बारिश का पानी जब राहों में ठहरा,
आकाश जैसे नीचे उतर आया।
छोटे-छोटे जलकुंडों में,
बादलों की खामोश यात्रा दिखी।
भीगी मिट्टी के किनारे,
यादें चुपचाप ठहर गईं।
जब हवा ने हल्के से छुआ,
लहरें मुस्कुराकर जाग उठीं।
चलते हुए कदमों के निशान,
जल के आईने में चमक रहे थे।
एक पल ठहरकर देखो तो,
खुद को ही देखा जा सकता था।
बारिश थमने के बाद उस राह पर,
सिर्फ खामोशी रह गई।
बारिश के पानी के आईने में,
ज़िंदगी छिपकर फिर दिख गई।
जी आर कवियुर
11 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)
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