शोर-ए-महफ़िल
(गज़ल)
हम अपनी बात महफ़िल में कह न सके,
शोर-ए-“वाह-वाह” में कुछ भी सुन न सके।
हम अपने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल न सके,
हर एक बात को दिल से सही कह न सके।
सुनाने आए थे जो दिल की दास्तान,
हवा के शोर में वो भी हम कह न सके।
हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बन गई,
मगर वो सदा भी किसी तक कह न सके।
नज़रें झुकी रहीं, अल्फ़ाज़ खोते रहे,
जो दिल में था वो जुबां से हम कह न सके।
महफ़िल में लोग बस ताली बजाते रहे,
और हम अपने ही जज़्बात कह न सके।
हर इक “वाह-वाह” में आवाज़ दबती गई,
हम अपना सच भी किसी से कह न सके।
कविता के इस शोर में खो गई हर सदा,
जीआर भी अपना दर्द यहाँ कह न सके।
जी आर कवियुर
22 06 2026

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