शांत पड़े उस जलकिनारे पर,
समय जैसे ठहर गया था।
फिर भी हवा की हल्की छुअन में,
लहरें धीरे बहती रहीं।
पेड़ों की लंबी छाया में,
यादें बहती चली गईं।
अनकहे रह गए पल,
दिल में जीवित बने रहे।
बाहर सब कुछ स्थिर था,
पर भीतर यात्रा चलती रही।
उस चलती हुई निस्तब्धता में,
जीवन ने अपनी आवाज़ पाई।
जी आर कवियुर
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)
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