Sunday, May 24, 2026

शोर-ए-महफ़िल (गज़ल)

 शोर-ए-महफ़िल 
(गज़ल)




हम अपनी बात महफ़िल में कह न सके,
शोर-ए-“वाह-वाह” में कुछ भी सुन न सके।

हम अपने दर्द को लफ़्ज़ों में ढाल न सके,
हर एक बात को दिल से सही कह न सके।

सुनाने आए थे जो दिल की दास्तान,
हवा के शोर में वो भी हम कह न सके।

हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बन गई,
मगर वो सदा भी किसी तक कह न सके।

नज़रें झुकी रहीं, अल्फ़ाज़ खोते रहे,
जो दिल में था वो जुबां से हम कह न सके।

महफ़िल में लोग बस ताली बजाते रहे,
और हम अपने ही जज़्बात कह न सके।

हर इक “वाह-वाह” में आवाज़ दबती गई,
हम अपना सच भी किसी से कह न सके।

कविता के इस शोर में खो गई हर सदा,
जीआर भी अपना दर्द यहाँ कह न सके।

जी आर कवियुर 
22 06 2026


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