Monday, April 3, 2017

शाम और शमां भी बुझ गयी

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चांद की रोशनी में,
तेरे गम और जाम के साये में
वक्त के दरम्यान साकी  ,
जो तूने तोड़ा मेरा दिल ,
टुकड़े हुए अरमानों के पैमाने !
लगी चोट दिल के आईने में !
क्या बताऊँ तू जो रूठ के गयी
खामोशी से ,छोड़ अकेला मैखाने में ,
सिर्फ आंसुओं के सिवा कुछ नहीं दिखता
शाम और शमां भी बुझ गयी  !!!

Wednesday, August 3, 2016

हम है मधेपुरामे - कविता जी आर कवियूर

हम है मधेपुरामे - कविता जी आर कवियूर (03.08.2016)



बाहर मे हूं बिहार मे मधेपुरा में हूं
अंग्रेजोके दिनोमे
कोशीकेँ किनारे इस जगहपर
बीमारो और छुट्टी जाने वाले 
जवान पटाव टालते थे
अब हमभी आ  पहुंचे
दुःख दर्द क्या बताये
मानकी भटक निकालू  कैसे
जोतो ठहरा है  इस मज़बूरी के
नाम को कहते है  मधेपुरा
भगवान माधव  के जगह
बनगाई माधवपुर
मिथिलाके इस महा जगे के निकट
रहते सिख हृषि वे रामायण कालपे
किया पुत्र कामेष्टि याग शाला
कहलाते है सिंगेश्वर
काटु कैसे इस मधुबिना गोशालामें
मगर महँगी है हर चीज भी
सस्ता है  इन्सान
अंगारे बन जाते है आंसू
हर तरफ से है शांत रहके
लोग कहते है मधेपुरा निवासी ii

Sunday, July 17, 2016

मेरे चैन ॥

मेरे चैन ॥
(ग़ज़ल - जी आर कवियुर  18 .07 .2016 )

तू तटपाये मेरे मन को
चुराई तूने मेरे चैन ॥

चाहत इतना  क्यों करे तेरे नेन
चांदनी भी शरमाई

चंचल चकोरी भी चहके
चन्दन महके तेरी बोली

तू तटपाये मेरे मन को
चुराई तूने मेरे चैन  ॥

आँचल तेरे क्यौं इतने गीले
आखे भी इतने लाल

सावन की इस बरखा में
आई नहीं क्या  तेरे दिलबर

तू तटपाये मेरे मन को
चुराई तूने मेरे चैन  ॥

आखिर तुनही जाने
तू और वो नहीं दूजा

कही भी रहे वो तुम से दूर भी
हे तोहरे दिल में रहे अनमोल

तू तटपाये मेरे मन को
चुराई तूने मेरे चैन  ॥



Tuesday, September 16, 2014

मैं कौन -


मैं कौन - (कविता ) जी आर कवियूर


मैं कौन हूं

ढूँढता हुँ इस

गली चौबारों में

पहाड़ों से पूछा

नदी नालावोंसे भी पूछा

गीत गाते झरनों से पूछा

सागर की लहरोंसे

आकाश की नीलिमा से

उडते पंछियों से भी पूछा

पेडों से टकराती हवावों से

वार्तालाप से भी लाभ नहीं मिला

दौड़ते दौड़ते थक कर

आँखो बंद बैठे तो

रोश्नी बोली कि मैं हूं

तुम्हारे अन्दर की चेतना ,

सारे संसार मेँ ही हूं

तुम्हारे अलौकिक आनन्द मैं ही हूं

राष्ट्र भाषा दिवस

राष्ट्र भाषा दिवस  - जी आर  कवियूर


३६५ दिनों में एक दिन है

राष्ट्र भाषा दिवस है आज


मन की गहराई यो में छिपी बातो को

वाणी में बदलती है मेरी देशकी

भाषा हिंदी है अनमोल

देवा नागरी से अलंकृत है यह 

२८० लाखो  के लबो में खिलती है कमल कीतरह

क्या सरल और हृदयहारी है इसकी बोली 

३६५ दिनों में एक दिन है

राष्ट्र भाषा दिवस है आज

वाल्मीकि  व्यास लल्लेशवरी  इसे सिने से लगाई

उसे गाकर सुनाये भक्ति भावसे

तुलसी, भरतहरी ,कबीर और  मीराभाई


३६५ दिनों में एक दिन है

राष्ट्रभाषा दिवस है आज


कल्पनिकता की   छत्र शाया में सभाले पंक्तियो से

आमिर  खुशरू रामधारी सिंह दिनकर ,नेपाली ,नीरज

 हरी राई  बचचन ,देश भक्ति केसाथ गाये इकबाल

और अनगिनत सागर की लहर की तरह ,है मेरी अपनी भाषा हिंदी

आवो हम सब मिल कर  इसकी थश
  
हिमालयकी चोटी से भी ऊचा  उठाये


३६५ दिनों में एक दिन है

राष्ट्र भाषा दिवस है आज  

Sunday, January 5, 2014

है अल्ला , है राम , है मसीहा - जी आर कवियुर

है अल्ला , है राम , है मसीहा  - जी आर कवियुर

सब जनो से बिन्ती है कि
मानवता के साथ और समभावना कि
रहन सहन से ही इस दुनियाँ कि
भलाई हो सक्ति है कि
यही रहे हमारी मद  और धर्म
यही सिखा गये मोहमद , ईसा और राम या कृष्ण
मगर देखियें इनके तोर तरी के और रंग संग ii

जेहाद के नाम से बजते है छल्ला
जुबान में अल्ला और
जेहन  में बल्ला
क्या करेगा बिसमिल्लाह
कितना भी उगते है गल्ला
खाते बस भेड़ का पिल्ला
रहमत नहीं माशा अल्ला ii

लेकर हरी का नाम
करते है कला काम
सोते रहते है बिना काम
चाहते दुसरो से बिना दाम
और बोलते है हो गये बदनाम
खाते है जुठे कस्मे लेकर माँ का नाम
हाय यह जन्तु  कहते है
इनको हिन्दू
है राम यह है इनके तन्तु ii

जप्ते रहते है अपनेको पापी
बनाने चाहते है लोगो को भी काफी
इनके चेहरे रहते है नक़ाबि
ईसा के रूप गले में डाले बनते है अनामी
इन को कहते है कामी
है मसीहा तुमे यह बनावेगै बेनामी

सब जनोसे बिन्ती है मेरी
मानवता के नाम पर न तेरी , न मेरी रहे ii