Friday, August 21, 2026

बूँद में बसा आकाश

बूँद में बसा आकाश

जब एक बारिश की बूँद
पत्ती की नोक पर काँप रही थी,
उसके पारदर्शी हृदय में
एक नीला आकाश झिलमिला रहा था।

बादलों के गुज़र जाने के रास्ते,
उड़ चुके पंछियों की परछाइयाँ,
और दूर कहीं सूरज की मुस्कान—
सब कुछ उस छोटी-सी बूँद में समाया था।

उसे छोटा समझकर
किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया;
लेकिन उसके भीतर छिपी थी
एक पूरी दुनिया।

जब वह धरती पर गिरी,
तो स्वयं को खोया नहीं—
वह एक बीज का सपना बन गई,
और नई हरियाली को जीवन दे गई।

बूँद ने कहा—
“मेरे छोटे होने के कारण
मेरे आकाश को छोटा मत समझना;
एक बूँद के भीतर भी
पूरा ब्रह्मांड छिपा हो सकता है।”

और इस तरह एक बारिश की बूँद में
आकाश ने स्वयं धरती को छू लिया—
चुपचाप यह समझाते हुए कि
छोटी-सी चीज़ के भीतर भी
एक विशाल संसार जीवित हो सकता है। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

क्षितिज का निमंत्रण

क्षितिज का निमंत्रण

कहीं दूर उस मायावी छोर पर,
जहाँ आकाश और सागर एक हो जाते हैं,
संध्या के सुनहरे रंगों में सजा
क्षितिज मुझे पुकार रहा है।

दूरियों के पार उड़ने को आतुर
इस मन से वह धीरे से कहता है—
“आओ…”
और लहरें राह दिखाने लगती हैं।

डूबते सूरज की लालिमा में
जब एक नया सपना खिलता है,
हृदय बीते कल की राहों को पीछे छोड़कर
आने वाले कल की तलाश में चल पड़ता है।

क्षितिज ने कहा—
“मुझे छूने के लिए तुम्हें मेरे पास आने की आवश्यकता नहीं,
मेरी ओर बढ़ते हुए
बस अपने भीतर की सीमाओं को पार कर लेना।”

और यूँ दूर की एक रोशनी बनकर
क्षितिज सदा पुकारता रहता है—
यह याद दिलाते हुए कि
जहाँ सब कुछ समाप्त होता दिखाई देता है,
वहीं से एक नई यात्रा शुरू होती है। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

पहाड़ की साँस

पहाड़ की साँस

बादलों के स्पर्श से जागती पर्वत-ढलानों पर,
जब धुंध की उँगलियाँ धरती को धीरे से सहलाती हैं,
हवा की लय पर पत्ते गाते हैं—
जैसे पहाड़ के भीतर कोई साँस चलती हो।

चट्टानों के मौन हृदय में
छोटी-छोटी धाराएँ जन्म लेती हैं;
घाटियों की ओर बहती हर बूँद में
पहाड़ अपना जीवन बाँटता है।

जहाँ पेड़ काट दिए गए हैं,
वहाँ अब केवल खामोशी उगती है;
जड़ों को खोजती मिट्टी की आँखों में
एक पुराना दर्द उभर आता है।

पहाड़ ने कहा—
“याद रखना, मेरी साँस केवल हवा में नहीं,
तुम्हारी साँसों में भी बसी है;
अगर तुम मेरी रक्षा करोगे,
तो धरती कल भी साँस ले पाएगी।”

इसलिए पहाड़ के सीने पर
आओ, एक पेड़ लगाएँ—
और जब वह बढ़े,
तो हमारे भीतर भी
एक हरी साँस जन्म ले। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

खाली घोंसला

खाली घोंसला

पुरानी पेड़ की डाल पर
बस एक घोंसला झूल रहा था,
जो सुबहें कभी गीतों से गूंजती थीं,
अब केवल हवा में सुनाई देती थीं।

कभी पंखों की फड़फड़ाहट से भरा
वह छोटा-सा आशियाना,
आज खामोश था,
फिर भी वहाँ यादें कभी सोई नहीं थीं।

जहाँ से बच्चे उड़ चले थे,
उस राह में आकाश बहुत विशाल था,
माँ-पक्षी की प्रतीक्षा में
बस प्रेम ही था, जो कभी छोटा नहीं हुआ।

वह खाली घोंसला कह रहा था—
बिछड़ना शून्यता नहीं है;
यह वही प्रेम है, जिसने उड़ना सिखाया,
और अंततः वही प्रेम
सबसे बड़ा घोंसला बन जाता है।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

घास की मुस्कान

घास की मुस्कान

भोर की ओस की बूँदों में
घास की नोकें मुस्कुराईं।
जब कोई देख भी नहीं रहा था,
धरती ने हरियाली ओढ़ ली।

हवा ने आकर जब छुआ,
वे धीरे से झुक गईं।
पैरों के स्पर्श से गुज़रने पर भी
उन्होंने कोई शिकायत नहीं की।

जब धूप की तपिश उतरी,
वे बिना छाँव के भी खड़ी रहीं।
बारिश की एक बूँद मिली तो
फिर से ताज़गी में जाग उठीं।

तभी समझ आया—
सुंदर जीवन के लिए बड़ा होना ज़रूरी नहीं;
छोटा होकर बढ़ना भी पर्याप्त है,
यदि हृदय मुस्कुराना जानता हो।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Wednesday, August 19, 2026

दिल का दर्द छुपाएँ कैसे | ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെBilingual Hindustani–Malayalam Ghazal

दिल का दर्द छुपाएँ कैसे | ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെ
Bilingual Hindustani–Malayalam Ghazal
दिल का दर्द छुपाएँ कैसे,
ज़ख़्म कितना भी गहरा हो, दिखाएँ कैसे।

ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെ,
ആഴമേറിയ മുറിവുകൾ കാണിക്കാം എങ്ങനെ.

मिज़रों में जो अश्क हैं, बताएँ कैसे,
ख़ामोश इन आँखों को समझाएँ कैसे।

മിഴികളിൽ നിറയുന്ന കണ്ണുനീർ പറയാം എങ്ങനെ,
മൗനമായ കണ്ണുകളെ ആശ്വസിപ്പിക്കാം എങ്ങനെ.

तेरी यादों को दिल से मिटाएँ कैसे,
बीते लम्हों को फिर से बुलाएँ कैसे।

നിന്റെ ഓർമ്മകൾ ഹൃദയത്തിൽനിന്ന് മായിക്കാം എങ്ങനെ,
കടന്നുപോയ നിമിഷങ്ങളെ തിരികെ വിളിക്കാം എങ്ങനെ.

इस दिल की कहानी सुनाएँ कैसे,
छुपे हुए जज़्बात जताएँ कैसे।

ഈ ഹൃദയത്തിന്റെ കഥ ചൊല്ലാം എങ്ങനെ,
ഒളിപ്പിച്ച വികാരങ്ങൾ അറിയിക്കാം എങ്ങനെ.

‘जी आर’ इस दिल को तुझसे जुदा करें कैसे,
तेरे बिना ये ज़िंदगी बिताएँ कैसे।

‘ജി ആർ’ ഈ ഹൃദയത്തെ നിന്നിൽനിന്ന് അകറ്റാം എങ്ങനെ,
നീയില്ലാതെ ഈ ജീവിതം നയിക്കാം എങ്ങനെ.

GR kaviyoor 
19 08 2026
( Thiruvalla, kaviyoor)

Sunday, August 16, 2026

The Invisible Bridge

The Invisible Bridge

Between two shores
The river kept flowing,
While distances stretched between them
Like a bond that could never be touched.

Without speaking a single word,
Two eyes spoke to each other.
Along forgotten pathways,
Memories crossed to the other side.

An unseen bridge
Rose quietly between two hearts;
To cross beyond time and distance,
Faith alone was enough.

There was no longer an “here” or “there”—
The moment two hearts became one,
The bridge was nowhere to be seen,
Yet no one was far away anymore.

GR kaviyoor 
17 08 2026
(Thiruvalla, kaviyoor)