिन कैसे ये दिन गुज़रेंगे,
तेरी यादों में तो ये साल गुज़रेंगे।

നീയില്ലാതെ എങ്ങിനെ ദിനങ്ങൾ നീങ്ങും,
നിന്നോർമ്മകളിൽ വർഷങ്ങൾ നീങ്ങും.

थमता नहीं कभी ये दिल का तालाब,
रात के इस अंधेरे के साए में गुज़रेंगे।

നിശ്ചലമാകുന്നില്ല മനസ്സെന്ന തടാകം,
നിശയുടെ നീരാളി പിടുത്തത്തിൽ നീങ്ങും.

इन बिना नींद की रातों में जो भूल नहीं पाते,
वो साए चारों ओर इस रौशनी में गुज़रेंगे।

നിദ്രയില്ലാ രാവുകളിൽ മറക്കുവാനാവാത്ത,
നിഴലുകൾ നിറയുന്നു ചുറ്റും നിലവിൽ നീങ്ങും.

धुंधली सी यादों की ये जो dunia है,
तेरे प्यार के बिना सूनी ही गुज़रेंगे।

നിറം മങ്ങിയ ചിന്തകൾ തൻ ലോകം,
നിൻ പ്രണയമില്ലാതെ ശൂന്യമായി നീങ്ങും.

हर एक सांस में जो बसी है वो चाहत,
तुझ तक पहुँचने की राह में गुज़रेंगे。

നിശ്വാസ വായുവിൽ പോലും നിറയുന്ന മോഹം,
നിന്നിലേക്കണയാൻ മാത്രമായി നീങ്ങും.

लमहे जहाँ गिर रहे हैं इस रास्ते पर,
तेरे कदमों के निशां ढूंढते हुए गुज़रेंगे।

നിമിഷങ്ങൾ കൊഴിഞ്ഞു വീഴുന്ന പാതയിൽ,
നിൻ കാൽപ്പാടുകൾ തേടി എൻ ഹൃദയം നീങ്ങും.

जिस बात को तूने नासमझ कर छोड़ दिया था,
वो रोज़ मुझे तड़पाते हुए गुज़रेंगे।

നിസ്സാരമെന്നു കരുതി നീ തള്ളിയ വാക്ക്,
നിത്യേനയെന്നെ നീറ്റിക്കൊണ്ടു നീങ്ങും.

इस खामोश विरह के उदास साहिल पर,
तेरी यादों की कश्ती चलाते हुए गुज़रेंगे।

നിശ്ശബ്ദമീ വിരഹവേദനയുടെ തീരത്ത്,
നിൻ്റെ ഓർമ്മകളുടെ തോണി തുഴഞ്ഞു നീങ്ങും.

अगर कोई और जनम हो तो हम साथ होंगे,
इसी विरह के सुकून के साथ गुज़रेंगे।

ഇനിയൊരു ജന്മമുണ്ടെങ്കിൽ നമ്മളൊന്നായ്,
ഇതേ വിരഹത്തിൻ സുഖവുമായി നീങ്ങും.

जी आर के दिल में लहरें उठती हैं सदा,
तेरी उस अमर मौजूदगी की याद में गुज़रेंगे।

ജീ ആറിൻ്റെ ഉള്ളിൽ തിരമാല തീർക്കുന്നു,
ജീവനാം നിൻ്റെ സാമീപ്യം ഓർത്തു നീങ്ങും.

GR kaviyoor 
07 06 2026
( Kaviyoor,Thiruvalla)

बहता हुआ समय

बहता हुआ समय

नदी की तरह समय बहता रहा,
पल दूर कहीं निकलते गए।
उन्हें थामे रखने की चाह में भी,
वे हाथों में ठहर न सके।

भोर और संध्या की तरह,
दिन बदलते ही चले गए।
हँसी और पीड़ा के संग,
जीवन अपनी कथा बुनता रहा।

बीत गया हर एक पल,
याद बनकर चमकता रहा।
बहते हुए समय के साथ,
मन भी परिपक्व होता गया।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

तेरी ही परछाई

तेरी ही परछाई है

तेरी यादों की छाया है, तेरी ही परछाई है,
इस सूने घर के हर कोने में गहरी तन्हाई है।

सूना आँगन, मौन किताबें, चुप पूजा की चौखट,
तेरे बिन हर शय ने जैसे ओढ़ी हुई जुदाई है।

बर्तन, चौखट, खाली बिस्तर, सब गुमसुम बैठे हैं,
इन बेजान गवाहों में भी तेरी ही सच्चाई है।

दूधवाला आवाज़ लगाता, सब्ज़ीवाला आता है,
लेकिन दरवाज़े पर अब किसकी वह सुनवाई है।

बिल्ली रोए दूध की ख़ातिर, कुत्ता भी बेचैन फिरे,
घर के हर जीव ने तेरी कमी की पीर उठाई है।

डाँट तुम्हारी, प्यार तुम्हारा, दोनों याद बहुत आते,
मीठी-सी उस झिड़की में भी कितनी बड़ी भलाई है।

दूर गगन में चाँद की सूरत जब-जब नज़र आती है,
लगता है माँ मुस्काती है, देती फिर बधाई है।

आँखें नम हो जाती हैं जब यादों का मौसम आए,
दिल ने तेरी ममता की हर दौलत आज बचाई है।

कहता है 'जी आर' कि माँ, तू कहीं गई ही नहीं,
हर ख़ामोशी में जैसे तेरी ही परछाई है।

 जी आर कवियुर 
07 06 2026

दिन का अंतिम क्षण

दिन का अंतिम क्षण

सूरज की मद्धिम होती आभा,
क्षितिज में विलीन हो गई।
दिन का अंतिम क्षण,
संध्या की गोद में उतर आया।

पेड़ों की फैली परछाइयों ने,
लंबे रास्ते खींच दिए।
पक्षियों की घर लौटती उड़ान,
आकाश पर अपनी रेखा छोड़ गई।

दिनभर की सारी व्यस्तताएँ,
खामोशी में खो गईं।
दिन के अंतिम क्षण में,
मन ने शांति पा ली।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)





पीछे मुड़कर देखती राहें

पीछे मुड़कर देखती राहें

जो राहें कभी चलकर गुज़रीं,
याद बनकर पीछे ठहर गईं।
समय के कोमल पदचिह्न,
मन में अंकित रह गए।

जब पेड़ों ने छाया फैलायी,
बीते दिन फिर जाग उठे।
भूले हुए समझे जाने वाले पल,
फिर सामने आ खड़े हुए।

पीछे मुड़कर देखती राहों में,
यात्रा का अर्थ दिखाई दिया।
बीते हुए हर एक कदम ने,
आज के मुझको गढ़ा था।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

आँखों की खामोशी

आँखों की खामोशी

नज़रों में ठहरी हुई थीं,
अनकही कहानियाँ सभी।
शब्दों की आवश्यकता न थी,
दिल सब कुछ सुन रहा था।

मुस्कान की हल्की परत में,
दर्द कहीं छिपा हुआ था।
गहरी दृष्टि की गहराई में,
यादें अब भी चमक रही थीं।

कभी-कभी एक पल ही,
दिलों को बात करने को काफी है।
आँखों की उस खामोशी में,
सच्चाइयाँ जीवित थीं।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

प्रकाश की पंक्तियाँ

प्रकाश की पंक्तियाँ

भोर की पहली किरणें,
खिड़की से भीतर उतर आईं।
अंधकार की मुड़ी परतों पर,
प्रकाश ने अपनी पंक्तियाँ लिखीं।

पेड़ों की छायाओं के बीच,
सुनहरी आभा फैल गई।
नए दिन की मधुर साँस,
धरती पर भरती चली गई।

हर उजली रेखा में,
आशा खिलती दिखाई दी।
प्रकाश की उन पंक्तियों संग,
जीवन आगे बढ़ता गया।

जी आर कवियुर 
 06 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)

तेरी तन्हाई से लगता है डर,
तेरी रुसवाई से लगता है डर।

न जाने कौन-सा मौसम बदल दे रंग अपना,
तेरी जुदाई से लगता है डर।

बहुत मासूम है ये दिल, फ़रेबों को नहीं समझे,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

कभी जो ख़्वाब आँखों में सजाकर मुस्कुराते थे,
उसी परछाई से लगता है डर।

ये दुनिया दर्द वालों की कहाँ तक साथ देती है,
किसी रुसवाई से लगता है डर।

मोहब्बत की गली में जब भी आगे बढ़ने लगता हूँ,
नई दुश्वारी से लगता है डर।

कभी जो रौशनी बनकर मेरे घर में उतरती थी,
उसी अंगड़ाई से लगता है डर।

न जाने किसलिए अब दिल ये हर आहट पे चौंके है,
तेरी शहनाई से लगता है डर।

मैं "जी आर" आज भी तेरा नाम लेकर सोचता हूँ,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

जी आर कवियुर 
 05 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Thursday, June 11, 2026

मन जो रूठा (गीत)

 मन जो रूठा (गीत)


गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम,
मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम।
अपने जैसा तुझे गर बना ना सके,
खुद को ही तेरे जैसा बना लेंगे हम...

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

दिल जैसा भी हो, करीब पाएंगे हम,
शिकवे भुला कर, गले से लगाएंगे हम।
हो बैर दुनिया से तो परवाह नहीं,
तेरी खातिर तो दुश्मनी भी भूल जाएंगे हम।

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

फासलों के दाग जितने भी हों दरमियां,
मोहब्बत की बारिश से मिटाएंगे हम।
तेरे दीदार की हसरत कुछ ऐसी जगी,
कि दुनिया के आगे बेनकाब हो चुके हैं हम।

गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम...

जी आर कवियुर 
11 06 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Wednesday, June 10, 2026

नक़ाब उठने दो - അഴിയട്ടെ മുഖംമൂടികൾ (ബഹുഭാഷാ ഗസൽ / bilungal gazhal)

 नक़ाब उठने दो - അഴിയട്ടെ മുഖംമൂടികൾ (ബഹുഭാഷാ ഗസൽ / bilungal gazhal)




मज़हब के नाम पर यहाँ नफ़रत बढ़ाते हैं,
ओढ़े हुए वो चेहरे पे शराफ़त बढ़ाते हैं।

മതത്തിന്റെ പേരിൽ ഇങ്ങവർ വിദ്വേഷം വളർത്തുന്നു,
മര്യാദതൻ മുഖമൂടിയണിഞ്ഞവർ ആ വേഷം വളർത്തുന്നു।

वो धर्म की आड़ में नफ़रत का क़ायदा बढ़ाते हैं,
इंसानियत को भूल कर, बस फ़ासला बढ़ाते हैं।

മർത്ത്യത്വം മറന്നു മനുഷ്യരിന്നീ മണ്ണിൽ അലയുമ്പോൾ,
നിയമങ്ങൾ മാറ്റി അവർ തമ്മിലകൽച്ച വളർത്തുന്നു।

कुर्सी की ख़ातिर दिलों में सियासत बढ़ाते हैं,
मोहब्बत की राह रोक कर, वो नदामत बढ़ाते हैं।

സ്നേഹത്തിൻ ഭാഷ തകർത്തു ഭരിക്കും ഭരണാധികാരികൾ,
അടിയറവു പറയാതെ സിംഹാസനക്കൊതി വളർത്തുന്നു।

बग़ल में छुरी रख के वो बस अदालत बढ़ाते हैं,
मीठी ज़ुबाँ से यहाँ अपनी तिजारत बढ़ाते हैं।

പുഞ്ചിരി തൂകി പുറകിൽ കപടത കാട്ടും ജഗത്തിൽ,
മധുരം പൊതിഞ്ഞ വാക്കുകളാൽ അവർ ചതി വളർത്തുന്നു।

दीवारों को ऊँचा उठा कर वो रक़ाबत बढ़ाते हैं,
एक लहर को भूल कर, अपनी वहशत बढ़ाते हैं।

ഒരേ ചോരയോടും ഒരേ ശ്വാസത്തോടും വസിക്കിലും,
മതിലുകൾ ഉയർത്തി അവർ ഉള്ളിൽ ശത്രുത വളർത്തുന്നു।

पाखंड की महफ़िल सजा कर वो दहशत बढ़ाते हैं,
ख़ुदा का नाम ले कर, दिलों में नफ़रत बढ़ाते हैं।

ഈശ്വരൻ നെഞ്ചിൽ ഇരിപ്പൂ എന്ന് പറയുന്ന നാവിനാൽ,
കപടഭക്തി തൻ സദസ്സുകളിൽ അവർ ഭയം വളർത്തുന്നു।

वो बारूद बोते हैं और बस क़यामत बढ़ाते हैं,
अमन की ज़मीन पर ज़ुल्म की हुकूमत बढ़ाते हैं।

സമാധാനം തേടി കരയുന്ന പാവങ്ങൾക്കിടയിൽ,
വെടിയുണ്ടകൾ വിതറി അവർ എന്നും വിനാശം വളർത്തുന്നു।

वो झूठ की बस्ती में अपनी हिफ़ाज़त बढ़ाते हैं,
सच का गला घोंट कर, अपनी ताक़त बढ़ाते हैं।

സത്യം വിളിച്ചു പറയുന്ന കണ്ണാടിയെ ഉടയ്ക്കുവാൻ,
നുണകളുടെ കോട്ട കെട്ടി അവർ സ്വന്തം കാവൽ വളർത്തുന്നു।

दुनिया के झूठे लोग अपनी मलामत बढ़ाते हैं,
जब भी 'जी.आर.' अपनी नज़्म की शहादत बढ़ाते हैं।

ലോകത്തിൻ കള്ളങ്ങൾ തൻ അപമാനം അവർ വളർത്തുന്നു,
വരികളിൽ സത്യം ജ്വലിപ്പിച്ചു 'ജി ആർ' കവിതകൾ വളർത്തുന്നു।


ജീ ആർ കവിയൂർ 
( GR kaviyoor)
11 06 2026
( Kaviyoor, Thiruvalla)

Sunday, June 7, 2026

मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽ द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ

 मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽ
द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ



मौन में तेरी याद की ठहरी नमी है ग़ज़ल,
दिल से उठती दर्द की गहरी नमी है ग़ज़ल।

മൗനത്തിൽ നിൻ ഓർമ്മയുടെ തങ്ങി നനവാം ഗസൽ,
ഹൃദയത്തിൽ വേദനയുടെ ആഴ്നനവാം ഗസൽ।

आँख में ठहरा हुआ इक अश्क जब कहने लगे,
वेदना की बोलती फिर ख़ामुशी है ग़ज़ल।

കണ്ണീരായ് തങ്ങി നിൽക്കുന്നൊരു തുള്ളി സംസാരിക്കിൽ,
വേദനയുടെ മൗനഭാഷ വെളിപ്പെടുത്തും ഗസൽ।

रात की तन्हाइयों में चाँद जब सुनता मुझे,
चाँदनी के लब पे आकर जो थमी है ग़ज़ल।

രാവിൻ ഏകാന്തതയിൽ ചന്ദ്രൻ ചെവികൊടുക്കുമ്പോൾ,
നിലാവിൻ അധരങ്ങളിൽ മൗനമായി തങ്ങും ഗസൽ।

तेरी यादों की फुहारों में भीगता है दिल,
अश्क की धारा में बरसों से धुली है ग़ज़ल।

നിൻ സ്മൃതികൾ മഴയായി ഹൃദയത്തിൽ പെയ്യുമ്പോൾ,
അശ്രുനദിയിൽ കഴുകി തെളിഞ്ഞു നിൽക്കും ഗസൽ।

सूने घर के हर किसी कोने में तेरी आहटें,
इक उदासी की सदा बनकर जमी है ग़ज़ल।

ശൂന്യമായ വീടിൻ ഓരോ കോണിലും നിൻ ചുവടൊച്ച,
ഏകാന്തതയുടെ സ്വരമായി മുഴങ്ങിനിൽക്കും ഗസൽ।

खोए लम्हों की महक सी साथ चलती है सदा,
बीते सपनों की कोई प्यारी गठरी है ग़ज़ल।

മാഞ്ഞുപോയ നിമിഷങ്ങൾ സുഗന്ധമായി കൂടെവന്ന്,
സ്വപ്നങ്ങളുടെ ഭാണ്ഡമേന്തി നടന്നുപോകും ഗസൽ।

जब सफ़र में हमसफ़र कोई न मेरे साथ था,
मेरे क़दमों के निशाँ संग ही चली है ग़ज़ल।

ജീവിതയാത്രയിൽ കൂട്ടായി ആരുമില്ലാതിരുന്നപ്പോൾ,
എൻ കാൽപ്പാടുകൾക്കൊപ്പം നടന്നുപോയി ഗസൽ।

मैं 'जी आर' अपनी ख़ामोशी को जब आवाज़ दूँ,
दिल की हर धड़कन में तब से बसी है ग़ज़ल।

ഞാൻ 'ജി ആർ' എൻ മൗനത്തിന് ശബ്ദമേകിയ നാളിൽ,
എൻ ഹൃദയമിടിപ്പിനുള്ളിൽ വസിക്കുന്നിതാ ഗസൽ।

GR kaviyoor 
08 06 2026
(Kaviyoor, thiruvalla)

Thursday, June 4, 2026

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)



तेरी तन्हाई से लगता है डर,
तेरी रुसवाई से लगता है डर।

न जाने कौन-सा मौसम बदल दे रंग अपना,
तेरी जुदाई से लगता है डर।

बहुत मासूम है ये दिल, फ़रेबों को नहीं समझे,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

कभी जो ख़्वाब आँखों में सजाकर मुस्कुराते थे,
उसी परछाई से लगता है डर।

ये दुनिया दर्द वालों की कहाँ तक साथ देती है,
किसी रुसवाई से लगता है डर।

मोहब्बत की गली में जब भी आगे बढ़ने लगता हूँ,
नई दुश्वारी से लगता है डर।

कभी जो रौशनी बनकर मेरे घर में उतरती थी,
उसी अंगड़ाई से लगता है डर।

न जाने किसलिए अब दिल ये हर आहट पे चौंके है,
तेरी शहनाई से लगता है डर।

मैं "जी आर" आज भी तेरा नाम लेकर सोचता हूँ,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

जी आर कवियुर 
 05 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

सागर की एक कहानी

 सागर की एक कहानी 



गहरे सागर के नीले पानी में,

तैरती थी एक नन्हीं सी जान।

छोटी सी ज़िंदगी, छोटा सा सुक़ून,

लहरों के संग बहती अनजान।


तभी बुलाते एक जाल के घेरे में,

थम गई उस मासूम की साँस।

इंसानी हाथों ने छीन लिया,

उस छोटे से जीवन का एहसास।


प्रकृति का यह नियम बड़ा अजीब है,

एक का जीवन, दूजे का आहार।

आज उसका अंत हुआ, कल हमारी बारी,

यही तो है इस सृष्टि का व्यवहार।


जैसे ही उठते हैं भारी जाल आसमान की ओर,

खत्म हो जाती है उस मछली की दास्ताँ।

आते-जाते रहते हैं यहाँ सब मुसाफ़िर,

पर अमर रहता है यह अनंत आसमाँ।


 जी आर कवियुर 

03 06 2

026

(तिरुवल्ला, कवियुर)

मैं से हम हो जाए (ग़ज़ल)

 
मैं से हम हो जाए (ग़ज़ल)




मैं का छोटा घेरा आज खो हो जाए,
दिल का बंद दरवाज़ा खुला हो जाए।

जब मन बाँसुरी बनकर खुद को छोड़ दे,
हर साँस में कोई मीठा सुर हो जाए।

बीज अगर मिट्टी में चुपचाप सो जाए,
एक दिन वही पेड़ बड़ा हो जाए।

मुट्ठी भर अहं लेकर कब तक जीना है,
प्रेम मिले तो जीवन खड़ा हो जाए।

अपने-पराये का भेद जहाँ मिट जाए,
हर इंसान से मन फिर जुड़ा हो जाए।

क्रोध और लोभ की धूप अगर ढल जाए,
अंदर का सूखा बाग हरा हो जाए।

'जी आर' मैं खुद कहता हूँ, छोड़ दे सब बंधन,
जीवन हर पल प्रेम से भरा हो जाए।

जी आर कवियुर 
02 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)


ज़िंदा रहने की l ജീവിക്കാൻ ഞങ്ങൾ - bilungal gazhal

 ज़िंदा रहने की l ജീവിക്കാൻ ഞങ്ങൾ - bilungal gazhal




ज़िंदा रहने की हम ख़्वाब रखते हैं,  
जान जाने से पहले तेरा नाम रखते हैं।  

ജീവിക്കാൻ ഞങ്ങൾ സ്വപ്നങ്ങൾ കാണുന്നു,  
മരണം വരും മുൻപേ നിന്റെ പേര് കാണുന്നു।  

तेरी यादों को दिल में गुलाब रखते हैं,  
ज़ख्म कितने भी हों मुस्कुराहट तमाम रखते हैं।  

നിന്റെ ഓർമ്മകൾ ഹൃദയത്തിൽ പുഷ്പങ്ങൾ കാണുന്നു,  
എത്ര മുറിവുണ്ടെങ്കിലും പുഞ്ചിരി നിറച്ച് കാണുന്നു।  

लोग पढ़ लें न चेहरा हमारे दर्दों का,  
हम निगाहों पे ख़ामोशियाँ आम रखते हैं।  

മുഖം ആരും വായിക്കാതിരിക്കാൻ വേദന മറച്ച് കാണുന്നു,  
നോട്ടങ്ങളിൽ നിശബ്ദതയുടെ ഭാഷ കാണുന്നു।  

वक्त बदले तो बदल जाए दुनिया सारी,  
हम मगर इश्क़ का वही निज़ाम रखते हैं।  

കാലം മാറിയാലും ലോകം മാറിയാലും,  
പ്രണയത്തിന്റെ അതേ നിയമം കാണുന്നു।  

धूप में जल के भी छाँव बाँटते फिरते,  
दिल में दरिया सा इक एहतराम रखते हैं।  

സൂര്യത്തിൽ കത്തിയാലും നിഴൽ പോലെ കാണുന്നു,  
ഹൃദയത്തിൽ സമുദ്രം പോലെ ആദരം കാണുന്നു।  

जो बिछड़कर भी रूह में उतर जाते हैं,  
उनके किस्से हम सुबह-ओ-शाम रखते हैं।  

വേർപെട്ടിട്ടും ആത്മാവിൽ കുടിയേറുന്നവരെ,  
അവരുടെ കഥകൾ രാവും പകലും കാണുന്നു।  

हार जाए न कहीं हौसला तन्हाई में,  
हम दुआओं में कई इंतज़ाम रखते हैं।  

തനിമയിൽ പ്രതീക്ഷ തകരാതിരിക്കാനായി,  
പ്രാർത്ഥനകളിൽ ആശ്വാസങ്ങൾ കാണുന്നു।  

'जी आर' अपने सुख़न में तेरी खुशबू लेकर,  
हम ग़ज़ल कहने का कुछ तो मुक़ाम रखते हैं।  

'ജീ ആർ' എന്ന പേരിൽ നിന്റെ സുഗന്ധം ചേർത്ത്,  
ഗസൽ എഴുതുന്ന ഒരു ഉയരം കാണുന്നു।

GR kaviyoor 
28 05 2026
( Kaviyoor , thiruvalla)

Wednesday, May 27, 2026

हवा में छुपी सुगंध


हवा में छुपी सुगंध

भोर की ठंडी घड़ियों में,  
हवा खामोशी से बह रही थी।  
एक अनदेखी सी सुगंध,  
राहों में बहती चली आई।  

फूलों की कोमल छुअन में,  
यादें फिर जाग उठीं।  
भूले हुए वे पल,  
मन में फिर खिल उठे।  

एक अदृश्य सा एहसास,  
दिल को छूकर गुजर गया।  
हवा में छुपी उस सुगंध सा,  
प्रेम चारों ओर ठहरा रहा।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

अनंत जलधारा

अनंत जलधारा

ढलती हुई सांझ के रंगों में,  
जलधारा दूर तक फैल गई।  
किनारों से रहित उस खामोशी में,  
आकाश पानी में घुल गया।  

हवा की ठंडी छुअन में,  
लहरें धीरे-धीरे बहती रहीं।  
दूर कहीं नाव की आवाज़,  
खामोशी को छूती चली गई।  

उस अंतहीन जलपथ पर,  
यादें बहती चली गईं।  
अनंत लहरों के साथ-साथ,  
मन भी दूर यात्रा पर निकल पड़ा।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

चलती हुई निस्तब्धता

चलती हुई निस्तब्धता

शांत पड़े उस जलकिनारे पर,  
समय जैसे ठहर गया था।  
फिर भी हवा की हल्की छुअन में,  
लहरें धीरे बहती रहीं।  

पेड़ों की लंबी छाया में,  
यादें बहती चली गईं।  
अनकहे रह गए पल,  
दिल में जीवित बने रहे।  

बाहर सब कुछ स्थिर था,  
पर भीतर यात्रा चलती रही।  
उस चलती हुई निस्तब्धता में,  
जीवन ने अपनी आवाज़ पाई।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

बंद खिड़की

बंद खिड़की

बारिश से ढकी उस खिड़की के पास,  
खामोशी ठहरी हुई थी।  
बाहर की धुंधली दुनिया,  
किसी याद जैसी लग रही थी।  

हवा की भीगी छुअन में,  
पुराने दिन फिर जाग उठे।  
अनकहे रह गए एहसास,  
मन में लहर बनते रहे।  

जब खिड़की खुली अचानक,  
रोशनी भीतर उतर आई।  
बंद पड़े उस हृदय में,  
आशा फिर से खिल उठी।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

एक अकेला तारा

एक अकेला तारा

जब रात की गहराई उतरी,  
आकाश खामोश खड़ा रहा।  
दूर कहीं एक अकेला तारा,  
उम्मीद की तरह चमक उठा।  

हवा की शांत यात्रा में,  
यादें धीरे बहती आईं।  
खामोश पड़े इस हृदय में,  
सपने फिर जाग उठे।  

चारों ओर अंधेरा छाया था,  
फिर भी आशा बुझी नहीं।  
उस अकेले तारे की चमक,  
रात में राह बन गई।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

प्रेम की शक्ति

प्रेम की शक्ति

गलती सबसे हो जाती है,  
दिल को क्यों दुख पहुँचाती है?  
प्रेम से रिश्ते खिल जाते हैं,  
मन के बादल छँट जाते हैं।  

छोटी बातें भूल भी जाओ,  
प्रेम का दीप जलाओ।  
मन में कोई बैर न रखना,  
हँसकर हर दुख को सहना।  

जो सबको अपना मानते हैं,  
जीवन में सुख पाते हैं।  
प्रेम की शक्ति महान होती,  
रिश्तों को सदा सँजोती।

  
जी आर कवियुर 
27 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Tuesday, May 26, 2026

अंधकार की परतें

अंधकार की परतें

रात की गहरी खामोशी में,  
अंधकार की परतें खुलने लगीं।  
सितारों की दूर चमक,  
राहों को हल्के से छूती रही।  

हवा की कोमल सरसराहट में,  
छिपी कहानियाँ जाग उठीं।  
परछाइयों की लंबी यात्रा में,  
यादें धीरे-धीरे चलने लगीं।  

भोर की हल्की रोशनी ने,  
अंधकार को धीरे मिटा दिया।  
जब ये परतें खुलकर बिखरीं,  
आशा ने फिर जन्म लिया।

जी आर कवियुर 
26 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)


लंबी होती परछाइयों का पथ

लंबी होती परछाइयों का पथ

सांझ की धुंधली रोशनी में,  
परछाइयाँ लंबी होने लगीं।  
सूनी पड़ी उस राह किनारे,  
खामोशी ठहर सी गई।  

हवा की कोमल हलचल में,  
यादें बहती चली आईं।  
अनकहे रह गए शब्द,  
दिल में ठहरे रहे।  

दूर कहीं धुंधली सी रोशनी,  
भोर का संकेत बन गई।  
इन लंबी होती परछाइयों के पथ पर,  
आशा साथ चलती रही।

जी आर कवियुर 
26 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

बरस न सकी बारिश

 

बरस न सकी बारिश

काले बादल घिर आए थे,  
पर वर्षा धरती पर न उतरी।  
प्रतीक्षा करती सूखी मिट्टी पर,  
केवल खामोशी उतर आई।  

हवा की धुंधली हलचल में,  
अनजाना दर्द भर गया था।  
जो शब्द कहे नहीं गए,  
वे मन में लहर बन उठे।  

उस बारिश की तरह जो बरस न सकी,  
कुछ सपने भी खो गए।  
फिर भी आशा का बीज,  
दिल में जीवित बना रहा।

जी आर कवियुर 
26 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Sunday, May 24, 2026

शोर-ए-महफ़िल (गज़ल)

 शोर-ए-महफ़िल 
(गज़ल)




हम अपनी बात महफ़िल में कह न सके,
शोर-ए-“वाह-वाह” में कुछ भी सुन न सके।

हम अपने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल न सके,
हर एक बात को दिल से सही कह न सके।

सुनाने आए थे जो दिल की दास्तान,
हवा के शोर में वो भी हम कह न सके।

हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बन गई,
मगर वो सदा भी किसी तक कह न सके।

नज़रें झुकी रहीं, अल्फ़ाज़ खोते रहे,
जो दिल में था वो जुबां से हम कह न सके।

महफ़िल में लोग बस ताली बजाते रहे,
और हम अपने ही जज़्बात कह न सके।

हर इक “वाह-वाह” में आवाज़ दबती गई,
हम अपना सच भी किसी से कह न सके।

कविता के इस शोर में खो गई हर सदा,
जीआर भी अपना दर्द यहाँ कह न सके।

जी आर कवियुर 
22 06 2026


साहिल के सपने (ग़ज़ल)

 साहिल के सपने (ग़ज़ल)




[Raga Suggestion: Bhairavi / Darbari Kanada]
[Qafiya: सपने, गहरे, ठहरे, पहरे...]
[Radif: हैं, हैं]


(मत्ला)
चश्मे के शीशों पर बिखरे हैं सपने, हैं
लहरों की सरगम में गहरे हैं सपने, हैं

(शेर 2)
इस ढलती शाम का मंज़र तो देखो
समुंदर के साहिल पे ठहरे हैं सपने, हैं

(शेर 3)
यादों की महफ़िल सजी है यहाँ पर
इन ठंडी हवाओं के पहरे हैं सपने, हैं

(शेर 4)
अंधेरा जो छाए तो डरना नहीं तुम
उजालों की राहों में सुनहरे हैं सपने, हैं

(शेर 5)
दिलों की किताब को खोल कर देखो
हक़ीक़त की दुनिया से सुनहरे हैं सपने, हैं

(शेर 6)
वक़्त की मौजों ने बदला है रास्ता
मगर दिल के कोने में ठहरे हैं सपने, हैं

(शेर 7)
ख़ामोश रातों की अपनी जुबां है
कहानी सुनाते जो गहरे हैं सपने, हैं

(मकता)
अब मैं 'जी आर' ख़ुद क़लम उठाता हूँ
ग़ज़ल में पिरोता हूँ जो बिखरे हैं सपने, हैं

जी आर कवियुर 
24 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Thursday, May 21, 2026

बरस न सकी बारिश

बरस न सकी बारिश

काले बादल घिर आए थे,  
पर वर्षा धरती पर न उतरी।  
प्रतीक्षा करती सूखी मिट्टी पर,  
केवल खामोशी उतर आई।  

हवा की धुंधली हलचल में,  
अनजाना दर्द भर गया था।  
जो शब्द कहे नहीं गए,  
वे मन में लहर बन उठे।  

उस बारिश की तरह जो बरस न सकी,  
कुछ सपने भी खो गए।  
फिर भी आशा का बीज,  
दिल में जीवित बना रहा।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

अंधकार की परतें

अंधकार की परतें

रात की गहरी खामोशी में,  
अंधकार की परतें खुलने लगीं।  
सितारों की दूर चमक,  
राहों को हल्के से छूती रही।  

हवा की कोमल सरसराहट में,  
छिपी कहानियाँ जाग उठीं।  
परछाइयों की लंबी यात्रा में,  
यादें धीरे-धीरे चलने लगीं।  

भोर की हल्की रोशनी ने,  
अंधकार को धीरे मिटा दिया।  
जब ये परतें खुलकर बिखरीं,  
आशा ने फिर जन्म लिया।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

आकाश का किनारा

आकाश का किनारा

आकाश के उस किनारे पर,  
बादल धीरे-धीरे बहते गए।  
चाँदनी की शीतल आभा ने,  
रात को स्वप्न बना दिया।  

दूर किसी पक्षी के पंखों में,  
यात्रा की ध्वनि गूंज उठी।  
हवा की अदृश्य राहों में,  
आशा उड़ती ही रही।  

भोर के पहले रंगों संग,  
एक नया दिन खिल उठा।  
आकाश के उस किनारे पर,  
हृदय ने अपना प्रकाश पाया।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

रेत पर लिखे शब्द

रेत पर लिखे शब्द

लहरों से छुए उस तट पर,  
रेत में कुछ शब्द उभर आए।  
हवा की शांत यात्रा में,  
वे धीरे-धीरे मिटते गए।  

सांझ की धुंधली रोशनी में,  
यादें फिर लौटकर आईं।  
अनकही छिपी भावनाएँ,  
मन में बहती ही रहीं।  

समय से धुली उन राहों पर,  
केवल पदचिह्न शेष रहे।  
रेत पर लिखे वे शब्द,  
खामोशी में फिर जाग उठे।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Wednesday, May 20, 2026

सलामत रहो | സുഖമായിരിക്കൂ | Gazhal l

 सलामत रहो | സുഖമായിരിക്കൂ | Gazhal l 



जहाँ भी हो तुम सलामत रहो,
मेरी ये दुआ है सलामत रहो

എവിടെയായാലും നീ സുഖമായിരിക്കൂ,
എൻ ഹൃദയ പ്രാർത്ഥന സുഖമായിരിക്കൂ

हवाओं में ज़हर घुलने लगा है,
दुआओं की तरह सलामत रहो

കാറ്റുകളിൽ വിഷം പടരുന്ന കാലം,
പ്രാർത്ഥനപോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

सफ़र में कितने अँधेरे मिलेंगे,
चराग़ों की तरह सलामत रहो

യാത്രയിൽ ഇരുളുകൾ ഏറെയുണ്ടെങ്കിലും,
ദീപശിഖ പോലെ അണയാതെ കാറ്റിൽ നീ सുഖമായിരിക്കൂ

ज़माना हर कदम आज़माएगा यूँ,
वफ़ाओं की तरह सलामत रहो

ലോകം ഓരോ നിമിഷവും മാറിയാലും,
സ്നേഹത്തിൻ്റെ പേരിൽ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

नज़र में कई ख़्वाब टूटे हुए हैं,
मगर आईने-सा सलामत रहो

കണ്ണുകളിൽ ചില സ്വപ്നങ്ങൾ തകർന്നാലും,
ഉടയാത്ത കണ്ണാടി പോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

कभी दर्द दिल पर हुकूमत करे तो,
हँसी की तरह ही सलामत रहो

വേദന ഹൃദയത്തിൽ വാഴുന്ന നേരവും,
പുഞ്ചിരിപോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

ये दुनिया बदलती रहे रोज़ लेकिन,
मोहब्बत की रस्में सलामत रहो

കാലം പല നിറങ്ങളിൽ ഒഴുകിയാലും,
വിശ്വാസം പോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

दुआ है मेरी रब से हर पल तुम्हें,
मेरे ख़्वाब बनके सलामत रहो

ദൈവത്തോട് എൻ പ്രാർത്ഥന ഇത്രമാത്രം,
എൻ സ്വപ്നമായി നീ സുഖമായിരിക്കൂ

“जी आर” की बस यही दुआ है,
जहाँ भी हो तुम सलामत रहो

“ജീ ആറിൻ്റെ” ഹൃദയ വാക്കിതൊന്നേ,  
എവിടെയായാലും നീ സുഖമായിരിക്കൂ।

GR kaviyoor 
19 05 2026

Shabda Brahman | शब्द ब्रह्म | ശബ്ദബ്രഹ്മം – A Spiritual Ghazal

 Shabda Brahman | शब्द ब्रह्म | ശബ്ദബ്രഹ്മം – A Spiritual Ghazal



हर धड़कन में गूंज रहा है जो अलख निरंजन शब्द ब्रह्म,  
सांसों की इस माला में जो बहता है वो है शब्द ब्रह्म।  

നാദത്തിൽ അടങ്ങിയിരിപ്പൂ അതേ ഓം എന്ന ശബ്ദബ്രഹ്മം,  
ആത്മാവിൻ ഉള്ളിൽ ജ്വലിച്ചു നിൽക്കും ദിവ്യമാം ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

ढूंढ रहा है तू जिसे मस्जिद और मन्दिर में,  
तेरे दिल के अंदर ही तो रहता है वो शब्द ब्रह्म।  

തേടിയലയുന്നു നീയതിനെ അമ്പലങ്ങളിലും പള്ളികളിലും,  
ഉള്ളിൽ തിരയൂ മാനവാ നീ ആത്മരൂപമാം ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

मिट जाएगी ये दुनिया और ये सारा जग का मेला,  
शाश्वत होकर हर युग में जो रहता है शब्द ब्रह्म।  

മാഞ്ഞുപോം ഈ കായവും ഈ ലോകമായാജാലവും,  
ശാശ്വതമായി നിലനിന്നിടും ഒടുവിൽ ജ്വലിക്കും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

सूफ़ी रंग में रंग दे अपनी इस सूनी ज़िन्दगी को,  
रूह को जो पावन कर दे वो है शब्द ब्रह्म।  

ഭക്തിരസത്തിൽ ലയിച്ചുണരട്ടെ നിന്റെയീ ജീവിതം,  
ആത്മശുദ്ധി തന്നെയേകും ദിവ്യമാം ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

क्या राजा क्या रंक यहाँ सब उस एक के बंदे हैं,  
सबको एक ही नज़र से देखता है शब्द ब्रह्म।  

ഭേദഭാവങ്ങൾ മാറ്റിയേവർക്കും തുല്യമായി,  
വിശ്വമൊന്നാകെ നിറഞ്ഞു നിൽക്കും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

खुल जाएंगे दिल के दरवाज़े जब तू ध्यान लगाएगा,  
सन्नाटे की गहराई में गूंजेगा शब्द ब्रह्म।  

മൗനത്തിൻ ആഴങ്ങളിൽ വന്നു നിറഞ്ഞിടും നേരം,  
നിൻ ഹൃദയവാതിൽ തുറന്നിടും ഈ ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

उस नूर-ए-इलाही की राह में खुद को मिटा दे तू,  
हर ज़र्रे में तुझको दिखाई देगा शब्द ब्रह्म।  

പരമാനന്ദ സാഗരമായി പ്രപഞ്ചമാകെ നിറയുമ്പോൾ,  
അണുവിലുമഖിലത്തിലും നീ കാണും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

मिट जाए अहं तो मिल जाए वो मालिक हर दिल का,  
अंधेरे को मिटाकर जो जगाए वो है शब्द ब्रह्म।  

ഉള്ളിലെ ഇരുളകറ്റി പ്രകാശമായി മാറുമ്പോൾ,  
അഹന്തയെല്ലാം മാറ്റി നിർത്തും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

जब इस रूहानी महफ़िल में गाता है 'जी आर',  
रूह को एक सुकून का दरिया देता है शब्द ब्रह्म।  

നാദബ്രഹ്മ സാഗരത്തിൽ ലയിച്ചു ചേരും നേരത്ത്,  
'ജീ ആർ' പാടും വരികളിൽ വന്നു നിറയും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

 जी आर कवियुर 
ജീ ആർ കവിയൂർ
20 05 2026
( Kaviyoor, thiruvalla)

दर्द और मुस्कान | വേദനയും പുഞ്ചിരിയും | Soulful Hindi Malayalam Ghazal Raag Darbari Kanada

 दर्द और मुस्कान | വേദനയും പുഞ്ചിരിയും | Soulful Hindi Malayalam Ghazal Raag Darbari Kanada

ग़ज़ल / ഗസൽ


दिल में इक आकाश रोता हो तो रोने दीजिए,  
दुनिया को बस हँसता चेहरा ही दिखाया कीजिए।

ഉള്ളിലൊരു ആകാശം കരഞ്ഞാലും ചിരിച്ചുകൊള്ളൂ,  
ലോകത്തിന് ചിരിച്ച മുഖം മാത്രം കാണിച്ചുകൊള്ളൂ।

ज़ख्म कितने भी छुपे हों रूह की वीरानियों में,  
लब पे फिर भी प्यार का नग़्मा सजाया कीजिए।

മുറിവുകൾ ഹൃദയത്തിൽ ആഴമായി പതിഞ്ഞാലും,  
സ്നേഹത്തിന്റെ മധുരഗാനം ചുണ്ടിൽ നിറച്ചുകൊള്ളൂ।

दर्द की बारिश में भी उम्मीद के दीपक जला,  
तीरगी में रौशनी बनकर ही आया कीजिए।

വേദനകൾ മഴപോലെ രാവോളം പെയ്താലും,  
പ്രതീക്ഷയുടെ തിരിനാളം ഉള്ളിൽ തെളിച്ചുകൊള്ളൂ।

रात जब तन्हा लगे और साँस बोझिल हो उठे,  
चाँद बनकर ख़ुद को ही दिल से लगाया कीजिए।

നിശബ്ദ രാത്രികളിൽ ഏകാന്തം വളർന്നാലും,  
ചന്ദ്രികപോൽ സ്വപ്നങ്ങളെ നെഞ്ചോട് ചേർത്തുകൊള്ളൂ।

टूट जाएँ ख़्वाब तो फिर हौसलों से काम लो,  
आँसुओं को मोतियों जैसा बनाया कीजिए।

തകർന്നുപോയ മോഹങ്ങൾ ചാരമായി തീർന്നാലും,  
കണ്ണീരിനെ മുത്തുകളായി മാറ്റിച്ചൊരുക്കിക്കൊള്ളൂ।

कोई समझे या न समझे दिल की गहरी चुप्पियाँ,  
अपने चेहरे पर तबस्सुम को सजाया कीजिए।

ആരും മനവേദനയുടെ ഭാഷകൾ വായിക്കാതെ,  
പുഞ്ചിരിയുടെ വെളിച്ചം മാത്രം മുഖത്ത് സൂക്ഷിച്ചുകൊള്ളൂ।

“जी आर” इतना ही कहता है सफ़र की धूप में,  
दुनिया को बस हँसता चेहरा ही दिखाया कीजिए।

“ജീ ആർ” ഇത്രമാത്രം ജീവിതത്തോട് പറയുന്നൂ,  
ലോകത്തിന് ചിരിച്ച മുഖം മാത്രം കാണിച്ചുകൊള്ളൂ।

GR kaviyoor 
20 05 2026

Tuesday, May 19, 2026

हवा में बहती कहानी

 हवा में बहती कहानी

हवा के कोमल पंखों पर,  
एक कहानी बहती आई।  
उसमें अनकहे शब्दों की,  
खामोश गूंज समाई थी।  

बारिश से भीगी राहों पर,  
यादें ठहरकर सुनती रहीं।  
पत्तों की हल्की सरसराहट में,  
समय की आवाज़ गूंज उठी।  

उड़ती हुई उस हवा के संग,  
कहानी भी दूर निकल गई।  
लेकिन उसकी खामोशी,  
दिल में हमेशा ठहर गई।

जी आर कवियुर 
19 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

नदी का मोड़

 नदी का मोड़

नदी के शांत मोड़ पर,  
रोशनी धीरे से खिल उठी।  
किनारों को छूते बहते हुए,  
लहरों ने अपनी कथा कही।  

हरियाली की कोमल छाया में,  
हवा संगीत बिखेर रही थी।  
दूर कहीं पक्षियों का गीत,  
संध्या में घुलता जा रहा था।  

कई मोड़ों को पार करते हुए,  
जीवन भी नदी सा बहता है।  
हर रुकावट से आगे बढ़ने को,  
आशा राह दिखाती रही।

जी आर कवियुर 
19 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Monday, May 18, 2026

छुपी हुई राहें

 छुपी हुई राहें

धुंधली होती उन राहों से,  
यादें धीरे-धीरे गुजर गईं।  
जिन रास्तों को कोई खोज न सका,  
वहाँ केवल खामोशी रह गई।  

पेड़ों की लंबी छाया में,  
समय ठहरकर शांत हुआ।  
हवा की कोमल हलचल में,  
भूले सपने फिर जाग उठे।  

अनजाने गुज़रते कदमों जैसे,  
जीवन भी चलता जाता है।  
इन छुपी हुई राहों के अंत में,  
एक नई सुबह इंतज़ार करती रही।

जी आर कवियुर 
19 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)


नन्ही चिड़िया की यात्रा

 नन्ही चिड़िया की यात्रा

भोर की उजली किरणों संग,  
नन्ही चिड़िया उड़ चली।  
डालियों की संकरी राहों में,  
नया आकाश खोजती रही।  

हवा के कोमल पंखों पर,  
वह दूरियाँ भूल गई।  
नदी किनारे की खामोशी में,  
अपना मधुर गीत छोड़ गई।  

जब संध्या धुंधली होने लगी,  
वह फिर अपने घोंसले लौटी।  
इस नन्ही चिड़िया की यात्रा में,  
सपनों ने अपने पंख पसारे।

जी आर कवियुर 
18 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Saturday, May 16, 2026

शीतल प्रकाश

 शीतल प्रकाश

चाँदनी की कोमल आभा में,  
रात खामोशी से ठहर गई।  
ठंडी हवा के स्पर्श तले,  
पत्तियाँ धीरे से झूम उठीं।  

दूर किसी सुंदर स्वप्न-सा,  
प्रकाश राहों पर बिखर गया।  
छुपी हुई पुरानी यादें,  
मन में फिर से जाग उठीं।  

भोर की ओर बढ़ते क्षणों में,  
आकाश रंग बदलने लगा।  
इस शीतल और कोमल प्रकाश में,  
हृदय ने शांति पा ली।

जी आर कवियुर 
16 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

लोणी, पोहे, फुले आणि छोटी केळी घेऊन, Malayalam to marathi ഹരേ കൃഷ്ണ

 लोणी, पोहे, फुले आणि छोटी केळी घेऊन,
Malayalam to marathi 

ഹരേ കൃഷ്ണ!
***************
നവനീതവുമവിലും നിറമലരും ചെറുപഴവും 
തുളസീദലമിതുകോർത്തൊരു നറുമാലികയതുമായ്(2)
അണയുന്നതിമുദമായ് കരയുഗളം തൊഴുതടിയൻ (2)
മഥുരാധിപ! മരുവീടുക മമ മാനസമനിശം.

നവനീതവുമവിലും നിറമലരും ചെറുപഴവും 
തുളസീദലമിതുകോർത്തൊരു നറുമാലികയതുമായ്

മനമാകെയുമിരുളാലടിപതറീടിന നിമിഷം;
തുണയേകുകയഴലാറ്റുക ഹരിമാധവ! സദയം(2)
ദിനവും നിജഹരിനാമവുമുരുവിട്ടിഹ മരുവാൻ;
കൃപയേകുക സതതം മമ മധുസൂദനഭഗവൻ!(2)

കരുണാരസമൊഴുകുന്നൊരു നയനാംബുജയുഗളം
മണിനൂപുരമിളകുന്നൊരു പദതാരിണപണിയാം(2)
അഴകാർന്നൊരു മുഖപങ്കജമിനി ദർശനമരുളൂ!
മുരളീധര! കരുണാകര! യദുനന്ദന! ശരണം!(2)

നവനീതവുമവിലും നിറമലരും ചെറുപഴവും 
തുളസീദലമിതുകോർത്തൊരു നറുമാലികയതുമായ്
അണയുന്നതിമുദമായ് കരയുഗളം തൊഴുതടിയൻ (2)
മഥുരാധിപ! മരുവീടുക മമ മാനസമനിശം.(3)

വൃത്തം : ശങ്കരചരിതം

സുലഭ പോരുവഴി ✍️

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मराठी अनुवाद (Marathi Translation)

पल्लवी:
लोणी, पोहे, फुले आणि छोटी केळी घेऊन,
तुळशीच्या पानांनी गुंफलेली ही माळ घेऊन,
मी तुझा भक्त दोन्ही हात जोडून आनंदाने तुला शरण आलो आहे.
हे मथुरेच्या राजा (मथुराधिपती), माझ्या मनात तू सदैव वास कर.

अनुपल्लवी:
जेव्हा माझे मन पूर्णपणे अंधकारात डगमगते,
हे हरी माधवा, दया करून मला आधार दे आणि माझे दुःख दूर कर.
दररोज तुझे 'हरिनाम' जपण्याची शक्ती मला लाभो,
हे मधुसूदन भगवंता, माझ्यावर तुझी कृपा सदैव असू दे.

चरण:
ज्यांतून करुणेचा रस वाहतोय अशा तुझ्या कमळनेत्रांना,
आणि ज्यांच्या पैंजणांचा गोड नाद येतोय अशा तुझ्या चरणांना मी वंदन करतो.
तुझ्या सुंदर कमळस्वरूपी मुखाचे दर्शन मला लाभू दे,
हे मुरलीधरा, करुणाकरा, यदुनंदना, मी तुला शरण आलो आहे.

मूळ रचना: सुलभ पोरुवझी
मराठी अनुवाद: जी. आर. कवियूर
15 05 2026
( कवियूर, तिरुवल्ला)

प्रेमाचा चंद्र (प्रेमचंद्रिका) transilation from malayalam to marathi

 Transilation from malayalam to Marathi 

പ്രണയനിലാവ്
****************
പാർവണശശിബിംബം പോലെ
ഒളി തൂകുന്ന നിൻ മുഖകമലം
നിറയും ഹൃദയം നിനക്കായ് പാടി
കാതരമായൊരു ഗാനം
ആർദ്രമീയനുരാഗഗാനം.

കതിരോലകൾ കുളിരിളം തെന്നലിൽ
ആലോലമാടുന്ന രാവിൽ (2)
നീയെൻ താരുണ്യരാഗമായ് മാറി
കനവിൽ നിറയേ മധുരസ്മൃതിതൻ
നെയ്യാമ്പൽപ്പൂവുകൾ വിടർന്നൂ.
പ്രണയം പകരാൻ നാണമോടെ ഞാൻ 
അണയാം രാഗാർദ്രമായി
നീയെൻ കരളിൻ സംഗീതമായി.

(പാർവണശശിബിംബം...

മിഴിപ്പൂക്കളിൽ വിരിയും കവിതപോൽ
നിറയുന്നു കനവായെന്നുള്ളിൽ(2
നീയെൻ മാനസതാളമായെന്നും
ഗന്ധർവ്വഗായകാ! നിന്നാർദ്രമൊഴികളെൻ
ഹൃദയത്തിൽ മണിവീണ മീട്ടി  
നിറയുന്നെന്നിൽ നീ, ശാലീനഭാവമായ്
ഒഴുകും നിളയതുപോലെ
എൻ മനസ്സിൽ നീ മാത്രമായി.

(പാർവണശശിബിംബം...

സുലഭ പോരുവഴി✍️


प्रेमाचा चंद्र (प्रेमचंद्रिका)
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ध्रुवपद:
पूर्णचंद्राच्या त्या बिंभाप्रमाणे
प्रकाशणारे तुझे हे मुखकमल
भरून आलेले हृदय गाते तुझ्यासाठी
एक कातर, व्याकुळ गाणे
हे आर्द्र, अनुराग गाणे...

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कडवे १:
सोनेरी पाने जेव्हा मंद वाऱ्यावर
झुलत राहतात या रात्री (२)
तू माझ्या तारुण्याचा राग बनलास
स्वप्नात भरल्या मधुर आठवणींच्या
पांढऱ्या कमळांच्या कळ्या उमलल्या...
प्रेम अर्पिण्या लाजून मीही
जवळ येईन अनुराग बनूनी
तू माझ्या काळजाचे संगीत बनलास.

(पूर्णचंद्राच्या त्या बिंभाप्रमाणे...

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कडवे २:
नयनपुष्पांत उमलणाऱ्या कवितेसारखे
स्वप्न बनून तू मनात भरतोस (२)
तूच माझ्या मानसाचा ताल नेहमी
हे गंधर्वगायका! तुझे ते आर्द्र शब्द
माझ्या हृदयात मणिवीणा छेडतात...
माझ्यात फक्त तूच भरून राहतोस,
शालीण भावाने वाहणाऱ्या संथ निळेसारखा
माझ्या मनात आता फक्त तूच आहेस.

(पूर्णचंद्राच्या त्या बिंभाप्रमाणे...

मूळ रचना: सुलभ पोरुवझी
मराठी अनुवाद: जी. आर. कवियूर
16 05 2026
( कवियूर, तिरुवल्ला)

बरसात की महक — മഴയുടെ മണം (हिंदी–മലയാളം fusion gazhal)

 बरसात की महक — മഴയുടെ മണം
(हिंदी–മലയാളം fusion gazhal)




बरसों बाद बारिश का तराना याद आया,
तेरा चुपके से दिल में लौट आना याद आया।

വർഷങ്ങൾക്കിപ്പുറം മഴയുടെ ഈണം ഓർമ്മയായി,
നീ മൗനമായി ഹൃദയത്തിൽ തിരികെയെത്തിയത് ഓർമ്മയായി।

भीगी मिट्टी की महक जब हवा में घुल गई थी,
मुझे वो प्यार का पहला ज़माना याद आया।

നനഞ്ഞ മണ്ണിന്റെ മണവും കാറ്റിലൊഴുകിയ നേരം,
നമ്മുടെ പ്രണയത്തിന്റെ ആദ്യകാലം ഓർമ്മയായി।

घटा छाई तो खिड़की पर ठहरकर सोचते थे,
तेरा चुपके से मुझको मुस्कुराना याद आया।

കറുത്ത മേഘങ്ങൾ ജനലരികിൽ തങ്ങി നിന്നപ്പോൾ,
നീ ചിരിയോടെ എന്നെ നോക്കിയ നിമിഷം ഓർമ്മയായി।

कहीं पत्तों पे ठहरी बूंद ने दस्तक जो दी तो,
तेरा बाहों में लेकर सर झुकाना याद आया।

ഇലകളിൽ വീണ മഴത്തുള്ളി വാതിൽ തട്ടിയ നേരം,
നിന്റെ തോളിലാഴ്ന്ന് തല ചായ്ച്ച സന്ധ്യ ഓർമ്മയായി।

हवा ने छेड़ दी फिर रात की भीगी कहानी,
मुझे वो साथ भीगा आशियाना याद आया।

കാറ്റ് വീണ്ടും നനഞ്ഞ രാത്രിയുടെ കഥ പാടുമ്പോൾ,
നമ്മൾ ചേർന്നിരുന്ന ആ കൂടാരം ഓർമ്മയായി।

नदी के पार से आती हुई शहनाइयों में,
तेरा धीमे से कोई गीत गाना याद आया।

അക്കരെ ഒഴുകിയെത്തിയൊരു മൃദുഗാന ശബ്ദത്തിൽ,
നീ പതുക്കെ പാടിയ പ്രണയഗാനം ഓർമ്മയായി।

मैंने चाहा कि दिल अब दर्द से कुछ दूर रह ले,
मगर हर भीगी आहट पर बहाना याद आया।

ഹൃദയം ഇനി വേദനയിൽ നിന്നും ദൂരെയാകട്ടെ എന്ന് ചിന്തിച്ചപ്പോൾ,
ഓരോ മഴച്ചുവട്ടിലും ഒരു കാരണം ഓർമ്മയായി।

‘जी आर’ मैं आज भी बारिश में भीग जाता हूँ,
तेरा चुपके से दिल में लौट आना याद आया।

‘ജി ആർ’ ഇന്നും ഈ മഴയിൽ നനഞ്ഞു നിൽക്കുമ്പോൾ,
നീ മൗനമായി ഹൃദയത്തിൽ തിരികെയെത്തിയത് ഓർമ്മയായി।

GR kaviyoor 
17 05 2026
(Kaviyoor, thiruvalla)

Friday, May 15, 2026

बूंदों का नृत्य

 
बूंदों का नृत्य


जब वर्षा की बूंदें उतरीं,  
धरती पर संगीत जाग उठा।  
पत्तों की हरी छाया में,  
प्रकृति ने नृत्य शुरू किया।  

हवा के संग मुस्कुराता जल,  
टहनियों से बहता चला गया।  
छोटे जलाशयों के आईने में,  
गोल लहरें खिलती रहीं।  

भोर की कोमल रोशनी में,  
जलमोती चमकते दिखाई दिए।  
इन बूंदों के सुंदर नृत्य में,  
धरती आनंद से गाने लगी।

जी आर कवियुर 
16 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Thursday, May 14, 2026

नन्हा तपस्वी

नन्हा तपस्वी




कोमल पत्तों की नोक पर बैठा,
सूक्ष्म रूप में ध्यान लगाए।
शांत खड़ा तू साये जैसा,
हरी डाल की गोद में मुस्काए।

महीन पंखों की हीरा जैसी आभा,
धूप की किरणों में चमक रही।
ना रक्त की चाह, ना कोई शोर,
फूलों के रस में उमंग बही।

सोती हुई इस दुनिया का तू प्रहरी,
रचयिता की एक अनोखी रचना।
छोटा सा जीवन, पर गरिमा भारी,
सादगी की तू सुंदर प्रेरणा।

जी आर कवियुर 
14 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Tuesday, May 12, 2026

हवा की ओट में

हवा की ओट में
 
हवा की ओट में कहीं,  
एक छुपा गीत बहता रहा।  
सुनने को ठहरे हुए मनों को,  
वह हल्के से छूकर गुजर गया।  

पत्तों की धीमी हलचल में,  
अनकही कहानियाँ बसी थीं।  
दूर किसी बादल की परछाईं,  
राहों पर धीरे चलती रही।  

अनदेखे स्पर्श की तरह,  
यादें आकर पास ठहर गईं।  
हवा की इस ओट में अब भी,  
खामोशी याद बनकर रहती है।

जी आर कवियुर 
13 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Monday, May 11, 2026

ज़िंदगी के तराज़ू में सब बराबर है,( ग़ज़ल)ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്,(ഗസൽ)

ज़िंदगी के तराज़ू में सब बराबर है,( ग़ज़ल)
ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്,(ഗസൽ)

ज़िंदगी के तराज़ू में सब बराबर है,
किसी का दर्द हो या सुख, सब बराबर है।

ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്,
സമ്പത്തും സ്നേഹവും വേദനയും തുല്യമാണ്.

वक़्त की धूप में हर चेहरा बदलता है,
आज जो ऊँचा दिखे, कल बराबर है।

കാലത്തിന്റെ വഴിയിൽ മനുഷ്യൻ മാറുന്നു,
ഇന്നത്തെ ഉയരവും നാളെയോ തുല്യമാണ്.

कोई अमीर हो चाहे कोई फ़क़ीर यहाँ,
मिट्टी की गोद में आखिर बराबर है।

ധനികനും ദരിദ്രനും വേർപിരിയില്ല അവസാനം,
മണ്ണിന്റെ മുമ്പിൽ മനുഷ്യൻ തുല്യമാണ്.

नफ़रत के बाज़ार में प्यार बचा रखना,
दिल का हर सच्चा रिश्ता बराबर है।

വൈരത്തിന്റെ ലോകത്ത് സ്നേഹം കാത്തിടൂ,
ഹൃദയത്തിലെ നന്മകൾ എല്ലാം തുല്യമാണ്.

मंज़िल पे पहुँचकर कोई घमंड न करे,
चलते हुए राही सब बराबर है।

ലക്ഷ്യം കൈവന്നാലും അഹങ്കാരം വേണ്ട,
ജീവിതയാത്രയിൽ എല്ലാവരും തുല്യരാണ്.

आँसू की कीमत को समझो ऐ दोस्तों,
ग़म में गिरा हर कतरा बराबर है।

കണ്ണുനീർത്തുള്ളികൾ വിലമതിക്കണം സഖാവേ,
വേദനയിൽ വീഴുന്ന തുള്ളി തുല്യമാണ്.

जीवन का हिसाब बड़ा सादा रखिए,
नेकी का हर छोटा काम बराबर है।

ജീവിതത്തിന്റെ കണക്ക് ലളിതമാക്കൂ,
നല്ല മനസ്സിന്റെ പ്രവൃത്തി തുല്യമാണ്.

"जी आर" ने देखा है दुनिया को क़रीब से,
इंसान का असली चेहरा बराबर है।

"ജീ ആർ" കണ്ട ലോകം ഒരു സത്യം പറയുന്നു,
ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്.

ജീ ആർ കവിയൂർ 
12 05 2026
(കവിയൂർ, തിരുവല്ല)

बिना राह के पदचिह्न

बिना राह के पदचिह्न

बिना किसी राह की रेत पर,  
किसी के कदमों के निशान दिखे।  
कहां से शुरू होकर कहां गए,  
यह हवा भी समझ न सकी।  

बारिश से भीगी उस मिट्टी पर,  
सिर्फ खामोशी रह गई थी।  
हर बार पीछे मुड़कर देखने पर,  
यादें फिर से जाग उठती हैं।  

ज़िंदगी की अनजानी राहों में,  
हम सब चलते ही जाते हैं।  
ये बिना राह के पदचिह्न भी,  
एक दिन कहानी बन जाते हैं।

जी आर कवियुर 
11 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)