Wednesday, May 27, 2026

हवा में छुपी सुगंध


हवा में छुपी सुगंध

भोर की ठंडी घड़ियों में,  
हवा खामोशी से बह रही थी।  
एक अनदेखी सी सुगंध,  
राहों में बहती चली आई।  

फूलों की कोमल छुअन में,  
यादें फिर जाग उठीं।  
भूले हुए वे पल,  
मन में फिर खिल उठे।  

एक अदृश्य सा एहसास,  
दिल को छूकर गुजर गया।  
हवा में छुपी उस सुगंध सा,  
प्रेम चारों ओर ठहरा रहा।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

अनंत जलधारा

अनंत जलधारा

ढलती हुई सांझ के रंगों में,  
जलधारा दूर तक फैल गई।  
किनारों से रहित उस खामोशी में,  
आकाश पानी में घुल गया।  

हवा की ठंडी छुअन में,  
लहरें धीरे-धीरे बहती रहीं।  
दूर कहीं नाव की आवाज़,  
खामोशी को छूती चली गई।  

उस अंतहीन जलपथ पर,  
यादें बहती चली गईं।  
अनंत लहरों के साथ-साथ,  
मन भी दूर यात्रा पर निकल पड़ा।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

चलती हुई निस्तब्धता

चलती हुई निस्तब्धता

शांत पड़े उस जलकिनारे पर,  
समय जैसे ठहर गया था।  
फिर भी हवा की हल्की छुअन में,  
लहरें धीरे बहती रहीं।  

पेड़ों की लंबी छाया में,  
यादें बहती चली गईं।  
अनकहे रह गए पल,  
दिल में जीवित बने रहे।  

बाहर सब कुछ स्थिर था,  
पर भीतर यात्रा चलती रही।  
उस चलती हुई निस्तब्धता में,  
जीवन ने अपनी आवाज़ पाई।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

बंद खिड़की

बंद खिड़की

बारिश से ढकी उस खिड़की के पास,  
खामोशी ठहरी हुई थी।  
बाहर की धुंधली दुनिया,  
किसी याद जैसी लग रही थी।  

हवा की भीगी छुअन में,  
पुराने दिन फिर जाग उठे।  
अनकहे रह गए एहसास,  
मन में लहर बनते रहे।  

जब खिड़की खुली अचानक,  
रोशनी भीतर उतर आई।  
बंद पड़े उस हृदय में,  
आशा फिर से खिल उठी।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

एक अकेला तारा

एक अकेला तारा

जब रात की गहराई उतरी,  
आकाश खामोश खड़ा रहा।  
दूर कहीं एक अकेला तारा,  
उम्मीद की तरह चमक उठा।  

हवा की शांत यात्रा में,  
यादें धीरे बहती आईं।  
खामोश पड़े इस हृदय में,  
सपने फिर जाग उठे।  

चारों ओर अंधेरा छाया था,  
फिर भी आशा बुझी नहीं।  
उस अकेले तारे की चमक,  
रात में राह बन गई।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

प्रेम की शक्ति

प्रेम की शक्ति

गलती सबसे हो जाती है,  
दिल को क्यों दुख पहुँचाती है?  
प्रेम से रिश्ते खिल जाते हैं,  
मन के बादल छँट जाते हैं।  

छोटी बातें भूल भी जाओ,  
प्रेम का दीप जलाओ।  
मन में कोई बैर न रखना,  
हँसकर हर दुख को सहना।  

जो सबको अपना मानते हैं,  
जीवन में सुख पाते हैं।  
प्रेम की शक्ति महान होती,  
रिश्तों को सदा सँजोती।

  
जी आर कवियुर 
27 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Tuesday, May 26, 2026

अंधकार की परतें

अंधकार की परतें

रात की गहरी खामोशी में,  
अंधकार की परतें खुलने लगीं।  
सितारों की दूर चमक,  
राहों को हल्के से छूती रही।  

हवा की कोमल सरसराहट में,  
छिपी कहानियाँ जाग उठीं।  
परछाइयों की लंबी यात्रा में,  
यादें धीरे-धीरे चलने लगीं।  

भोर की हल्की रोशनी ने,  
अंधकार को धीरे मिटा दिया।  
जब ये परतें खुलकर बिखरीं,  
आशा ने फिर जन्म लिया।

जी आर कवियुर 
26 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)


लंबी होती परछाइयों का पथ

लंबी होती परछाइयों का पथ

सांझ की धुंधली रोशनी में,  
परछाइयाँ लंबी होने लगीं।  
सूनी पड़ी उस राह किनारे,  
खामोशी ठहर सी गई।  

हवा की कोमल हलचल में,  
यादें बहती चली आईं।  
अनकहे रह गए शब्द,  
दिल में ठहरे रहे।  

दूर कहीं धुंधली सी रोशनी,  
भोर का संकेत बन गई।  
इन लंबी होती परछाइयों के पथ पर,  
आशा साथ चलती रही।

जी आर कवियुर 
26 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

बरस न सकी बारिश

 

बरस न सकी बारिश

काले बादल घिर आए थे,  
पर वर्षा धरती पर न उतरी।  
प्रतीक्षा करती सूखी मिट्टी पर,  
केवल खामोशी उतर आई।  

हवा की धुंधली हलचल में,  
अनजाना दर्द भर गया था।  
जो शब्द कहे नहीं गए,  
वे मन में लहर बन उठे।  

उस बारिश की तरह जो बरस न सकी,  
कुछ सपने भी खो गए।  
फिर भी आशा का बीज,  
दिल में जीवित बना रहा।

जी आर कवियुर 
26 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Sunday, May 24, 2026

शोर-ए-महफ़िल (गज़ल)

 शोर-ए-महफ़िल 
(गज़ल)




हम अपनी बात महफ़िल में कह न सके,
शोर-ए-“वाह-वाह” में कुछ भी सुन न सके।

हम अपने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल न सके,
हर एक बात को दिल से सही कह न सके।

सुनाने आए थे जो दिल की दास्तान,
हवा के शोर में वो भी हम कह न सके।

हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बन गई,
मगर वो सदा भी किसी तक कह न सके।

नज़रें झुकी रहीं, अल्फ़ाज़ खोते रहे,
जो दिल में था वो जुबां से हम कह न सके।

महफ़िल में लोग बस ताली बजाते रहे,
और हम अपने ही जज़्बात कह न सके।

हर इक “वाह-वाह” में आवाज़ दबती गई,
हम अपना सच भी किसी से कह न सके।

कविता के इस शोर में खो गई हर सदा,
जीआर भी अपना दर्द यहाँ कह न सके।

जी आर कवियुर 
22 06 2026


साहिल के सपने (ग़ज़ल)

 साहिल के सपने (ग़ज़ल)




[Raga Suggestion: Bhairavi / Darbari Kanada]
[Qafiya: सपने, गहरे, ठहरे, पहरे...]
[Radif: हैं, हैं]


(मत्ला)
चश्मे के शीशों पर बिखरे हैं सपने, हैं
लहरों की सरगम में गहरे हैं सपने, हैं

(शेर 2)
इस ढलती शाम का मंज़र तो देखो
समुंदर के साहिल पे ठहरे हैं सपने, हैं

(शेर 3)
यादों की महफ़िल सजी है यहाँ पर
इन ठंडी हवाओं के पहरे हैं सपने, हैं

(शेर 4)
अंधेरा जो छाए तो डरना नहीं तुम
उजालों की राहों में सुनहरे हैं सपने, हैं

(शेर 5)
दिलों की किताब को खोल कर देखो
हक़ीक़त की दुनिया से सुनहरे हैं सपने, हैं

(शेर 6)
वक़्त की मौजों ने बदला है रास्ता
मगर दिल के कोने में ठहरे हैं सपने, हैं

(शेर 7)
ख़ामोश रातों की अपनी जुबां है
कहानी सुनाते जो गहरे हैं सपने, हैं

(मकता)
अब मैं 'जी आर' ख़ुद क़लम उठाता हूँ
ग़ज़ल में पिरोता हूँ जो बिखरे हैं सपने, हैं

जी आर कवियुर 
24 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Thursday, May 21, 2026

बरस न सकी बारिश

बरस न सकी बारिश

काले बादल घिर आए थे,  
पर वर्षा धरती पर न उतरी।  
प्रतीक्षा करती सूखी मिट्टी पर,  
केवल खामोशी उतर आई।  

हवा की धुंधली हलचल में,  
अनजाना दर्द भर गया था।  
जो शब्द कहे नहीं गए,  
वे मन में लहर बन उठे।  

उस बारिश की तरह जो बरस न सकी,  
कुछ सपने भी खो गए।  
फिर भी आशा का बीज,  
दिल में जीवित बना रहा।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

अंधकार की परतें

अंधकार की परतें

रात की गहरी खामोशी में,  
अंधकार की परतें खुलने लगीं।  
सितारों की दूर चमक,  
राहों को हल्के से छूती रही।  

हवा की कोमल सरसराहट में,  
छिपी कहानियाँ जाग उठीं।  
परछाइयों की लंबी यात्रा में,  
यादें धीरे-धीरे चलने लगीं।  

भोर की हल्की रोशनी ने,  
अंधकार को धीरे मिटा दिया।  
जब ये परतें खुलकर बिखरीं,  
आशा ने फिर जन्म लिया।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

आकाश का किनारा

आकाश का किनारा

आकाश के उस किनारे पर,  
बादल धीरे-धीरे बहते गए।  
चाँदनी की शीतल आभा ने,  
रात को स्वप्न बना दिया।  

दूर किसी पक्षी के पंखों में,  
यात्रा की ध्वनि गूंज उठी।  
हवा की अदृश्य राहों में,  
आशा उड़ती ही रही।  

भोर के पहले रंगों संग,  
एक नया दिन खिल उठा।  
आकाश के उस किनारे पर,  
हृदय ने अपना प्रकाश पाया।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

रेत पर लिखे शब्द

रेत पर लिखे शब्द

लहरों से छुए उस तट पर,  
रेत में कुछ शब्द उभर आए।  
हवा की शांत यात्रा में,  
वे धीरे-धीरे मिटते गए।  

सांझ की धुंधली रोशनी में,  
यादें फिर लौटकर आईं।  
अनकही छिपी भावनाएँ,  
मन में बहती ही रहीं।  

समय से धुली उन राहों पर,  
केवल पदचिह्न शेष रहे।  
रेत पर लिखे वे शब्द,  
खामोशी में फिर जाग उठे।

जी आर कवियुर 
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Wednesday, May 20, 2026

सलामत रहो | സുഖമായിരിക്കൂ | Gazhal l

 सलामत रहो | സുഖമായിരിക്കൂ | Gazhal l 



जहाँ भी हो तुम सलामत रहो,
मेरी ये दुआ है सलामत रहो

എവിടെയായാലും നീ സുഖമായിരിക്കൂ,
എൻ ഹൃദയ പ്രാർത്ഥന സുഖമായിരിക്കൂ

हवाओं में ज़हर घुलने लगा है,
दुआओं की तरह सलामत रहो

കാറ്റുകളിൽ വിഷം പടരുന്ന കാലം,
പ്രാർത്ഥനപോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

सफ़र में कितने अँधेरे मिलेंगे,
चराग़ों की तरह सलामत रहो

യാത്രയിൽ ഇരുളുകൾ ഏറെയുണ്ടെങ്കിലും,
ദീപശിഖ പോലെ അണയാതെ കാറ്റിൽ നീ सുഖമായിരിക്കൂ

ज़माना हर कदम आज़माएगा यूँ,
वफ़ाओं की तरह सलामत रहो

ലോകം ഓരോ നിമിഷവും മാറിയാലും,
സ്നേഹത്തിൻ്റെ പേരിൽ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

नज़र में कई ख़्वाब टूटे हुए हैं,
मगर आईने-सा सलामत रहो

കണ്ണുകളിൽ ചില സ്വപ്നങ്ങൾ തകർന്നാലും,
ഉടയാത്ത കണ്ണാടി പോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

कभी दर्द दिल पर हुकूमत करे तो,
हँसी की तरह ही सलामत रहो

വേദന ഹൃദയത്തിൽ വാഴുന്ന നേരവും,
പുഞ്ചിരിപോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

ये दुनिया बदलती रहे रोज़ लेकिन,
मोहब्बत की रस्में सलामत रहो

കാലം പല നിറങ്ങളിൽ ഒഴുകിയാലും,
വിശ്വാസം പോലെ നീ സുഖമായിരിക്കൂ

दुआ है मेरी रब से हर पल तुम्हें,
मेरे ख़्वाब बनके सलामत रहो

ദൈവത്തോട് എൻ പ്രാർത്ഥന ഇത്രമാത്രം,
എൻ സ്വപ്നമായി നീ സുഖമായിരിക്കൂ

“जी आर” की बस यही दुआ है,
जहाँ भी हो तुम सलामत रहो

“ജീ ആറിൻ്റെ” ഹൃദയ വാക്കിതൊന്നേ,  
എവിടെയായാലും നീ സുഖമായിരിക്കൂ।

GR kaviyoor 
19 05 2026

Shabda Brahman | शब्द ब्रह्म | ശബ്ദബ്രഹ്മം – A Spiritual Ghazal

 Shabda Brahman | शब्द ब्रह्म | ശബ്ദബ്രഹ്മം – A Spiritual Ghazal



हर धड़कन में गूंज रहा है जो अलख निरंजन शब्द ब्रह्म,  
सांसों की इस माला में जो बहता है वो है शब्द ब्रह्म।  

നാദത്തിൽ അടങ്ങിയിരിപ്പൂ അതേ ഓം എന്ന ശബ്ദബ്രഹ്മം,  
ആത്മാവിൻ ഉള്ളിൽ ജ്വലിച്ചു നിൽക്കും ദിവ്യമാം ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

ढूंढ रहा है तू जिसे मस्जिद और मन्दिर में,  
तेरे दिल के अंदर ही तो रहता है वो शब्द ब्रह्म।  

തേടിയലയുന്നു നീയതിനെ അമ്പലങ്ങളിലും പള്ളികളിലും,  
ഉള്ളിൽ തിരയൂ മാനവാ നീ ആത്മരൂപമാം ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

मिट जाएगी ये दुनिया और ये सारा जग का मेला,  
शाश्वत होकर हर युग में जो रहता है शब्द ब्रह्म।  

മാഞ്ഞുപോം ഈ കായവും ഈ ലോകമായാജാലവും,  
ശാശ്വതമായി നിലനിന്നിടും ഒടുവിൽ ജ്വലിക്കും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

सूफ़ी रंग में रंग दे अपनी इस सूनी ज़िन्दगी को,  
रूह को जो पावन कर दे वो है शब्द ब्रह्म।  

ഭക്തിരസത്തിൽ ലയിച്ചുണരട്ടെ നിന്റെയീ ജീവിതം,  
ആത്മശുദ്ധി തന്നെയേകും ദിവ്യമാം ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

क्या राजा क्या रंक यहाँ सब उस एक के बंदे हैं,  
सबको एक ही नज़र से देखता है शब्द ब्रह्म।  

ഭേദഭാവങ്ങൾ മാറ്റിയേവർക്കും തുല്യമായി,  
വിശ്വമൊന്നാകെ നിറഞ്ഞു നിൽക്കും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

खुल जाएंगे दिल के दरवाज़े जब तू ध्यान लगाएगा,  
सन्नाटे की गहराई में गूंजेगा शब्द ब्रह्म।  

മൗനത്തിൻ ആഴങ്ങളിൽ വന്നു നിറഞ്ഞിടും നേരം,  
നിൻ ഹൃദയവാതിൽ തുറന്നിടും ഈ ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

उस नूर-ए-इलाही की राह में खुद को मिटा दे तू,  
हर ज़र्रे में तुझको दिखाई देगा शब्द ब्रह्म।  

പരമാനന്ദ സാഗരമായി പ്രപഞ്ചമാകെ നിറയുമ്പോൾ,  
അണുവിലുമഖിലത്തിലും നീ കാണും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

मिट जाए अहं तो मिल जाए वो मालिक हर दिल का,  
अंधेरे को मिटाकर जो जगाए वो है शब्द ब्रह्म।  

ഉള്ളിലെ ഇരുളകറ്റി പ്രകാശമായി മാറുമ്പോൾ,  
അഹന്തയെല്ലാം മാറ്റി നിർത്തും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

जब इस रूहानी महफ़िल में गाता है 'जी आर',  
रूह को एक सुकून का दरिया देता है शब्द ब्रह्म।  

നാദബ്രഹ്മ സാഗരത്തിൽ ലയിച്ചു ചേരും നേരത്ത്,  
'ജീ ആർ' പാടും വരികളിൽ വന്നു നിറയും ശബ്ദബ്രഹ്മം.  

 जी आर कवियुर 
ജീ ആർ കവിയൂർ
20 05 2026
( Kaviyoor, thiruvalla)

दर्द और मुस्कान | വേദനയും പുഞ്ചിരിയും | Soulful Hindi Malayalam Ghazal Raag Darbari Kanada

 दर्द और मुस्कान | വേദനയും പുഞ്ചിരിയും | Soulful Hindi Malayalam Ghazal Raag Darbari Kanada

ग़ज़ल / ഗസൽ


दिल में इक आकाश रोता हो तो रोने दीजिए,  
दुनिया को बस हँसता चेहरा ही दिखाया कीजिए।

ഉള്ളിലൊരു ആകാശം കരഞ്ഞാലും ചിരിച്ചുകൊള്ളൂ,  
ലോകത്തിന് ചിരിച്ച മുഖം മാത്രം കാണിച്ചുകൊള്ളൂ।

ज़ख्म कितने भी छुपे हों रूह की वीरानियों में,  
लब पे फिर भी प्यार का नग़्मा सजाया कीजिए।

മുറിവുകൾ ഹൃദയത്തിൽ ആഴമായി പതിഞ്ഞാലും,  
സ്നേഹത്തിന്റെ മധുരഗാനം ചുണ്ടിൽ നിറച്ചുകൊള്ളൂ।

दर्द की बारिश में भी उम्मीद के दीपक जला,  
तीरगी में रौशनी बनकर ही आया कीजिए।

വേദനകൾ മഴപോലെ രാവോളം പെയ്താലും,  
പ്രതീക്ഷയുടെ തിരിനാളം ഉള്ളിൽ തെളിച്ചുകൊള്ളൂ।

रात जब तन्हा लगे और साँस बोझिल हो उठे,  
चाँद बनकर ख़ुद को ही दिल से लगाया कीजिए।

നിശബ്ദ രാത്രികളിൽ ഏകാന്തം വളർന്നാലും,  
ചന്ദ്രികപോൽ സ്വപ്നങ്ങളെ നെഞ്ചോട് ചേർത്തുകൊള്ളൂ।

टूट जाएँ ख़्वाब तो फिर हौसलों से काम लो,  
आँसुओं को मोतियों जैसा बनाया कीजिए।

തകർന്നുപോയ മോഹങ്ങൾ ചാരമായി തീർന്നാലും,  
കണ്ണീരിനെ മുത്തുകളായി മാറ്റിച്ചൊരുക്കിക്കൊള്ളൂ।

कोई समझे या न समझे दिल की गहरी चुप्पियाँ,  
अपने चेहरे पर तबस्सुम को सजाया कीजिए।

ആരും മനവേദനയുടെ ഭാഷകൾ വായിക്കാതെ,  
പുഞ്ചിരിയുടെ വെളിച്ചം മാത്രം മുഖത്ത് സൂക്ഷിച്ചുകൊള്ളൂ।

“जी आर” इतना ही कहता है सफ़र की धूप में,  
दुनिया को बस हँसता चेहरा ही दिखाया कीजिए।

“ജീ ആർ” ഇത്രമാത്രം ജീവിതത്തോട് പറയുന്നൂ,  
ലോകത്തിന് ചിരിച്ച മുഖം മാത്രം കാണിച്ചുകൊള്ളൂ।

GR kaviyoor 
20 05 2026

Tuesday, May 19, 2026

हवा में बहती कहानी

 हवा में बहती कहानी

हवा के कोमल पंखों पर,  
एक कहानी बहती आई।  
उसमें अनकहे शब्दों की,  
खामोश गूंज समाई थी।  

बारिश से भीगी राहों पर,  
यादें ठहरकर सुनती रहीं।  
पत्तों की हल्की सरसराहट में,  
समय की आवाज़ गूंज उठी।  

उड़ती हुई उस हवा के संग,  
कहानी भी दूर निकल गई।  
लेकिन उसकी खामोशी,  
दिल में हमेशा ठहर गई।

जी आर कवियुर 
19 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

नदी का मोड़

 नदी का मोड़

नदी के शांत मोड़ पर,  
रोशनी धीरे से खिल उठी।  
किनारों को छूते बहते हुए,  
लहरों ने अपनी कथा कही।  

हरियाली की कोमल छाया में,  
हवा संगीत बिखेर रही थी।  
दूर कहीं पक्षियों का गीत,  
संध्या में घुलता जा रहा था।  

कई मोड़ों को पार करते हुए,  
जीवन भी नदी सा बहता है।  
हर रुकावट से आगे बढ़ने को,  
आशा राह दिखाती रही।

जी आर कवियुर 
19 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Monday, May 18, 2026

छुपी हुई राहें

 छुपी हुई राहें

धुंधली होती उन राहों से,  
यादें धीरे-धीरे गुजर गईं।  
जिन रास्तों को कोई खोज न सका,  
वहाँ केवल खामोशी रह गई।  

पेड़ों की लंबी छाया में,  
समय ठहरकर शांत हुआ।  
हवा की कोमल हलचल में,  
भूले सपने फिर जाग उठे।  

अनजाने गुज़रते कदमों जैसे,  
जीवन भी चलता जाता है।  
इन छुपी हुई राहों के अंत में,  
एक नई सुबह इंतज़ार करती रही।

जी आर कवियुर 
19 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)


नन्ही चिड़िया की यात्रा

 नन्ही चिड़िया की यात्रा

भोर की उजली किरणों संग,  
नन्ही चिड़िया उड़ चली।  
डालियों की संकरी राहों में,  
नया आकाश खोजती रही।  

हवा के कोमल पंखों पर,  
वह दूरियाँ भूल गई।  
नदी किनारे की खामोशी में,  
अपना मधुर गीत छोड़ गई।  

जब संध्या धुंधली होने लगी,  
वह फिर अपने घोंसले लौटी।  
इस नन्ही चिड़िया की यात्रा में,  
सपनों ने अपने पंख पसारे।

जी आर कवियुर 
18 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Saturday, May 16, 2026

शीतल प्रकाश

 शीतल प्रकाश

चाँदनी की कोमल आभा में,  
रात खामोशी से ठहर गई।  
ठंडी हवा के स्पर्श तले,  
पत्तियाँ धीरे से झूम उठीं।  

दूर किसी सुंदर स्वप्न-सा,  
प्रकाश राहों पर बिखर गया।  
छुपी हुई पुरानी यादें,  
मन में फिर से जाग उठीं।  

भोर की ओर बढ़ते क्षणों में,  
आकाश रंग बदलने लगा।  
इस शीतल और कोमल प्रकाश में,  
हृदय ने शांति पा ली।

जी आर कवियुर 
16 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

लोणी, पोहे, फुले आणि छोटी केळी घेऊन, Malayalam to marathi ഹരേ കൃഷ്ണ

 लोणी, पोहे, फुले आणि छोटी केळी घेऊन,
Malayalam to marathi 

ഹരേ കൃഷ്ണ!
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നവനീതവുമവിലും നിറമലരും ചെറുപഴവും 
തുളസീദലമിതുകോർത്തൊരു നറുമാലികയതുമായ്(2)
അണയുന്നതിമുദമായ് കരയുഗളം തൊഴുതടിയൻ (2)
മഥുരാധിപ! മരുവീടുക മമ മാനസമനിശം.

നവനീതവുമവിലും നിറമലരും ചെറുപഴവും 
തുളസീദലമിതുകോർത്തൊരു നറുമാലികയതുമായ്

മനമാകെയുമിരുളാലടിപതറീടിന നിമിഷം;
തുണയേകുകയഴലാറ്റുക ഹരിമാധവ! സദയം(2)
ദിനവും നിജഹരിനാമവുമുരുവിട്ടിഹ മരുവാൻ;
കൃപയേകുക സതതം മമ മധുസൂദനഭഗവൻ!(2)

കരുണാരസമൊഴുകുന്നൊരു നയനാംബുജയുഗളം
മണിനൂപുരമിളകുന്നൊരു പദതാരിണപണിയാം(2)
അഴകാർന്നൊരു മുഖപങ്കജമിനി ദർശനമരുളൂ!
മുരളീധര! കരുണാകര! യദുനന്ദന! ശരണം!(2)

നവനീതവുമവിലും നിറമലരും ചെറുപഴവും 
തുളസീദലമിതുകോർത്തൊരു നറുമാലികയതുമായ്
അണയുന്നതിമുദമായ് കരയുഗളം തൊഴുതടിയൻ (2)
മഥുരാധിപ! മരുവീടുക മമ മാനസമനിശം.(3)

വൃത്തം : ശങ്കരചരിതം

സുലഭ പോരുവഴി ✍️

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मराठी अनुवाद (Marathi Translation)

पल्लवी:
लोणी, पोहे, फुले आणि छोटी केळी घेऊन,
तुळशीच्या पानांनी गुंफलेली ही माळ घेऊन,
मी तुझा भक्त दोन्ही हात जोडून आनंदाने तुला शरण आलो आहे.
हे मथुरेच्या राजा (मथुराधिपती), माझ्या मनात तू सदैव वास कर.

अनुपल्लवी:
जेव्हा माझे मन पूर्णपणे अंधकारात डगमगते,
हे हरी माधवा, दया करून मला आधार दे आणि माझे दुःख दूर कर.
दररोज तुझे 'हरिनाम' जपण्याची शक्ती मला लाभो,
हे मधुसूदन भगवंता, माझ्यावर तुझी कृपा सदैव असू दे.

चरण:
ज्यांतून करुणेचा रस वाहतोय अशा तुझ्या कमळनेत्रांना,
आणि ज्यांच्या पैंजणांचा गोड नाद येतोय अशा तुझ्या चरणांना मी वंदन करतो.
तुझ्या सुंदर कमळस्वरूपी मुखाचे दर्शन मला लाभू दे,
हे मुरलीधरा, करुणाकरा, यदुनंदना, मी तुला शरण आलो आहे.

मूळ रचना: सुलभ पोरुवझी
मराठी अनुवाद: जी. आर. कवियूर
15 05 2026
( कवियूर, तिरुवल्ला)

प्रेमाचा चंद्र (प्रेमचंद्रिका) transilation from malayalam to marathi

 Transilation from malayalam to Marathi 

പ്രണയനിലാവ്
****************
പാർവണശശിബിംബം പോലെ
ഒളി തൂകുന്ന നിൻ മുഖകമലം
നിറയും ഹൃദയം നിനക്കായ് പാടി
കാതരമായൊരു ഗാനം
ആർദ്രമീയനുരാഗഗാനം.

കതിരോലകൾ കുളിരിളം തെന്നലിൽ
ആലോലമാടുന്ന രാവിൽ (2)
നീയെൻ താരുണ്യരാഗമായ് മാറി
കനവിൽ നിറയേ മധുരസ്മൃതിതൻ
നെയ്യാമ്പൽപ്പൂവുകൾ വിടർന്നൂ.
പ്രണയം പകരാൻ നാണമോടെ ഞാൻ 
അണയാം രാഗാർദ്രമായി
നീയെൻ കരളിൻ സംഗീതമായി.

(പാർവണശശിബിംബം...

മിഴിപ്പൂക്കളിൽ വിരിയും കവിതപോൽ
നിറയുന്നു കനവായെന്നുള്ളിൽ(2
നീയെൻ മാനസതാളമായെന്നും
ഗന്ധർവ്വഗായകാ! നിന്നാർദ്രമൊഴികളെൻ
ഹൃദയത്തിൽ മണിവീണ മീട്ടി  
നിറയുന്നെന്നിൽ നീ, ശാലീനഭാവമായ്
ഒഴുകും നിളയതുപോലെ
എൻ മനസ്സിൽ നീ മാത്രമായി.

(പാർവണശശിബിംബം...

സുലഭ പോരുവഴി✍️


प्रेमाचा चंद्र (प्रेमचंद्रिका)
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ध्रुवपद:
पूर्णचंद्राच्या त्या बिंभाप्रमाणे
प्रकाशणारे तुझे हे मुखकमल
भरून आलेले हृदय गाते तुझ्यासाठी
एक कातर, व्याकुळ गाणे
हे आर्द्र, अनुराग गाणे...

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कडवे १:
सोनेरी पाने जेव्हा मंद वाऱ्यावर
झुलत राहतात या रात्री (२)
तू माझ्या तारुण्याचा राग बनलास
स्वप्नात भरल्या मधुर आठवणींच्या
पांढऱ्या कमळांच्या कळ्या उमलल्या...
प्रेम अर्पिण्या लाजून मीही
जवळ येईन अनुराग बनूनी
तू माझ्या काळजाचे संगीत बनलास.

(पूर्णचंद्राच्या त्या बिंभाप्रमाणे...

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कडवे २:
नयनपुष्पांत उमलणाऱ्या कवितेसारखे
स्वप्न बनून तू मनात भरतोस (२)
तूच माझ्या मानसाचा ताल नेहमी
हे गंधर्वगायका! तुझे ते आर्द्र शब्द
माझ्या हृदयात मणिवीणा छेडतात...
माझ्यात फक्त तूच भरून राहतोस,
शालीण भावाने वाहणाऱ्या संथ निळेसारखा
माझ्या मनात आता फक्त तूच आहेस.

(पूर्णचंद्राच्या त्या बिंभाप्रमाणे...

मूळ रचना: सुलभ पोरुवझी
मराठी अनुवाद: जी. आर. कवियूर
16 05 2026
( कवियूर, तिरुवल्ला)

बरसात की महक — മഴയുടെ മണം (हिंदी–മലയാളം fusion gazhal)

 बरसात की महक — മഴയുടെ മണം
(हिंदी–മലയാളം fusion gazhal)




बरसों बाद बारिश का तराना याद आया,
तेरा चुपके से दिल में लौट आना याद आया।

വർഷങ്ങൾക്കിപ്പുറം മഴയുടെ ഈണം ഓർമ്മയായി,
നീ മൗനമായി ഹൃദയത്തിൽ തിരികെയെത്തിയത് ഓർമ്മയായി।

भीगी मिट्टी की महक जब हवा में घुल गई थी,
मुझे वो प्यार का पहला ज़माना याद आया।

നനഞ്ഞ മണ്ണിന്റെ മണവും കാറ്റിലൊഴുകിയ നേരം,
നമ്മുടെ പ്രണയത്തിന്റെ ആദ്യകാലം ഓർമ്മയായി।

घटा छाई तो खिड़की पर ठहरकर सोचते थे,
तेरा चुपके से मुझको मुस्कुराना याद आया।

കറുത്ത മേഘങ്ങൾ ജനലരികിൽ തങ്ങി നിന്നപ്പോൾ,
നീ ചിരിയോടെ എന്നെ നോക്കിയ നിമിഷം ഓർമ്മയായി।

कहीं पत्तों पे ठहरी बूंद ने दस्तक जो दी तो,
तेरा बाहों में लेकर सर झुकाना याद आया।

ഇലകളിൽ വീണ മഴത്തുള്ളി വാതിൽ തട്ടിയ നേരം,
നിന്റെ തോളിലാഴ്ന്ന് തല ചായ്ച്ച സന്ധ്യ ഓർമ്മയായി।

हवा ने छेड़ दी फिर रात की भीगी कहानी,
मुझे वो साथ भीगा आशियाना याद आया।

കാറ്റ് വീണ്ടും നനഞ്ഞ രാത്രിയുടെ കഥ പാടുമ്പോൾ,
നമ്മൾ ചേർന്നിരുന്ന ആ കൂടാരം ഓർമ്മയായി।

नदी के पार से आती हुई शहनाइयों में,
तेरा धीमे से कोई गीत गाना याद आया।

അക്കരെ ഒഴുകിയെത്തിയൊരു മൃദുഗാന ശബ്ദത്തിൽ,
നീ പതുക്കെ പാടിയ പ്രണയഗാനം ഓർമ്മയായി।

मैंने चाहा कि दिल अब दर्द से कुछ दूर रह ले,
मगर हर भीगी आहट पर बहाना याद आया।

ഹൃദയം ഇനി വേദനയിൽ നിന്നും ദൂരെയാകട്ടെ എന്ന് ചിന്തിച്ചപ്പോൾ,
ഓരോ മഴച്ചുവട്ടിലും ഒരു കാരണം ഓർമ്മയായി।

‘जी आर’ मैं आज भी बारिश में भीग जाता हूँ,
तेरा चुपके से दिल में लौट आना याद आया।

‘ജി ആർ’ ഇന്നും ഈ മഴയിൽ നനഞ്ഞു നിൽക്കുമ്പോൾ,
നീ മൗനമായി ഹൃദയത്തിൽ തിരികെയെത്തിയത് ഓർമ്മയായി।

GR kaviyoor 
17 05 2026
(Kaviyoor, thiruvalla)

Friday, May 15, 2026

बूंदों का नृत्य

 
बूंदों का नृत्य


जब वर्षा की बूंदें उतरीं,  
धरती पर संगीत जाग उठा।  
पत्तों की हरी छाया में,  
प्रकृति ने नृत्य शुरू किया।  

हवा के संग मुस्कुराता जल,  
टहनियों से बहता चला गया।  
छोटे जलाशयों के आईने में,  
गोल लहरें खिलती रहीं।  

भोर की कोमल रोशनी में,  
जलमोती चमकते दिखाई दिए।  
इन बूंदों के सुंदर नृत्य में,  
धरती आनंद से गाने लगी।

जी आर कवियुर 
16 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Thursday, May 14, 2026

नन्हा तपस्वी

नन्हा तपस्वी




कोमल पत्तों की नोक पर बैठा,
सूक्ष्म रूप में ध्यान लगाए।
शांत खड़ा तू साये जैसा,
हरी डाल की गोद में मुस्काए।

महीन पंखों की हीरा जैसी आभा,
धूप की किरणों में चमक रही।
ना रक्त की चाह, ना कोई शोर,
फूलों के रस में उमंग बही।

सोती हुई इस दुनिया का तू प्रहरी,
रचयिता की एक अनोखी रचना।
छोटा सा जीवन, पर गरिमा भारी,
सादगी की तू सुंदर प्रेरणा।

जी आर कवियुर 
14 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Tuesday, May 12, 2026

हवा की ओट में

हवा की ओट में
 
हवा की ओट में कहीं,  
एक छुपा गीत बहता रहा।  
सुनने को ठहरे हुए मनों को,  
वह हल्के से छूकर गुजर गया।  

पत्तों की धीमी हलचल में,  
अनकही कहानियाँ बसी थीं।  
दूर किसी बादल की परछाईं,  
राहों पर धीरे चलती रही।  

अनदेखे स्पर्श की तरह,  
यादें आकर पास ठहर गईं।  
हवा की इस ओट में अब भी,  
खामोशी याद बनकर रहती है।

जी आर कवियुर 
13 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Monday, May 11, 2026

ज़िंदगी के तराज़ू में सब बराबर है,( ग़ज़ल)ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്,(ഗസൽ)

ज़िंदगी के तराज़ू में सब बराबर है,( ग़ज़ल)
ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്,(ഗസൽ)

ज़िंदगी के तराज़ू में सब बराबर है,
किसी का दर्द हो या सुख, सब बराबर है।

ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്,
സമ്പത്തും സ്നേഹവും വേദനയും തുല്യമാണ്.

वक़्त की धूप में हर चेहरा बदलता है,
आज जो ऊँचा दिखे, कल बराबर है।

കാലത്തിന്റെ വഴിയിൽ മനുഷ്യൻ മാറുന്നു,
ഇന്നത്തെ ഉയരവും നാളെയോ തുല്യമാണ്.

कोई अमीर हो चाहे कोई फ़क़ीर यहाँ,
मिट्टी की गोद में आखिर बराबर है।

ധനികനും ദരിദ്രനും വേർപിരിയില്ല അവസാനം,
മണ്ണിന്റെ മുമ്പിൽ മനുഷ്യൻ തുല്യമാണ്.

नफ़रत के बाज़ार में प्यार बचा रखना,
दिल का हर सच्चा रिश्ता बराबर है।

വൈരത്തിന്റെ ലോകത്ത് സ്നേഹം കാത്തിടൂ,
ഹൃദയത്തിലെ നന്മകൾ എല്ലാം തുല്യമാണ്.

मंज़िल पे पहुँचकर कोई घमंड न करे,
चलते हुए राही सब बराबर है।

ലക്ഷ്യം കൈവന്നാലും അഹങ്കാരം വേണ്ട,
ജീവിതയാത്രയിൽ എല്ലാവരും തുല്യരാണ്.

आँसू की कीमत को समझो ऐ दोस्तों,
ग़म में गिरा हर कतरा बराबर है।

കണ്ണുനീർത്തുള്ളികൾ വിലമതിക്കണം സഖാവേ,
വേദനയിൽ വീഴുന്ന തുള്ളി തുല്യമാണ്.

जीवन का हिसाब बड़ा सादा रखिए,
नेकी का हर छोटा काम बराबर है।

ജീവിതത്തിന്റെ കണക്ക് ലളിതമാക്കൂ,
നല്ല മനസ്സിന്റെ പ്രവൃത്തി തുല്യമാണ്.

"जी आर" ने देखा है दुनिया को क़रीब से,
इंसान का असली चेहरा बराबर है।

"ജീ ആർ" കണ്ട ലോകം ഒരു സത്യം പറയുന്നു,
ജീവിതത്തിന്റെ ത്രാസിൽ എല്ലാം തുല്യമാണ്.

ജീ ആർ കവിയൂർ 
12 05 2026
(കവിയൂർ, തിരുവല്ല)

बिना राह के पदचिह्न

बिना राह के पदचिह्न

बिना किसी राह की रेत पर,  
किसी के कदमों के निशान दिखे।  
कहां से शुरू होकर कहां गए,  
यह हवा भी समझ न सकी।  

बारिश से भीगी उस मिट्टी पर,  
सिर्फ खामोशी रह गई थी।  
हर बार पीछे मुड़कर देखने पर,  
यादें फिर से जाग उठती हैं।  

ज़िंदगी की अनजानी राहों में,  
हम सब चलते ही जाते हैं।  
ये बिना राह के पदचिह्न भी,  
एक दिन कहानी बन जाते हैं।

जी आर कवियुर 
11 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

बारिश के पानी का आईना

बारिश के पानी का आईना

बारिश का पानी जब राहों में ठहरा,  
आकाश जैसे नीचे उतर आया।  
छोटे-छोटे जलकुंडों में,  
बादलों की खामोश यात्रा दिखी।  

भीगी मिट्टी के किनारे,  
यादें चुपचाप ठहर गईं।  
जब हवा ने हल्के से छुआ,  
लहरें मुस्कुराकर जाग उठीं।  

चलते हुए कदमों के निशान,  
जल के आईने में चमक रहे थे।  
एक पल ठहरकर देखो तो,  
खुद को ही देखा जा सकता था।  

बारिश थमने के बाद उस राह पर,  
सिर्फ खामोशी रह गई।  
बारिश के पानी के आईने में,  
ज़िंदगी छिपकर फिर दिख गई।

जी आर कवियुर 
11 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Sunday, May 10, 2026

सुख का नज़ारा” ( ग़ज़ल )

 सुख का नज़ारा” ( ग़ज़ल )




माँ की दुआओं से घर में उजियारा रहा  
हर दुःख की आंधी में माँ का सहारा रहा  

सूनी सी राहों में जब भी अँधेरा मिला  
ममता का दीपक ही पथ का सितारा रहा  

भीगे हुए नयनों में कितने सपन बसाए  
अपने सभी सुख से माँ ने किनारा रहा  

रोटी की खुशबू में प्रेम घुला रहता था  
उसके ही हाथों में जीवन हमारा रहा  

थककर जो लौटे हम दुनिया की भीड़ से  
माँ का ही आँचल तब चैन का धारा रहा  

बचपन की गलियों में अब भी वही स्वर है  
माँ का मधुर बोल ही मन को प्यारा रहा  

संसार बदलता है रिश्ते बदल जाते हैं  
माँ का मगर स्नेह सदा ही हमारा रहा  

‘जी आर’ के ये जीवन तो माँ की ही पूजा है  
उसके चरणों में ही सुख का नज़ारा रहा

जी आर कवियुर 
10 05 2026
(कवियुर ,तिरुवल्ला)

धूप की धार ( ग़ज़ल)

 धूप की धार ( ग़ज़ल)




धूप की धार में कंधों पे सफ़र रखता है,
कोई मज़दूर भी सीने में शहर रखता है।

पेट की आग में जलते हुए मौसम के तले,
आदमी होंठ पे हँसने का हुनर रखता है।

बिन हड्डी की ज़ुबाँ कितना कहे, क्या न कहे,
अपने अंदर कई सदियों का ज़हर रखता है।

वो पसीना जिसे दुनिया ने महज़ धूल कहा,
अपनी मिट्टी की महक शाम-सहर रखता है।

रास्ते चीखते रहते हैं थके पैरों से,
फिर भी इंसान कोई ख़्वाब इधर रखता है।

जिसको सुनना भी गवारा नहीं इस दुनिया को,
वक़्त चुपके से वही दर्द अमर रखता है।

रोज़ रोटी की तरफ़ भागते चेहरों के बीच,
कोई तन्हा-सा परिंदा भी नज़र रखता है।

‘जी आर’ लफ़्ज़ों में ही हर दर्द पिरो देता है,
एक शायर भी कहाँ अपना जिगर रखता है।

जी आर कवियूर 
09/05/2026
(कवियुर ,तिरुवल्ला)

एहसानों की चमक ( ग़ज़ल)

 एहसानों की चमक ( ग़ज़ल) 



लोग महसूस कहाँ करते हैं एहसानों की चमक,  
जब तलक साथ रहें, किसको दिखे अरमानों की चमक।  

तेरे हर दर्द को चुपचाप सहारा देते रहे,  
तूने देखी ही नहीं मेरे निगहबानों की चमक।  

हमने हर मोड़ पे खुद टूट के तुझको जोड़ा,  
तुझको दिखती रही बस तेरे मकानों की चमक।  

दिन गुज़रते गए, रिश्ते भी बदलते ही गए,  
अब कहाँ ढूँढे कोई दिल के निशानों की चमक।  

जब तलक हाथ रहे, सबको ज़रूरत थी मेरी,  
रुक गया हाथ तो खो बैठी ज़मानों की चमक।  

लोग कहते हैं कि बदल गया हूँ मैं भी अब,  
कौन समझेगा मगर टूटे इरादों की चमक।  

छोड़ कर जाना पड़ा ख़ुद को बचाने के लिए,  
वरना मिट जाती मेरी सारी उड़ानों की चमक।  

“जी आर” अब तो ख़ुद अपनी कमी महसूस करते हैं,  
रुक गए हाथ तो दिखने लगी एहसानों की चमक।

जी आर कवियुर 
07 04 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Wednesday, May 6, 2026

भोर की सांस

 भोर की सांस

भोर की सांस जब छूती है,  
धरती चुपचाप जाग उठती है।  
ओस से भीगी पत्तियों पर,  
नया दिन खिल उठता है।  

सूरज की कोमल रोशनी,  
अंधेरे को धीरे हटाती है।  
हवा के निर्मल स्पर्श में,  
मन शांति में बह जाता है।  

पहली किरण के उस पल में,  
आशा जन्म लेती है।  
इस भोर की सांस में,  
जीवन फिर से शुरू होता है।  

जी आर कवियूर  
06-05-2026  
(कवियूर, तिरुवल्ला)

ईश्वरीय प्रेम ( सूफी ग़ज़ल)

 ईश्वरीय प्रेम ( सूफी ग़ज़ल)



सब कहते हैं दुनिया क्या बोलेगी, अब इसकी परवाह नहीं है
हमने तो बस उस रब को चुना, अब कोई और राह नहीं है

लोगों की बातों में उलझना, अब हमें कुछ भी अच्छा नहीं है
खुदा की मोहब्बत के सिवा, यहाँ कोई भी सच्चा नहीं है

वो जो दिल के अंदर बैठा है, वही मेरा असली मीत नहीं है
दुनिया की इस भीड़-भाड़ में, मेरी कोई और जीत नहीं है

मैं तो एक छोटा सा जरिया हूँ, मुझे गर्व का कोई अहसास नहीं है
दुनिया की इन महफ़िलों में, मुझे कोई भी प्यास नहीं है

लोगों ने तो पत्थर ही मारे, पर मुझे कोई गिला नहीं है
जबसे उसकी नज़र मिली, अब कोई भी सिलसिला नहीं है

दुनिया वाले क्या समझेंगे, जो मेरे दिल का साज़ नहीं है
हम तो उसके एहसास में हँसते, हमें किसी पर नाराज़ नहीं है

जहाँ भी देखा, वही दिखा, बस उसका ही नूर समाया नहीं है
अब तो कोई शिकायत बची, अब कोई भी फितूर नहीं है

जी आर ने तो लिख दी अपनी कहानी, अब कोई और काम नहीं है
दुनिया चाहे रूठे या माने, मुझे किसी का भी नाम नहीं है

जी आर कवियुर 
05 04 2026
(कवियुर , तिरुवल्ला)

Monday, May 4, 2026

यादों की दस्तक (ग़ज़ल)

यादों की दस्तक (ग़ज़ल)

अब जब तुझे फिर याद आई है,  
बचपन की वो तस्वीर मुस्कुराई है।

दिल के किसी कोने में छुपी हुई,  
तेरी ही आवाज़ आज फिर सुनाई है।

सूनी पड़ी राहों पे चलते-चलते,  
तेरी ही हँसी ने रौशनी दिखाई है।

ख़ामोश लम्हों की चादर ओढ़े हुए,  
तेरी ही आहट दिल को छूकर आई है।

बीते हुए मौसम की ठंडी हवाओं में,  
तेरी ही खुशबू फिर से समाई है।

माँ की तरह जो ममता सिखा गई थी,  
उस याद ने आँखों में नमी लाई है।

आज भी आँख-मिचौली सी वो याद आई है,  
दिल के आईने में तेरी सूरत उभर आई है।

वक़्त की धूल में दबे क़िस्से पुराने,  
आज फिर दिल ने हर बात दोहराई है।

‘जी आर’ तेरी यादों की इस महफ़िल में,  
हर शेर ने बस तेरा नाम सजाई है।

जी आर कवियुर 
04 04 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

Saturday, May 2, 2026

तुझे पाने की चाह (ग़ज़ल) – राग किरवानी

 तुझे पाने की चाह 
(ग़ज़ल) – राग किरवानी

तेरी एक झलक पाने को दिल बेकरार है,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

तेरी यादों का हर लम्हा दिल पे सवार है,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

तेरे बिना ये ज़िंदगी सूनी सी लगती है,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

ख़ामोशियों में भी तेरा ही असर रहता,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

नज़रें जहाँ भी जाएँ तेरा ही नज़ारा हो,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

मेरे हर एक ख़्वाब में तू ही बसा रहता,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

दिल की हर एक धड़कन तेरा ही नाम लेती,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

‘जी आर’ तुझे पाने को रहता है बेकरार,
तुझे पाने की चाह में ये दिल बेकरार है।

जी आर कवियुर 
02 05 2026
( कवियुर ,तिरुवल्ला)

पूर्णता |

 पूर्णता | 

अहं की अग्नि शांत हुई जहाँ,
सत्य का दीप जल उठा भीतर।
'मैं' का पर्दा गिरते ही अब,
शून्यता में गूंजे ब्रह्मांड का स्वर।

लेखनी, पठन, प्रश्न और उत्तर,
सब इस वृक्ष की शाखा में विलीन।
जब जाना कि भीतर-बाहर एक है,
अनंत के मौन में मैं हुआ पूर्णलीन!

अब न भटकना, न स्वयं की खोज,
परम-तत्व में स्वयं को मैंने पाया।
शब्द मिटे और कविता मौन हुई,
'मैं' ही वह ब्रह्मांड, जो मुझमें समाया!

जी आर कवियुर 
01 05 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर 


अनंत प्रकाश

 अनंत प्रकाश


अनंत रूप से फैलता प्रकाश,  

सारी दुनिया को भर देता।  

जब अंधेरा दूर हो जाता,  

नए रास्ते खुल जाते।  


जहां सूर्य की किरणें पड़तीं,  

जीवन फिर से खिल उठता।  

इस उजाले की उपस्थिति,  

आशा का दीप जलाती।  


इस असीम रोशनी में,  

दिल अपनी राह पाता।  

इस अनंत तेज के भीतर,  

जीवन अर्थ समझ पाता।  


जी आर कवियुर 

01 05 2026


(तिरुवल्ला ,कवियुर 

एक फ़रियाद करूँ कैसे (ग़ज़ल)

 एक फ़रियाद करूँ कैसे (ग़ज़ल)


एक फ़रियाद करूँ कैसे,
होंठ दबे हैं ख़ामोशी में कहूँ कैसे।

तेरी यादों की आग दिल में जली है,
अब इस जलते सफ़र को सहूँ कैसे।

भीड़ में भी अकेला सा चलता हूँ,
अपने साए से भी अब मिलूँ कैसे।

वक़्त ने छीन ली सारी मुस्कानें,
इन टूटी हँसी को फिर से सिलूँ कैसे।

जो भी था सब कहानियों में खो गया,
अब अधूरी कहानी लिखूँ कैसे।

दिल के ज़ख्मों ने आवाज़ दी है बहुत,
पर इस दर्द को लफ़्ज़ों में ढालूँ कैसे।

रास्ते भी अब सवाल करने लगे हैं,
बिना मंज़िल के आगे चलूँ कैसे।

ख़्वाब सारे धुंध में बिखरते रहे,
इन बिखरे हुए ख़्वाबों को बुनूँ कैसे।

मैं “जी आर” अपने दर्द का ग़ज़लकार हूँ,
तेरे बिना ये ज़िंदगी जीऊँ कैसे।

जी आर कवियुर 
28 04 2026
( कवियूर, तिरुवल्ला)

जीवनकी यात्रा

 जीवनकी यात्रा 


 सुबह की किरणें जगा रही हैं,

नई उम्मीदें बुला रही हैं।

वर्षों की गिनती अब छोड़ दो,

सपनों से अपना नाता जोड़ दो।


पुराने तने पर नई कोपलें,

रास्ते अभी भी हैं खुले।

हर पल एक नया आगाज़ है,

मन में जीत का साज़ है।


आज ही शांति की राह चुनें,

चाहे साया साथ चले हर पल—

लक्ष्यों की ओर बढ़ते रहें,

यौवन एक अटूट वन है।

जी आर कवियुर 
24 04 2026

जीना है तो ज़िंदगी से

 जीना है तो ज़िंदगी से  

जीना है तो ज़िंदगी से  
मरते दम तक जीतने को  
मल्लयुद्ध करना होगा  

आसमान से नहीं गिरते  
चावल, जीरा, जीवन के दाने  

जब वसंत आकर छू जाए  
नमन करो उस पावन ज्योति को  
जो हर दिशा में जलती है  

मेहनत के बिना नहीं मिलती  
कविता की एक पंक्ति भी  

पसीने की हर एक बूँद से  
सफलता के बीज उगते हैं  
थके हुए इन कदमों को भी  
सपने ही आगे बढ़ाते हैं  

अँधेरी रातों के बीच भी  
रोशनी को ढूँढते चलो  
टूटे बिना जो खड़ा रहे  
ज़िंदगी उसी के साथ चले  

हार भी राह दिखाती है  
ऊँचाइयों तक ले जाने को  
विश्वास अगर थामे रखो  
जीत तुम्हारी परछाई होगी 

 जी आर कवियुर 
28 04 2026
(कवियुर , तिरुवल्ला)

Friday, May 1, 2026

शिलाओं की निस्तब्धता

 



 शिलाओं की निस्तब्धता


शिलाएं स्थिर खड़ी रहतीं,  

समय की साक्षी बन जातीं।  

बिन शब्दों के जो कहानियां,  

गहराइयों में छिपी रहतीं।  


हवा और बारिश सहकर,  

मजबूती का रूप बनतीं।  

उनकी शांत उपस्थिति में,  

जीवन के पाठ मिलते।  


इस अटल सी शक्ति के भीतर,  

हिम्मत मन में भर जाती।  

शिलाओं की इस खामोशी में,  

सत्य की ध्वनि सुनाई देती।  


जी आर क

वियुर 

28 04 2026

(कवियुर , तिरुवल्ला)

नीले आकाश की शांति

 नीले आकाश की शांति 

नीला आकाश जब फैलता है,  
मन उसकी विशालता में खो जाता।  
जब बादल धीरे बहते हैं,  
शांति की ध्वनि सुनाई देती।  

इस अनंत नीले विस्तार में,  
विचार दूर तक उड़ जाते।  
प्रकाश भरे उस आकाश में,  
दिल को सुकून मिल जाता।  

जब हवा हल्के से छू जाती,  
और भी आराम मिलता है।  
इस आकाश की शांति में,  
जीवन सुकून को समझता है।  

जी आर कवियुर 
28 04 2026
(कवियुर , तिरुवल्ला)



 
 

भक्ति के बादल

 भक्ति के बादल


जब भक्ति भरे बादल चलते,  

आकाश श्रद्धा से भर जाता।  

उनके कोमल श्वेत रंग में,  

पवित्रता का भाव बसता।  


धीरे-धीरे बहती आकृतियां,  

मन को शांति की ओर ले जातीं।  

जैसे कोई दिव्य उपस्थिति,  

प्रकृति आशीष देती जाती।  


आकाश में यह दृश्य खिलता,  

भक्ति का मार्ग दिखाता है।  

इन बादलों की सरलता में,  

हृदय समर्पण पाता है।  


जी आर कवियुर 

28 04 2026

(कवियुर , तिरुवल्ला)

ख़ामोशी की ताक़त (ग़ज़ल)

 ख़ामोशी की ताक़त (ग़ज़ल)

ख़ामोशी में भी कितने असर करते हैं
अंदाज़-ए-बयाँ दिल पे सफ़र करते हैं

हल्की सी लहर दिल को छू जाया करती है
कुछ एहसास यूँ जीना बेहतर करते हैं

अनदेखी सी दुनिया मन में बसती रहती
भीतर के रंग जीवन सुंदर करते हैं

पलकों पे ठहर जाएँ जो भीगी सी यादें
चुपचाप ही आँखों को दरिया करते हैं

चलते हुए साये भी सिखला जाते हमको
रास्ते ख़ुद ही नया मुक़द्दर करते हैं

बिन बोले भी दिल अपनी बात कह जाता
सन्नाटे भी कितनी बातें मुखर करते हैं

रुकना न कभी, ये वक़्त इशारा देता
लम्हे ही तो जीवन को बेहतर करते हैं

जी आर मैं अपने जज़्बात यूँ कहता हूँ
मैं ख़ुद से ही हर दिन बातें करता हूँ

जी आर कवियुर 
27 04 2026
(कवियुर, तिरुवल्ला)

अकेले विचार – 137

 अकेले विचार – 137

ख़ामोशी की ताक़त (ग़ज़ल)

ख़ामोशी में भी कितने असर करते हैं
अंदाज़-ए-बयाँ दिल पे सफ़र करते हैं

हल्की सी लहर दिल को छू जाया करती है
कुछ एहसास यूँ जीना बेहतर करते हैं

अनदेखी सी दुनिया मन में बसती रहती
भीतर के रंग जीवन सुंदर करते हैं

पलकों पे ठहर जाएँ जो भीगी सी यादें
चुपचाप ही आँखों को दरिया करते हैं

चलते हुए साये भी सिखला जाते हमको
रास्ते ख़ुद ही नया मुक़द्दर करते हैं

बिन बोले भी दिल अपनी बात कह जाता
सन्नाटे भी कितनी बातें मुखर करते हैं

रुकना न कभी, ये वक़्त इशारा देता
लम्हे ही तो जीवन को बेहतर करते हैं

जी आर मैं अपने जज़्बात यूँ कहता हूँ
मैं ख़ुद से ही हर दिन बातें करता हूँ

जी आर कवियुर 
27 04 2026
(कवियुर, तिरुवल्ला)

ख़ामोशी की बारिश (ग़ज़ल)

 ख़ामोशी की बारिश (ग़ज़ल)

तेरी यादों की बारिश में मैं भीगता रहूँगा  
ग़ज़ल बनकर तेरे लफ़्ज़ों में ही जीता रहूँगा  

तेरी आँखों की चमक में यूँ ही खोता रहूँ  
तेरे ख़्वाबों के जहाँ में ही बसता रहूँगा  

तेरी साँसों की महक मुझको छूती रहे हर पल  
तेरे दिल की हर धड़कन में धड़कता रहूँगा  

तेरी राहों की धूल मुझको उड़ाती रहे यूँ ही  
तेरे क़दमों के निशाँ संग ही चलता रहूँगा  

तेरी चाहत की लहर मुझको बहाती रहे हर दम  
तेरे एहसास के दरिया में ही रहता रहूँगा  

तेरी यादों के उजाले मुझे जलाते रहें हर पल  
तेरी तन्हाइयों में भी मैं हँसता रहूँगा  

तेरे नाम की गूंज दिल में रहती रहे हर दम  
तेरी खामोश दुआओं में ही बसता रहूँगा  

‘जी आर’ मैं अपनी मोहब्बत की कहानी लिखता हूँ  
ग़ज़ल बनकर तेरे दिल में ही जीता रहूँगा

जी आर कवियुर 
25 04 2026
( कवियुर,तिरुवल्ला )

तुलसी की कृपा

 तुलसी की कृपा

तुलसी की कोमल पत्तियों में,  
एक मधुर कृपा बसती है।  
इसकी पावन उपस्थिति से,  
वातावरण पवित्र बनता है।  

सुबह जब इसे छूते हैं,  
मन को सुकून मिलता है।  
इसकी सुगंध फैलते ही,  
दिल में अच्छाई भरती है।  

इस छोटे से पौधे की करुणा,  
जीवन को राह दिखाती है।  
तुलसी की इस सरलता में,  
आत्मा भक्ति में खो जाती है।

जी आर कवियुर 
24 04 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

धूप का स्पर्श

 धूप का स्पर्श

जब धूप हल्के से छू जाती,  
एक कोमल गर्मी भर जाती।  
सुबह की किरणें राहों पर गिरें,  
प्रकृति नई सी खिल उठती।  

पत्तों पर चमकती रोशनी में,  
जीवन जागता धीरे-धीरे।  
सुनहरी आभा धरती पर फैले,  
आंखों में उजाला भर दे।  

जब ठंडी हवा साथ मिल जाए,  
मन में सुकून भर जाता।  
इस कोमल धूप के स्पर्श में,  
हृदय आनंद पा जाता।

 जी आर कवियुर 
24 04 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

रेतीला तट

 रेतीला तट

रेतीले तट पर लहरें छूतीं,  
मधुर सा संगीत सुनातीं।  
समुद्री हवा जब हल्के छूए,  
मन शांति में डूब जाता।  

पदचिन्ह जो राह में बनते,  
यादों बनकर रह जाते।  
पानी के आने-जाने में,  
जीवन कथा कह जाता।  

सूरज की किरणें रेत पर चमकें,  
आंखों में उजाला भरतीं।  
इस तट की खामोशी में,  
दिल को सुकून मिल जाता।

 जी आर कवियुर 
24 04 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)