एहसानों की चमक ( ग़ज़ल)
लोग महसूस कहाँ करते हैं एहसानों की चमक,
जब तलक साथ रहें, किसको दिखे अरमानों की चमक।
तेरे हर दर्द को चुपचाप सहारा देते रहे,
तूने देखी ही नहीं मेरे निगहबानों की चमक।
हमने हर मोड़ पे खुद टूट के तुझको जोड़ा,
तुझको दिखती रही बस तेरे मकानों की चमक।
दिन गुज़रते गए, रिश्ते भी बदलते ही गए,
अब कहाँ ढूँढे कोई दिल के निशानों की चमक।
जब तलक हाथ रहे, सबको ज़रूरत थी मेरी,
रुक गया हाथ तो खो बैठी ज़मानों की चमक।
लोग कहते हैं कि बदल गया हूँ मैं भी अब,
कौन समझेगा मगर टूटे इरादों की चमक।
छोड़ कर जाना पड़ा ख़ुद को बचाने के लिए,
वरना मिट जाती मेरी सारी उड़ानों की चमक।
“जी आर” अब तो ख़ुद अपनी कमी महसूस करते हैं,
रुक गए हाथ तो दिखने लगी एहसानों की चमक।
जी आर कवियुर
07 04 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

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