हवा में छुपी सुगंध
भोर की ठंडी घड़ियों में,
हवा खामोशी से बह रही थी।
एक अनदेखी सी सुगंध,
राहों में बहती चली आई।
फूलों की कोमल छुअन में,
यादें फिर जाग उठीं।
भूले हुए वे पल,
मन में फिर खिल उठे।
एक अदृश्य सा एहसास,
दिल को छूकर गुजर गया।
हवा में छुपी उस सुगंध सा,
प्रेम चारों ओर ठहरा रहा।
जी आर कवियुर
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)
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