Sunday, May 10, 2026

धूप की धार ( ग़ज़ल)

 धूप की धार ( ग़ज़ल)




धूप की धार में कंधों पे सफ़र रखता है,
कोई मज़दूर भी सीने में शहर रखता है।

पेट की आग में जलते हुए मौसम के तले,
आदमी होंठ पे हँसने का हुनर रखता है।

बिन हड्डी की ज़ुबाँ कितना कहे, क्या न कहे,
अपने अंदर कई सदियों का ज़हर रखता है।

वो पसीना जिसे दुनिया ने महज़ धूल कहा,
अपनी मिट्टी की महक शाम-सहर रखता है।

रास्ते चीखते रहते हैं थके पैरों से,
फिर भी इंसान कोई ख़्वाब इधर रखता है।

जिसको सुनना भी गवारा नहीं इस दुनिया को,
वक़्त चुपके से वही दर्द अमर रखता है।

रोज़ रोटी की तरफ़ भागते चेहरों के बीच,
कोई तन्हा-सा परिंदा भी नज़र रखता है।

‘जी आर’ लफ़्ज़ों में ही हर दर्द पिरो देता है,
एक शायर भी कहाँ अपना जिगर रखता है।

जी आर कवियूर 
09/05/2026
(कवियुर ,तिरुवल्ला)

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