काले बादल घिर आए थे,
पर वर्षा धरती पर न उतरी।
प्रतीक्षा करती सूखी मिट्टी पर,
केवल खामोशी उतर आई।
हवा की धुंधली हलचल में,
अनजाना दर्द भर गया था।
जो शब्द कहे नहीं गए,
वे मन में लहर बन उठे।
उस बारिश की तरह जो बरस न सकी,
कुछ सपने भी खो गए।
फिर भी आशा का बीज,
दिल में जीवित बना रहा।
जी आर कवियुर
21 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)
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