Monday, May 11, 2026

बिना राह के पदचिह्न

बिना राह के पदचिह्न

बिना किसी राह की रेत पर,  
किसी के कदमों के निशान दिखे।  
कहां से शुरू होकर कहां गए,  
यह हवा भी समझ न सकी।  

बारिश से भीगी उस मिट्टी पर,  
सिर्फ खामोशी रह गई थी।  
हर बार पीछे मुड़कर देखने पर,  
यादें फिर से जाग उठती हैं।  

ज़िंदगी की अनजानी राहों में,  
हम सब चलते ही जाते हैं।  
ये बिना राह के पदचिह्न भी,  
एक दिन कहानी बन जाते हैं।

जी आर कवियुर 
11 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

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