Wednesday, October 14, 2026

ख़ामोशियों के दरमियाँ(पारंपरिक हिंदुस्तानी ग़ज़ल)

ख़ामोशियों के दरमियाँ
(पारंपरिक हिंदुस्तानी ग़ज़ल)
कभी ख़ामोश रहकर भी बहुत कुछ कह गए हम,
दिल में छुपे हुए दर्द को सह गए हम।

जिन्हें अपना समझकर दिल में जगह दी थी,
उनकी ख़ातिर हर सितम चुपचाप सह गए हम।

वफ़ा की राह में अपना सब कुछ लुटाकर,
आँखों में अश्क लेकर भी बह गए हम।

वो समझ न सके दिल की सच्ची कहानी,
अपने ही दर्द को ख़ामोशी से कह गए हम।

जिनकी ख़ुशी के लिए हर दर्द सहते रहे,
उनकी बेरुख़ी के साए में रह गए हम।

उम्मीद थी कि वो एक दिन समझेंगे हमें,
उम्मीद के सहारे ही उम्र भर रह गए हम।

जी. आर. के दिल की कहानी कौन समझे,
ग़ज़लों में अपने दर्द को कह गए हम।

 ज़ी आर कवियुर 
13 10 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी याद दिलाती हैं(हिंदुस्तानी ग़ज़ल)

तेरी याद दिलाती हैं
(हिंदुस्तानी ग़ज़ल) 
शहर की गलियाँ तेरी याद दिलाती हैं,
दिल की तन्हाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

तेरे क़दमों के निशाँ ढूँढ़ता हूँ आज भी,
सूनी राहों की परछाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

चाँद को देखूँ तो तेरा चेहरा याद आए,
रात की गहराइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

फूल खिलते हैं तो महक उठता है दिल मेरा,
मौसम की अंगड़ाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

हँसता रहता हूँ मगर दिल उदास रहता है,
बीते लम्हों की रुसवाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

जी. आर. के अशआर में छुपा है दर्द तेरा,
मेरी ग़ज़ल की तन्हाइयाँ तेरी याद दिलाती हैं।

रचना
जी. आर. कावियूर
12 10 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

Thursday, October 8, 2026

कौन जानता है (ग़ज़ल)

कौन जानता है (ग़ज़ल)
टूटे दिलों की अंजुमन का हाल कौन जानता है,
चारों तरफ़ बिखरी तन्हाई का सवाल कौन जानता है।

आँखों में ठहरा हुआ दर्द दिखता तो है सभी को,
मन के भीतर छिपा कोई ख़याल कौन जानता है।

हँसते हुए चेहरों को सुखी मान लेते हैं सब ही,
किसके हृदय में कितना मलाल कौन जानता है।

कुछ लोग समय के साथ बदल जाते हैं चुपचाप,
रिश्तों में आएगा कब ज़वाल कौन जानता है।

जिसे अपना समझकर मन ने जीवन भर चाहा था,
वही बन जाएगा एक दिन सवाल कौन जानता है।

कितनी रातें जागकर गुज़रीं उसकी यादों में,
आँखों से पूछेगा कौन यह हाल कौन जानता है।

‘जी आर’ की ख़ामोशी का कोई हाल कौन जानता है,
दिल में छिपा बैठा उसका सवाल कौन जानता है।


जी आर कवियुर 
07 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

Tuesday, October 6, 2026

अभी लिखा जाना बाकी है

अभी लिखा जाना बाकी है

बीते पन्नों को फाड़कर मत फेंको,
उनमें गुज़री राहों के निशान हैं;
मिटे हुए अक्षरों के बीच भी
जीवन ने कुछ अर्थ छिपाए हैं।

जो तुम्हारी कहानी को खत्म समझते हैं,
उन्हें क्या पता—कहानी अभी जारी है;
बंद दरवाज़ों के उस पार भी
अनखुले आकाश तुम्हें बुलाते हैं।

कल ने जहाँ सीमाएँ खींची थीं,
कल के बाद नई राह निकल सकती है;
जिस पल को अंत समझकर रुक जाओ,
वहीं से शुरुआत जन्म ले सकती है।

इसलिए अपनी कलम मत छोड़ना—
अंतिम पंक्ति अभी लिखी नहीं गई;
जीवन नाम की इस किताब का अगला पन्ना
तुम्हारे हाथ में है—इसे तुम ही लिखोगे।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

कल की दस्तख़त

कल की दस्तख़त

बीते कल के घावों को गिनते हुए नहीं,
आज की दहलीज़ पार करनी है;
बीते समय की राख से ही
एक नया सपना गढ़ना है।

भविष्य कोई लिखी हुई तक़दीर नहीं,
हर कदम पर लिया गया फैसला है;
हाथ में कलम न हो फिर भी जीवन
हर पल अपनी एक पंक्ति लिखता है।

भटकी हुई राहें भी व्यर्थ नहीं थीं,
उन्होंने भी कोई दिशा दिखाई;
जिन पलों को हमने हार समझा था,
उन्होंने ही जीत की नींव बनाई।

इसलिए कल के आने का इंतज़ार मत करो,
उसकी पहली पंक्ति आज ही लिख दो;
जब समय पूछे—तुम कौन थे?
तुम्हारा जीवन ही तुम्हारी दस्तख़त हो।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

गिरने का सबक

गिरने का सबक

ऊँचाइयों की ओर बढ़ते हुए एक दिन,
एक कदम फिसला और नीचे आ गिरा;
टूटे सपने नहीं थे उस पल—
अपने बारे में कुछ भ्रम टूटे थे।

राह किनारे जब अकेला पड़ा था,
साथ चलने वाले कई लोग दूर हो गए;
उस खामोशी में, जहाँ कोई हाथ नहीं था,
अपने ही हाथों की ताकत पहचान ली।

गिरने ने दर्द दिया, मगर सिखाया—
ऊँचाई ही जीवन का पैमाना नहीं;
गिरी हुई मिट्टी में भी बीज उगते हैं,
और वहीं से जंगल जन्म लेते हैं।

अब गिरने से डरने की ज़रूरत नहीं,
जब हर टूटन एक सबक बन जाए;
जहाँ गिरा था, वह हार की निशानी नहीं—
वहीं से उठने का प्रमाण है।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

दूर एक प्रकाशस्तंभ

दूर एक प्रकाशस्तंभ

समुद्र-सी डगमगाती जीवन की राह में,
जब दिशा कहीं दिखाई नहीं देती;
लहरों के पार एक रोशनी झिलमिलाती है—
दूर एक प्रकाशस्तंभ पुकारता है।

चारों ओर अँधेरा गहराता जाए,
हवाएँ चाहे कितनी भी तेज़ चलें;
थकी हुई जीवन-नाव के भीतर
बस उम्मीद ही बुझने से इनकार करती है।

मंज़िल भले बहुत दूर दिखाई दे,
वह रोशनी फिर भी राह दिखाती है;
जिस किनारे का भरोसा भी नहीं,
दिल फिर उसी ओर चल पड़ता है।

कुछ रोशनियाँ पाने के लिए नहीं होतीं,
वे बस राह भटकने से बचाती हैं;
जीवन चाहे अँधेरे में डूबा रहे—
जहाँ उम्मीद है, वहीं सवेरा है।

जी आर कवियुर 
05 10 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)