Saturday, May 2, 2026

एक फ़रियाद करूँ कैसे (ग़ज़ल)

 एक फ़रियाद करूँ कैसे (ग़ज़ल)


एक फ़रियाद करूँ कैसे,
होंठ दबे हैं ख़ामोशी में कहूँ कैसे।

तेरी यादों की आग दिल में जली है,
अब इस जलते सफ़र को सहूँ कैसे।

भीड़ में भी अकेला सा चलता हूँ,
अपने साए से भी अब मिलूँ कैसे।

वक़्त ने छीन ली सारी मुस्कानें,
इन टूटी हँसी को फिर से सिलूँ कैसे।

जो भी था सब कहानियों में खो गया,
अब अधूरी कहानी लिखूँ कैसे।

दिल के ज़ख्मों ने आवाज़ दी है बहुत,
पर इस दर्द को लफ़्ज़ों में ढालूँ कैसे।

रास्ते भी अब सवाल करने लगे हैं,
बिना मंज़िल के आगे चलूँ कैसे।

ख़्वाब सारे धुंध में बिखरते रहे,
इन बिखरे हुए ख़्वाबों को बुनूँ कैसे।

मैं “जी आर” अपने दर्द का ग़ज़लकार हूँ,
तेरे बिना ये ज़िंदगी जीऊँ कैसे।

जी आर कवियुर 
28 04 2026
( कवियूर, तिरुवल्ला)

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