Saturday, June 20, 2026

योग से निरोग जीवन

 योग से निरोग जीवन



जीवन का सहारा, जीवन की छाँव,
स्वास्थ्य का दीप जलाता है योग।
नियमित अभ्यास की शक्ति से,
हर दिन नव उत्साह जगाता है योग।

ऋषियों ने जो पावन पथ दिखलाया,
उसका सुंदर संदेश है योग।
संयम, शांति और श्रेष्ठ विचारों का,
मन में मधुर संचार है योग।

हर प्रभात इसे अपनाइए,
रोग और दुःख दूर भगाइए।
स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति हेतु,
जीवन का अनुपम वरदान है योग।

नई किरणें जीवन में भरकर,
आशा के फूल खिलाता है योग।
तन और मन दोनों के लिए,
सुख-समृद्धि का मधुर राग है योग।

जी आर कवियुर
21-06-2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

अनिद्र स्वप्न

अनिद्र स्वप्न

रात में पलकों ने विश्राम न पाया,
मन में अनेक चित्र उभरते रहे,
अभिलाषाओं ने रंगों को सजाया,
आने वाले कल की राहें दिखीं।

चाँदनी ने पथों पर उजास बिखेरा,
विचार दूर क्षितिजों तक पहुँच गए,
कल्पनाओं ने अपने पंख फैलाए,
लक्ष्य दीपक बनकर आगे चमका।

नई भोर की प्रतीक्षा बनी रही,
जागृति ने नए मार्ग खोज लिए,
संकल्प ने भीतर शक्ति संजोई,
जीवन ने उपलब्धियाँ लिख डालीं।

जी आर कवियुर 
21 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

उस पार का प्रकाश

उस पार का प्रकाश

दूर किनारे पर एक उजाला चमका,
लहरें अपना संदेश तट तक लाई,
इच्छा नाव बनकर आगे बढ़ी,
साहस ने हर कदम का मार्ग दिखाया।

विशाल विस्तार नदी-सा फैला,
चप्पुओं में उम्मीद की गति जागी,
अनदेखे दृश्य पास चले आए,
हृदय में विस्मय के पुष्प खिले।

उस आभा में नया युग दिखाई दिया,
कल्पना ऊँचाइयों की ओर बढ़ी,
सफलता मुस्कान लेकर आई,
जीवन सुंदरता के साथ चलता रहा।


जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

ओस की बूंद की यात्रा

ओस की बूंद की यात्रा

भोर में पत्ते पर मोती बनकर जन्मी,
शीतलता की गोद में चुपचाप ठहरी,
किरणों ने छूकर चमक भर दी,
प्रकृति ने स्नेह से उसे अपनाया।

पंखुड़ी के किनारे धीरे-धीरे चली,
सुगंध भरे मार्गों का अनुसरण किया,
मंद समीर के संग दूरियाँ देखीं,
अनुभवों को अपने भीतर संजोया।

सूरज की ऊष्मा में विलीन हो गई,
असीम गगन की ओर ऊपर उठी,
बदलते रूपों में सत्य को पहचाना,
उसकी कथा नए सफर में आगे बढ़ी।

जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

खिड़की के उस पार

खिड़की के उस पार

प्रभात मधुर मुस्कान सजाकर खड़ा है,
पक्षियों का समूह सुरीले स्वर बिखेरता है,
घास पर ओस मोतियों-सी चमकती है,
मन को सुंदर दृश्य सहला जाते हैं।

दूर कहीं एक पगडंडी मुड़ती जाती है,
यात्राएँ नई कथाएँ बुनती रहती हैं,
समीर सुगंध लेकर पास चली आती है,
आशाएँ अंतर में चुपचाप खिलती हैं।

नीले गगन में मेघ रथ तैरते हैं,
विचार पंख फैलाकर उड़ने लगते हैं,
अनुभूतियाँ नए रंगों से सजती हैं,
सृष्टि अद्भुत रूप धारण कर लेती है।

जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Wednesday, June 17, 2026

कौन कहता है मैं ?!!

 कौन कहता है मैं ?!!



नमस्कार मित्रों, मैं हूं जी आर कवियूर। लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, "क्या सचमुच आप कवि हैं?"

तब मैं हंसकर कह देता हूं—

कौन कहता है मैं कभी कवि हूं, हां, मैं कपी जरूर हूं आज भी। चंचल होकर कूदता रहता, कभी-कभार कुछ लिखता भी।

मन में जो भी खुराफात आई, शब्दों में उसे ढाल दिया। हां, मैं रहने वाला कपीयूर का, कहते-कहते कवियूर हुआ।

डाल-डाल पर मन उड़ जाता, सपनों का संसार सजाता। हंसी, शरारत, यादों के मोती, कागज़ पर चुपचाप बिखराता।

न नियमों में खुद को बांधा, न राहों का हिसाब रखा। दिल ने जो भी बात सुनाई, उसका सीधा जवाब लिखा।

कभी धूप का गीत सुनाया, कभी सावन की बात कही। जीवन की छोटी घटनाओं में, अपनी एक दुनिया गढ़ी।

कपी हूं तो चंचलता मेरी, कवि हूं तो संवेदना भी। दोनों मिलकर साथ निभाते, यही पहचान है अब मेरी।

यदि मेरी बातों में आपको अपना अक्स दिख जाए, तो समझ लीजिएगा— मेरी खुराफात सफल हो जाए।

जी आर कवियुर 
15 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

इकसठ का सफ़र (ग़ज़ल)

 

इकसठ का सफ़र (ग़ज़ल)




मैं आज इकसठ का हूँ मगर दिल से जवान हूँ,
ज़िंदगी के नशे में अब तलक डूबा हुआ हूँ।

सच को लेकर इस जहाँ में कब किसी से क्या कहा हूँ,
अपने ही एहसास की दुनिया में अक्सर रह गया हूँ।

मन में जो आया उसे काग़ज़ पे लिखना चाहता था,
जाने कितनी बार ख़ुद को रोक कर फिर रह गया हूँ।

अंगूठे की कैद में दिन-रात यूँ उलझा रहा मैं,
मोबाइल के जाल में अनजाने ही फँस गया हूँ।

चाँद खिड़की पर खड़ा था, चाँदनी आवाज़ देती,
स्क्रीन की चमक में लेकिन उससे भी कट गया हूँ।

दोस्त मिलते हैं मुझे अब सिर्फ़ तस्वीरों के भीतर,
भीड़ में रहकर भी देखो किस क़दर तनहा हुआ हूँ।

अपनों के उजले कल की ख़ातिर दूरियों को चुन लिया,
आज उनको कामयाब देख कर खुश हो रहा हूँ।

मैं 'जी आर' कहता हूँ, सुन लो मेरी पहचान भी,
उम्र के इस मोड़ पर भी ख़्वाब में जीता हुआ हूँ।

जी आर कवियूर
16 06 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)