Saturday, June 20, 2026

योग से निरोग जीवन

 योग से निरोग जीवन



जीवन का सहारा, जीवन की छाँव,
स्वास्थ्य का दीप जलाता है योग।
नियमित अभ्यास की शक्ति से,
हर दिन नव उत्साह जगाता है योग।

ऋषियों ने जो पावन पथ दिखलाया,
उसका सुंदर संदेश है योग।
संयम, शांति और श्रेष्ठ विचारों का,
मन में मधुर संचार है योग।

हर प्रभात इसे अपनाइए,
रोग और दुःख दूर भगाइए।
स्वास्थ्य और सुख की प्राप्ति हेतु,
जीवन का अनुपम वरदान है योग।

नई किरणें जीवन में भरकर,
आशा के फूल खिलाता है योग।
तन और मन दोनों के लिए,
सुख-समृद्धि का मधुर राग है योग।

जी आर कवियुर
21-06-2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

अनिद्र स्वप्न

अनिद्र स्वप्न

रात में पलकों ने विश्राम न पाया,
मन में अनेक चित्र उभरते रहे,
अभिलाषाओं ने रंगों को सजाया,
आने वाले कल की राहें दिखीं।

चाँदनी ने पथों पर उजास बिखेरा,
विचार दूर क्षितिजों तक पहुँच गए,
कल्पनाओं ने अपने पंख फैलाए,
लक्ष्य दीपक बनकर आगे चमका।

नई भोर की प्रतीक्षा बनी रही,
जागृति ने नए मार्ग खोज लिए,
संकल्प ने भीतर शक्ति संजोई,
जीवन ने उपलब्धियाँ लिख डालीं।

जी आर कवियुर 
21 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

उस पार का प्रकाश

उस पार का प्रकाश

दूर किनारे पर एक उजाला चमका,
लहरें अपना संदेश तट तक लाई,
इच्छा नाव बनकर आगे बढ़ी,
साहस ने हर कदम का मार्ग दिखाया।

विशाल विस्तार नदी-सा फैला,
चप्पुओं में उम्मीद की गति जागी,
अनदेखे दृश्य पास चले आए,
हृदय में विस्मय के पुष्प खिले।

उस आभा में नया युग दिखाई दिया,
कल्पना ऊँचाइयों की ओर बढ़ी,
सफलता मुस्कान लेकर आई,
जीवन सुंदरता के साथ चलता रहा।


जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

ओस की बूंद की यात्रा

ओस की बूंद की यात्रा

भोर में पत्ते पर मोती बनकर जन्मी,
शीतलता की गोद में चुपचाप ठहरी,
किरणों ने छूकर चमक भर दी,
प्रकृति ने स्नेह से उसे अपनाया।

पंखुड़ी के किनारे धीरे-धीरे चली,
सुगंध भरे मार्गों का अनुसरण किया,
मंद समीर के संग दूरियाँ देखीं,
अनुभवों को अपने भीतर संजोया।

सूरज की ऊष्मा में विलीन हो गई,
असीम गगन की ओर ऊपर उठी,
बदलते रूपों में सत्य को पहचाना,
उसकी कथा नए सफर में आगे बढ़ी।

जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

खिड़की के उस पार

खिड़की के उस पार

प्रभात मधुर मुस्कान सजाकर खड़ा है,
पक्षियों का समूह सुरीले स्वर बिखेरता है,
घास पर ओस मोतियों-सी चमकती है,
मन को सुंदर दृश्य सहला जाते हैं।

दूर कहीं एक पगडंडी मुड़ती जाती है,
यात्राएँ नई कथाएँ बुनती रहती हैं,
समीर सुगंध लेकर पास चली आती है,
आशाएँ अंतर में चुपचाप खिलती हैं।

नीले गगन में मेघ रथ तैरते हैं,
विचार पंख फैलाकर उड़ने लगते हैं,
अनुभूतियाँ नए रंगों से सजती हैं,
सृष्टि अद्भुत रूप धारण कर लेती है।

जी आर कवियुर 
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Wednesday, June 17, 2026

कौन कहता है मैं ?!!

 कौन कहता है मैं ?!!



नमस्कार मित्रों, मैं हूं जी आर कवियूर। लोग अक्सर मुझसे पूछते हैं, "क्या सचमुच आप कवि हैं?"

तब मैं हंसकर कह देता हूं—

कौन कहता है मैं कभी कवि हूं, हां, मैं कपी जरूर हूं आज भी। चंचल होकर कूदता रहता, कभी-कभार कुछ लिखता भी।

मन में जो भी खुराफात आई, शब्दों में उसे ढाल दिया। हां, मैं रहने वाला कपीयूर का, कहते-कहते कवियूर हुआ।

डाल-डाल पर मन उड़ जाता, सपनों का संसार सजाता। हंसी, शरारत, यादों के मोती, कागज़ पर चुपचाप बिखराता।

न नियमों में खुद को बांधा, न राहों का हिसाब रखा। दिल ने जो भी बात सुनाई, उसका सीधा जवाब लिखा।

कभी धूप का गीत सुनाया, कभी सावन की बात कही। जीवन की छोटी घटनाओं में, अपनी एक दुनिया गढ़ी।

कपी हूं तो चंचलता मेरी, कवि हूं तो संवेदना भी। दोनों मिलकर साथ निभाते, यही पहचान है अब मेरी।

यदि मेरी बातों में आपको अपना अक्स दिख जाए, तो समझ लीजिएगा— मेरी खुराफात सफल हो जाए।

जी आर कवियुर 
15 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

इकसठ का सफ़र (ग़ज़ल)

 

इकसठ का सफ़र (ग़ज़ल)




मैं आज इकसठ का हूँ मगर दिल से जवान हूँ,
ज़िंदगी के नशे में अब तलक डूबा हुआ हूँ।

सच को लेकर इस जहाँ में कब किसी से क्या कहा हूँ,
अपने ही एहसास की दुनिया में अक्सर रह गया हूँ।

मन में जो आया उसे काग़ज़ पे लिखना चाहता था,
जाने कितनी बार ख़ुद को रोक कर फिर रह गया हूँ।

अंगूठे की कैद में दिन-रात यूँ उलझा रहा मैं,
मोबाइल के जाल में अनजाने ही फँस गया हूँ।

चाँद खिड़की पर खड़ा था, चाँदनी आवाज़ देती,
स्क्रीन की चमक में लेकिन उससे भी कट गया हूँ।

दोस्त मिलते हैं मुझे अब सिर्फ़ तस्वीरों के भीतर,
भीड़ में रहकर भी देखो किस क़दर तनहा हुआ हूँ।

अपनों के उजले कल की ख़ातिर दूरियों को चुन लिया,
आज उनको कामयाब देख कर खुश हो रहा हूँ।

मैं 'जी आर' कहता हूँ, सुन लो मेरी पहचान भी,
उम्र के इस मोड़ पर भी ख़्वाब में जीता हुआ हूँ।

जी आर कवियूर
16 06 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

सच्ची मित्रता: सबसे सुरक्षित निवेश (बाजार जोखिम से परे)

 सच्ची मित्रता: सबसे सुरक्षित निवेश  
(बाजार जोखिम से परे)

ऐसे संबंध खोजो जो समय के साथ रहें,  
जहाँ अपनापन हर पल सदा बहें,  
साझी मुस्कान दिन को रोशन बनाए,  
सहारा बनकर जीवन को संभाले।  

विश्वास की डोर दूरी मिटा देती है,  
मीठे शब्दों से पीड़ा घटा देती है,  
निष्ठावान मित्र बोझ हल्का करते हैं,  
शांत उपस्थिति घाव भर देती है।  

सच्चा साथ हर वर्ष को समृद्ध बनाए,  
निर्मल रिश्ते भय और चिंता भगाए,  
ऐसी मित्रता ही असली कमाई है,  
जो हर परिस्थिति में साथ निभाई है।  

जी आर कवियुर 
16 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Sunday, June 14, 2026

तुम अभी भी युवा हो

तुम अभी भी युवा हो

उम्र सिर्फ एक संख्या है  
सपने मन को जगाते रहते हैं  
हर सुबह नए रास्ते खोलती है  
और आगे बढ़ने की ताकत देती है  

भविष्य के दरवाज़े कभी बंद नहीं होते  
आशा चुपचाप साथ चलती है  
लक्ष्य आगे बढ़ने की हिम्मत देते हैं  
और संदेह धीरे-धीरे मिट जाते हैं  

अपनी सोच को साफ और मजबूत रखो  
दिल में हिम्मत बनाए रखो  
हर पल जीवन फिर से शुरू होता है  
जब तुम नया आरंभ चुनते हो

जी आर कवियुर 
14 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)



तेरे बिना(ग़ज़ल)


तेरे बिना
(ग़ज़ल)

कैसे इंकार करूँ इन बीती यादों को,
दिल ने सँभाल रखा है सारी यादों को।

बरसात की हर बूँद तेरा ज़िक्र छेड़ती है,
मैं सुनता रह जाता हूँ तेरी बातों को।

तन्हाई की चादर में जब रात सिमटती है,
आँखें ढूँढ़ा करती हैं गुज़री रातों को।

भीगा हुआ मौसम भी तेरा नाम लेता है,
दिल याद किया करता है उन बरसातों को।

वक़्त की धूल ने ढक डाले कितने चेहरे,
दिल गिनता ही रहता है उन मुलाक़ातों को।

तेरी महक अब भी साँसों में बसी है ऐसे,
जैसे कोई सँजोए रखे अपने जज़्बातों को।

दुनिया ने बदल डाले कितने रंग मगर,
हम भूल न पाए अपने ही हालातों को।

मैं 'जी आर' अब भी भूल न पाया उसे,
दिल से न मिटा पाया बीती यादों को।


जी आर कवियुर 
12 06 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

ईर्ष्या की आग — അസൂയയുടെ തീ(द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ)

ईर्ष्या की आग — അസൂയയുടെ തീ
(द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ)

जलन की आग में इंसान खुद ही जल जाता है,
दूसरों को हराने चला, अपना घर भी जल जाता है।

അസൂയയുടെ തീയിൽ മനുഷ്യൻ താനേ കത്തിപ്പോകുന്നു,
മറ്റൊരാളെ തോൽപ്പിക്കുവാൻ സ്വന്തം വീടും കത്തിപ്പോകുന്നു।

किसी के फूल खिलें तो उसे तकलीफ़ होती है,
वो काँटे बो के भी खुशियों का सपना सजाता है।

മറ്റൊരാളിൽ പൂക്കൾ വിരിയുമ്പോൾ മനസ്സ് വേദനിക്കും,
മുള്ളുകൾ വിതച്ചിട്ടും സന്തോഷത്തിൻ സ്വപ്നം കാണുന്നു।

उसे आईना दिखाओ तो नज़रें फेर लेता है,
हर इक कमी को अपनी वो पर्दों में छुपाता है।

കണ്ണാടി കാട്ടിയാലും മുഖം തിരിച്ചു നടക്കുന്നു,
സ്വന്തം കുറവുകൾ എല്ലാം മറവിയിൽ ഒളിപ്പിക്കുന്നു।

परिंदे उड़ रहे हों तो उसे चैन कहाँ मिलता,
वो आसमान को भी अपनी हदों में बाँधता है।

പറവകൾ പറന്നുയർന്നാൽ അവന് ശാന്തി ലഭിക്കില്ല,
ആകാശത്തെയും തൻ വേലിക്കുള്ളിൽ പൂട്ടാൻ നോക്കുന്നു।

जो दिल से साफ़ होते हैं वो सबका मान करते हैं,
मगर तंग दिल हमेशा फ़ासलों को बढ़ाता है।

വിശാല ഹൃദയമുള്ളവർ എല്ലാരെയും ചേർത്തിടും,
ഇടുങ്ങിയ മനസ്സ് മാത്രം അകലങ്ങൾ വർധിപ്പിക്കുന്നു।

न सूरज रुक सका है, न नदी ठहर सकी है,
जहाँ सृजन है सच्चा, वहीं उजाला आता है।

സൂര്യനും നിൽക്കുകയില്ല, നദിയും നിന്നുപോകില്ല,
സത്യമായ സൃഷ്ടിയുള്ളിടത്ത് പ്രകാശം ജനിക്കുന്നു।

मैं 'जी आर' कहता हूँ, ये दुनिया जलन से कब तलक जी पाएगी,
मोहब्बत का दिया ही आख़िर हर अँधेरा हराता है।

ഞാൻ എന്ന 'ജി ആർ' പറയുന്നു, അസൂയയുടെ വഴി ലോകം എത്ര ദൂരം പോകും,
സ്നേഹത്തിൻ ദീപമത്രേ ഒടുവിൽ എല്ലാ ഇരുളും അകറ്റുന്നത്।

ജി ആർ കവിയൂർ
(GR Kaviyoor)
12 06 2026
( Kaviyoor, thiruvalla)

मन जो रूठा (गीत)

मन जो रूठा (गीत)

गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम,
मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम।
अपने जैसा तुझे गर बना ना सके,
खुद को ही तेरे जैसा बना लेंगे हम...

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

दिल जैसा भी हो, करीब पाएंगे हम,
शिकवे भुला कर, गले से लगाएंगे हम।
हो बैर दुनिया से तो परवाह नहीं,
तेरी खातिर तो दुश्मनी भी भूल जाएंगे हम।

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

फासलों के दाग जितने भी हों दरमियां,
मोहब्बत की बारिश से मिटाएंगे हम।
तेरे दीदार की हसरत कुछ ऐसी जगी,
कि दुनिया के आगे बेनकाब हो चुके हैं हम।

गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम...

जी आर कवियुर 
11 06 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

कृत्रिमता और पाखंड | കൃത്രിമത്വവും കപടതയും (Ghazal) | GR kaviyoor

कृत्रिमता और पाखंड | കൃത്രിമത്വവും കപടതയും (Ghazal) | GR kaviyoor 



ज़ुबां पे अमन है, पर दिल में नफ़रत का साया है,
कौवे ने मोर के पंखों का रूप सजाया है।

വാക്കിൽ മതേതരത്വം, ഉള്ളിൽ കറുപ്പിൻ്റെ വേഷമാണ്,
പീലി ചൂടും കാക്ക തൻ കപട വിലാസമാണ്.

दौलत बहा कर उसने ये मसीहा का नाम कमाया है,
सच को छुपाने के लिए भेड़ की खाल में भेड़िया आया है।

പണം വാരിയെറിഞ്ഞു ചുളുവിൽ വാങ്ങിയ പൊങ്ങച്ച നാട്യമാണ്,
സത്യം മറയ്ക്കാൻ തീർത്തൊരു ആട്ടിൻതോലണിഞ്ഞ ചെന്നായുടെ കപടമാണ്.

महफ़िल सजाता है वो हरसू अमन की बातें कर,
अंदर मगर उस शख़्स ने मज़हब को छुपाया है।

വേദികൾ തീർത്തു മതേതരത്വം പ്രസംഗിക്കും നേരം,
ഉള്ളിൽ മതത്തിൻ്റെ കറുത്ത വംശീയ രൂപമാണ്.

महफ़िल में जो मारता है पत्थर पीठ पीछे सदा,
ख़त में उसी ने भाई कह के गले लगाया है।

കൂട്ടത്തിൽ വന്ന് ഒളിയമ്പെയ്തു ചിരിക്കും മനുഷ്യൻ,
നേരിൽ വന്ന് പുകഴ്ത്തിപ്പാടും കപട ഭാവമാണ്.

मेरी कला को वो कागज़ का फूल कहता है मगर,
उसने तो ख़ुद को ही एक बुत बनाया है।

കൃത്രിമമെന്നു പറഞ്ഞ് എൻ കലയെ അളക്കാൻ വരും,
നിർജ്ജീവമായൊരു കല്ലിൻ്റെ ഉള്ളുള്ള കോലമാണ്.

दूसरों से नफ़रत कर के वो समझता है जीत अपनी,
पर नफ़रत की आग में उसने अपना ही घर जलाया है।

മറ്റുള്ളവരെ വെറുത്തു താൻ ജയിച്ചു എന്നു കരുതും,
ഉള്ളിലെ തീയറിയാതെ വെന്തുരുകും സ്വന്തം ജന്മമാണ്.

ज़िंदा दिल हैं जो, वो तो जेल को भी चमन कर दें,
काले दिलों ने तो जन्नत को भी दोज़ख़ बनाया है।

നരകത്തെയും സ്വർഗ്ഗമാക്കും ശുദ്ധമാം ഹൃദയങ്ങൾ,
ഇടുങ്ങിയ ചിന്തയാൽ സ്വർഗ്ഗവും നരകമാക്കും കോലമാണ്.

हाथी चलेगा अपनी ही धुन में सदा ऐ 'जी आर',
कुत्तों के भौंकने से किसने अपना सुकूँ गँवाया है।

പട്ടി കുരച്ചാലും ആന തൻ പാതയിൽ നീങ്ങിടും 'ജി ആർ',
നിൻ വരികളിൽ എന്നും ഉണരുന്നത് ആത്മാവിൻ്റെ പ്രകാശമാണ്.
GR kaviyoor 
11 06 2026

रहे राह पर,

रहे राह पर,

नयना बिछाए रहे राह पर,
तेरे आने की आस रही आह पर।

ठहरी हुई थी मेरी निगाह पर,
तेरी यादों की छाँव रही पनाह पर।

दिल ने सजाए ख़्वाब हर चाह पर,
अश्कों की मुहर लग गई गवाह पर।

मौसम ने लिख दी दास्ताँ चाह पर,
फूलों की हँसी मिट गई तबाह पर।

रातें गुज़र गईं तेरी निगाह पर,
साँसें ठहरी रहीं एक आह पर।

दुनिया ने लाख प्रश्न किए राह पर,
हम चलते ही रहे अपनी चाह पर।

तन्हाइयों का राज रहा आह पर,
यादों का कारवाँ चला राह पर।

मिलने की एक लौ जली चाह पर,
दिल की नज़र टिकी रही राह पर।

मैं "जी आर" लिखता रहा दिल की चाह पर,
एक उम्र कट गई तेरी ही राह पर।


जी आर कवियुर 
11 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

श्वास बनता जीवन

श्वास बनता जीवन

भोर की पहली साँस के साथ,
जीवन फिर से जाग उठा।
हर पल की लय में,
समय ने अपना संगीत बिखेरा।

हँसी और पीड़ा दोनों में,
अर्थ खिलते चले गए।
यात्रा के हर कदम पर,
अनुभव फूलों से खिल उठे।

अनजाने बीत गए दिन,
हृदय में प्रकाश बन गए।
श्वास बनता यह जीवन,
आशा बनकर चलता रहा।

GR kaviyoor 
10 06 2026

अदृश्य सत्य

अदृश्य सत्य

अनदेखी राहों के बीच,
सत्य कहीं छिपा हुआ था।
जो शब्द कभी कह न सके,
उसे खामोशी ने प्रकट किया।

छायाओं से भरे क्षणों में,
प्रकाश ने अपना अर्थ पाया।
ओट की पतली परत के पीछे,
जीवन ने अपना चेहरा दिखाया।

बिना खोजे मिले उत्तर,
मन में उजाला बन गए।
उस अदृश्य सत्य के साथ,
ज्ञान भी बढ़ता गया।

Gr kaviyoor 
10 06 2026

स्थिर लहर

स्थिर लहर

समुद्र तट की खामोशी में,
एक लहर स्थिर हो गई।
आगे बढ़ने की चाह होते हुए भी,
वह एक पल को ठहर गई।

आकाश की नीली आँखों में,
संध्या के रंग झिलमिला उठे।
लहरों का छिपा हुआ संगीत,
हृदय में गूंजता रहा।

गति के भीतर की निस्तब्धता,
जीवन का पाठ सिखा गई।
उस स्थिर लहर में,
समय स्वयं प्रतिबिंबित हुआ।


जी आर कवियुर 
10 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

सूर्य और अंधकार का संवाद

सूर्य और अंधकार का संवाद


गहरे अंधकार ने एक दिन चमकते सूर्य से पूछा
मैं तुम्हें देखूँ तो कैसे मन के इस विचार ने पूछा

उत्तर मिला कि मिटना होगा तुम्हें मेरे प्रकाश में
क्या तुम खो सकते हो खुद को इस अनोखे द्वार ने पूछा

अस्तित्व अपना खोकर ही कोई पा सकता है तुमको
दीये ने टिमटिमाते हुए रातों के संसार से पूछा

जो छुपाता है वही तो रूप देता है उजाले को
यही भेद सुबह होते ही गिरते हुए अंधकार ने पूछा

पतंगा जानता है जलकर ही उसकी पहचान बनती है
सुलगती आग से फिर क्यूँ दिल की इस पुकार ने पूछा

जिसे हम अंत कहते हैं वो बस एक नई शुरुआत है
पतझड़ के डर से खिलते हुए फूलों के हार ने पूछा

मैं ढूँढूँ कहाँ तुमको जब तुम हर कण में समाए हो
राहगीर ने समंदर के बहते हुए पानी की धार ने पूछा

जहाँ तुम हो वहाँ तो कोई और रह नहीं सकता
यह सुंदर दृश्य देखने की चाह में इस संसार ने पूछा

कह रहे 'जी आर' कविता मौन बातचीत का रूप है
जो सदियों से जीवन और मृत्यु के इस पार ने पूछा

जी आर कवियुर 
08 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽद्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ

मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽ
द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ


मौन में तेरी याद की ठहरी नमी है ग़ज़ल,
दिल से उठती दर्द की गहरी नमी है ग़ज़ल।

മൗനത്തിൽ നിൻ ഓർമ്മയുടെ തങ്ങി നനവാം ഗസൽ,
ഹൃദയത്തിൽ വേദനയുടെ ആഴ്നനവാം ഗസൽ।

आँख में ठहरा हुआ इक अश्क जब कहने लगे,
वेदना की बोलती फिर ख़ामुशी है ग़ज़ल।

കണ്ണീരായ് തങ്ങി നിൽക്കുന്നൊരു തുള്ളി സംസാരിക്കിൽ,
വേദനയുടെ മൗനഭാഷ വെളിപ്പെടുത്തും ഗസൽ।

रात की तन्हाइयों में चाँद जब सुनता मुझे,
चाँदनी के लब पे आकर जो थमी है ग़ज़ल।

രാവിൻ ഏകാന്തതയിൽ ചന്ദ്രൻ ചെവികൊടുക്കുമ്പോൾ,
നിലാവിൻ അധരങ്ങളിൽ മൗനമായി തങ്ങും ഗസൽ।

तेरी यादों की फुहारों में भीगता है दिल,
अश्क की धारा में बरसों से धुली है ग़ज़ल।

നിൻ സ്മൃതികൾ മഴയായി ഹൃദയത്തിൽ പെയ്യുമ്പോൾ,
അശ്രുനദിയിൽ കഴുകി തെളിഞ്ഞു നിൽക്കും ഗസൽ।

सूने घर के हर किसी कोने में तेरी आहटें,
इक उदासी की सदा बनकर जमी है ग़ज़ल।

ശൂന്യമായ വീടിൻ ഓരോ കോണിലും നിൻ ചുവടൊച്ച,
ഏകാന്തതയുടെ സ്വരമായി മുഴങ്ങിനിൽക്കും ഗസൽ।

खोए लम्हों की महक सी साथ चलती है सदा,
बीते सपनों की कोई प्यारी गठरी है ग़ज़ल।

മാഞ്ഞുപോയ നിമിഷങ്ങൾ സുഗന്ധമായി കൂടെവന്ന്,
സ്വപ്നങ്ങളുടെ ഭാണ്ഡമേന്തി നടന്നുപോകും ഗസൽ।

जब सफ़र में हमसफ़र कोई न मेरे साथ था,
मेरे क़दमों के निशाँ संग ही चली है ग़ज़ल।

ജീവിതയാത്രയിൽ കൂട്ടായി ആരുമില്ലാതിരുന്നപ്പോൾ,
എൻ കാൽപ്പാടുകൾക്കൊപ്പം നടന്നുപോയി ഗസൽ।

मैं 'जी आर' अपनी ख़ामोशी को जब आवाज़ दूँ,
दिल की हर धड़कन में तब से बसी है ग़ज़ल।

ഞാൻ 'ജി ആർ' എൻ മൗനത്തിന് ശബ്ദമേകിയ നാളിൽ,
എൻ ഹൃദയമിടിപ്പിനുള്ളിൽ വസിക്കുന്നിതാ ഗസൽ।

GR kaviyoor 
08 06 2026
(Kaviyoor, thiruvalla)

വിരഹത്തിൻ്റെ ഗസൽ / विरह की ग़ज़ल

വിരഹത്തിൻ്റെ ഗസൽ / विरह की ग़ज़ल

तेरे बिन कैसे ये दिन गुज़रेंगे,
तेरी यादों में तो ये साल गुज़रेंगे।

നീയില്ലാതെ എങ്ങിനെ ദിനങ്ങൾ നീങ്ങും,
നിന്നോർമ്മകളിൽ വർഷങ്ങൾ നീങ്ങും.

थमता नहीं कभी ये दिल का तालाब,
रात के इस अंधेरे के साए में गुज़रेंगे।

നിശ്ചലമാകുന്നില്ല മനസ്സെന്ന തടാകം,
നിശയുടെ നീരാളി പിടുത്തത്തിൽ നീങ്ങും.

इन बिना नींद की रातों में जो भूल नहीं पाते,
वो साए चारों ओर इस रौशनी में गुज़रेंगे।

നിദ്രയില്ലാ രാവുകളിൽ മറക്കുവാനാവാത്ത,
നിഴലുകൾ നിറയുന്നു ചുറ്റും നിലവിൽ നീങ്ങും.

धुंधली सी यादों की ये जो dunia है,
तेरे प्यार के बिना सूनी ही गुज़रेंगे।

നിറം മങ്ങിയ ചിന്തകൾ തൻ ലോകം,
നിൻ പ്രണയമില്ലാതെ ശൂന്യമായി നീങ്ങും.

हर एक सांस में जो बसी है वो चाहत,
तुझ तक पहुँचने की राह में गुज़रेंगे。

നിശ്വാസ വായുവിൽ പോലും നിറയുന്ന മോഹം,
നിന്നിലേക്കണയാൻ മാത്രമായി നീങ്ങും.

लमहे जहाँ गिर रहे हैं इस रास्ते पर,
तेरे कदमों के निशां ढूंढते हुए गुज़रेंगे।

നിമിഷങ്ങൾ കൊഴിഞ്ഞു വീഴുന്ന പാതയിൽ,
നിൻ കാൽപ്പാടുകൾ തേടി എൻ ഹൃദയം നീങ്ങും.

जिस बात को तूने नासमझ कर छोड़ दिया था,
वो रोज़ मुझे तड़पाते हुए गुज़रेंगे।

നിസ്സാരമെന്നു കരുതി നീ തള്ളിയ വാക്ക്,
നിത്യേനയെന്നെ നീറ്റിക്കൊണ്ടു നീങ്ങും.

इस खामोश विरह के उदास साहिल पर,
तेरी यादों की कश्ती चलाते हुए गुज़रेंगे।

നിശ്ശബ്ദമീ വിരഹവേദനയുടെ തീരത്ത്,
നിൻ്റെ ഓർമ്മകളുടെ തോണി തുഴഞ്ഞു നീങ്ങും.

अगर कोई और जनम हो तो हम साथ होंगे,
इसी विरह के सुकून के साथ गुज़रेंगे।

ഇനിയൊരു ജന്മമുണ്ടെങ്കിൽ നമ്മളൊന്നായ്,
ഇതേ വിരഹത്തിൻ സുഖവുമായി നീങ്ങും.

जी आर के दिल में लहरें उठती हैं सदा,
तेरी उस अमर मौजूदगी की याद में गुज़रेंगे।

ജീ ആറിൻ്റെ ഉള്ളിൽ തിരമാല തീർക്കുന്നു,
ജീവനാം നിൻ്റെ സാമീപ്യം ഓർത്തു നീങ്ങും.

GR kaviyoor 
07 06 2026
( Kaviyoor,Thiruvalla)

बहता हुआ समय

बहता हुआ समय

नदी की तरह समय बहता रहा,
पल दूर कहीं निकलते गए।
उन्हें थामे रखने की चाह में भी,
वे हाथों में ठहर न सके।

भोर और संध्या की तरह,
दिन बदलते ही चले गए।
हँसी और पीड़ा के संग,
जीवन अपनी कथा बुनता रहा।

बीत गया हर एक पल,
याद बनकर चमकता रहा।
बहते हुए समय के साथ,
मन भी परिपक्व होता गया।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

तेरी ही परछाई

तेरी ही परछाई है

तेरी यादों की छाया है, तेरी ही परछाई है,
इस सूने घर के हर कोने में गहरी तन्हाई है।

सूना आँगन, मौन किताबें, चुप पूजा की चौखट,
तेरे बिन हर शय ने जैसे ओढ़ी हुई जुदाई है।

बर्तन, चौखट, खाली बिस्तर, सब गुमसुम बैठे हैं,
इन बेजान गवाहों में भी तेरी ही सच्चाई है।

दूधवाला आवाज़ लगाता, सब्ज़ीवाला आता है,
लेकिन दरवाज़े पर अब किसकी वह सुनवाई है।

बिल्ली रोए दूध की ख़ातिर, कुत्ता भी बेचैन फिरे,
घर के हर जीव ने तेरी कमी की पीर उठाई है।

डाँट तुम्हारी, प्यार तुम्हारा, दोनों याद बहुत आते,
मीठी-सी उस झिड़की में भी कितनी बड़ी भलाई है।

दूर गगन में चाँद की सूरत जब-जब नज़र आती है,
लगता है माँ मुस्काती है, देती फिर बधाई है।

आँखें नम हो जाती हैं जब यादों का मौसम आए,
दिल ने तेरी ममता की हर दौलत आज बचाई है।

कहता है 'जी आर' कि माँ, तू कहीं गई ही नहीं,
हर ख़ामोशी में जैसे तेरी ही परछाई है।

 जी आर कवियुर 
07 06 2026

दिन का अंतिम क्षण

दिन का अंतिम क्षण

सूरज की मद्धिम होती आभा,
क्षितिज में विलीन हो गई।
दिन का अंतिम क्षण,
संध्या की गोद में उतर आया।

पेड़ों की फैली परछाइयों ने,
लंबे रास्ते खींच दिए।
पक्षियों की घर लौटती उड़ान,
आकाश पर अपनी रेखा छोड़ गई।

दिनभर की सारी व्यस्तताएँ,
खामोशी में खो गईं।
दिन के अंतिम क्षण में,
मन ने शांति पा ली।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)





पीछे मुड़कर देखती राहें

पीछे मुड़कर देखती राहें

जो राहें कभी चलकर गुज़रीं,
याद बनकर पीछे ठहर गईं।
समय के कोमल पदचिह्न,
मन में अंकित रह गए।

जब पेड़ों ने छाया फैलायी,
बीते दिन फिर जाग उठे।
भूले हुए समझे जाने वाले पल,
फिर सामने आ खड़े हुए।

पीछे मुड़कर देखती राहों में,
यात्रा का अर्थ दिखाई दिया।
बीते हुए हर एक कदम ने,
आज के मुझको गढ़ा था।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

आँखों की खामोशी

आँखों की खामोशी

नज़रों में ठहरी हुई थीं,
अनकही कहानियाँ सभी।
शब्दों की आवश्यकता न थी,
दिल सब कुछ सुन रहा था।

मुस्कान की हल्की परत में,
दर्द कहीं छिपा हुआ था।
गहरी दृष्टि की गहराई में,
यादें अब भी चमक रही थीं।

कभी-कभी एक पल ही,
दिलों को बात करने को काफी है।
आँखों की उस खामोशी में,
सच्चाइयाँ जीवित थीं।

जी आर कवियुर 
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

प्रकाश की पंक्तियाँ

प्रकाश की पंक्तियाँ

भोर की पहली किरणें,
खिड़की से भीतर उतर आईं।
अंधकार की मुड़ी परतों पर,
प्रकाश ने अपनी पंक्तियाँ लिखीं।

पेड़ों की छायाओं के बीच,
सुनहरी आभा फैल गई।
नए दिन की मधुर साँस,
धरती पर भरती चली गई।

हर उजली रेखा में,
आशा खिलती दिखाई दी।
प्रकाश की उन पंक्तियों संग,
जीवन आगे बढ़ता गया।

जी आर कवियुर 
 06 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)

तेरी तन्हाई से लगता है डर,
तेरी रुसवाई से लगता है डर।

न जाने कौन-सा मौसम बदल दे रंग अपना,
तेरी जुदाई से लगता है डर।

बहुत मासूम है ये दिल, फ़रेबों को नहीं समझे,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

कभी जो ख़्वाब आँखों में सजाकर मुस्कुराते थे,
उसी परछाई से लगता है डर।

ये दुनिया दर्द वालों की कहाँ तक साथ देती है,
किसी रुसवाई से लगता है डर।

मोहब्बत की गली में जब भी आगे बढ़ने लगता हूँ,
नई दुश्वारी से लगता है डर।

कभी जो रौशनी बनकर मेरे घर में उतरती थी,
उसी अंगड़ाई से लगता है डर।

न जाने किसलिए अब दिल ये हर आहट पे चौंके है,
तेरी शहनाई से लगता है डर।

मैं "जी आर" आज भी तेरा नाम लेकर सोचता हूँ,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

जी आर कवियुर 
 05 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Thursday, June 11, 2026

मन जो रूठा (गीत)

 मन जो रूठा (गीत)


गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम,
मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम।
अपने जैसा तुझे गर बना ना सके,
खुद को ही तेरे जैसा बना लेंगे हम...

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

दिल जैसा भी हो, करीब पाएंगे हम,
शिकवे भुला कर, गले से लगाएंगे हम।
हो बैर दुनिया से तो परवाह नहीं,
तेरी खातिर तो दुश्मनी भी भूल जाएंगे हम।

मन जो रूठा तो उसको मना लेंगे हम...

फासलों के दाग जितने भी हों दरमियां,
मोहब्बत की बारिश से मिटाएंगे हम।
तेरे दीदार की हसरत कुछ ऐसी जगी,
कि दुनिया के आगे बेनकाब हो चुके हैं हम।

गीत जैसा भी हो गुनगुना लेंगे हम...

जी आर कवियुर 
11 06 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

Wednesday, June 10, 2026

नक़ाब उठने दो - അഴിയട്ടെ മുഖംമൂടികൾ (ബഹുഭാഷാ ഗസൽ / bilungal gazhal)

 नक़ाब उठने दो - അഴിയട്ടെ മുഖംമൂടികൾ (ബഹുഭാഷാ ഗസൽ / bilungal gazhal)




मज़हब के नाम पर यहाँ नफ़रत बढ़ाते हैं,
ओढ़े हुए वो चेहरे पे शराफ़त बढ़ाते हैं।

മതത്തിന്റെ പേരിൽ ഇങ്ങവർ വിദ്വേഷം വളർത്തുന്നു,
മര്യാദതൻ മുഖമൂടിയണിഞ്ഞവർ ആ വേഷം വളർത്തുന്നു।

वो धर्म की आड़ में नफ़रत का क़ायदा बढ़ाते हैं,
इंसानियत को भूल कर, बस फ़ासला बढ़ाते हैं।

മർത്ത്യത്വം മറന്നു മനുഷ്യരിന്നീ മണ്ണിൽ അലയുമ്പോൾ,
നിയമങ്ങൾ മാറ്റി അവർ തമ്മിലകൽച്ച വളർത്തുന്നു।

कुर्सी की ख़ातिर दिलों में सियासत बढ़ाते हैं,
मोहब्बत की राह रोक कर, वो नदामत बढ़ाते हैं।

സ്നേഹത്തിൻ ഭാഷ തകർത്തു ഭരിക്കും ഭരണാധികാരികൾ,
അടിയറവു പറയാതെ സിംഹാസനക്കൊതി വളർത്തുന്നു।

बग़ल में छुरी रख के वो बस अदालत बढ़ाते हैं,
मीठी ज़ुबाँ से यहाँ अपनी तिजारत बढ़ाते हैं।

പുഞ്ചിരി തൂകി പുറകിൽ കപടത കാട്ടും ജഗത്തിൽ,
മധുരം പൊതിഞ്ഞ വാക്കുകളാൽ അവർ ചതി വളർത്തുന്നു।

दीवारों को ऊँचा उठा कर वो रक़ाबत बढ़ाते हैं,
एक लहर को भूल कर, अपनी वहशत बढ़ाते हैं।

ഒരേ ചോരയോടും ഒരേ ശ്വാസത്തോടും വസിക്കിലും,
മതിലുകൾ ഉയർത്തി അവർ ഉള്ളിൽ ശത്രുത വളർത്തുന്നു।

पाखंड की महफ़िल सजा कर वो दहशत बढ़ाते हैं,
ख़ुदा का नाम ले कर, दिलों में नफ़रत बढ़ाते हैं।

ഈശ്വരൻ നെഞ്ചിൽ ഇരിപ്പൂ എന്ന് പറയുന്ന നാവിനാൽ,
കപടഭക്തി തൻ സദസ്സുകളിൽ അവർ ഭയം വളർത്തുന്നു।

वो बारूद बोते हैं और बस क़यामत बढ़ाते हैं,
अमन की ज़मीन पर ज़ुल्म की हुकूमत बढ़ाते हैं।

സമാധാനം തേടി കരയുന്ന പാവങ്ങൾക്കിടയിൽ,
വെടിയുണ്ടകൾ വിതറി അവർ എന്നും വിനാശം വളർത്തുന്നു।

वो झूठ की बस्ती में अपनी हिफ़ाज़त बढ़ाते हैं,
सच का गला घोंट कर, अपनी ताक़त बढ़ाते हैं।

സത്യം വിളിച്ചു പറയുന്ന കണ്ണാടിയെ ഉടയ്ക്കുവാൻ,
നുണകളുടെ കോട്ട കെട്ടി അവർ സ്വന്തം കാവൽ വളർത്തുന്നു।

दुनिया के झूठे लोग अपनी मलामत बढ़ाते हैं,
जब भी 'जी.आर.' अपनी नज़्म की शहादत बढ़ाते हैं।

ലോകത്തിൻ കള്ളങ്ങൾ തൻ അപമാനം അവർ വളർത്തുന്നു,
വരികളിൽ സത്യം ജ്വലിപ്പിച്ചു 'ജി ആർ' കവിതകൾ വളർത്തുന്നു।


ജീ ആർ കവിയൂർ 
( GR kaviyoor)
11 06 2026
( Kaviyoor, Thiruvalla)

Sunday, June 7, 2026

मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽ द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ

 मौन की ग़ज़ल / മൗനത്തിന്റെ ഗസൽ
द्विभाषी ग़ज़ल / ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ



मौन में तेरी याद की ठहरी नमी है ग़ज़ल,
दिल से उठती दर्द की गहरी नमी है ग़ज़ल।

മൗനത്തിൽ നിൻ ഓർമ്മയുടെ തങ്ങി നനവാം ഗസൽ,
ഹൃദയത്തിൽ വേദനയുടെ ആഴ്നനവാം ഗസൽ।

आँख में ठहरा हुआ इक अश्क जब कहने लगे,
वेदना की बोलती फिर ख़ामुशी है ग़ज़ल।

കണ്ണീരായ് തങ്ങി നിൽക്കുന്നൊരു തുള്ളി സംസാരിക്കിൽ,
വേദനയുടെ മൗനഭാഷ വെളിപ്പെടുത്തും ഗസൽ।

रात की तन्हाइयों में चाँद जब सुनता मुझे,
चाँदनी के लब पे आकर जो थमी है ग़ज़ल।

രാവിൻ ഏകാന്തതയിൽ ചന്ദ്രൻ ചെവികൊടുക്കുമ്പോൾ,
നിലാവിൻ അധരങ്ങളിൽ മൗനമായി തങ്ങും ഗസൽ।

तेरी यादों की फुहारों में भीगता है दिल,
अश्क की धारा में बरसों से धुली है ग़ज़ल।

നിൻ സ്മൃതികൾ മഴയായി ഹൃദയത്തിൽ പെയ്യുമ്പോൾ,
അശ്രുനദിയിൽ കഴുകി തെളിഞ്ഞു നിൽക്കും ഗസൽ।

सूने घर के हर किसी कोने में तेरी आहटें,
इक उदासी की सदा बनकर जमी है ग़ज़ल।

ശൂന്യമായ വീടിൻ ഓരോ കോണിലും നിൻ ചുവടൊച്ച,
ഏകാന്തതയുടെ സ്വരമായി മുഴങ്ങിനിൽക്കും ഗസൽ।

खोए लम्हों की महक सी साथ चलती है सदा,
बीते सपनों की कोई प्यारी गठरी है ग़ज़ल।

മാഞ്ഞുപോയ നിമിഷങ്ങൾ സുഗന്ധമായി കൂടെവന്ന്,
സ്വപ്നങ്ങളുടെ ഭാണ്ഡമേന്തി നടന്നുപോകും ഗസൽ।

जब सफ़र में हमसफ़र कोई न मेरे साथ था,
मेरे क़दमों के निशाँ संग ही चली है ग़ज़ल।

ജീവിതയാത്രയിൽ കൂട്ടായി ആരുമില്ലാതിരുന്നപ്പോൾ,
എൻ കാൽപ്പാടുകൾക്കൊപ്പം നടന്നുപോയി ഗസൽ।

मैं 'जी आर' अपनी ख़ामोशी को जब आवाज़ दूँ,
दिल की हर धड़कन में तब से बसी है ग़ज़ल।

ഞാൻ 'ജി ആർ' എൻ മൗനത്തിന് ശബ്ദമേകിയ നാളിൽ,
എൻ ഹൃദയമിടിപ്പിനുള്ളിൽ വസിക്കുന്നിതാ ഗസൽ।

GR kaviyoor 
08 06 2026
(Kaviyoor, thiruvalla)

Thursday, June 4, 2026

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)

तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर"( ग़ज़ल)



तेरी तन्हाई से लगता है डर,
तेरी रुसवाई से लगता है डर।

न जाने कौन-सा मौसम बदल दे रंग अपना,
तेरी जुदाई से लगता है डर।

बहुत मासूम है ये दिल, फ़रेबों को नहीं समझे,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

कभी जो ख़्वाब आँखों में सजाकर मुस्कुराते थे,
उसी परछाई से लगता है डर।

ये दुनिया दर्द वालों की कहाँ तक साथ देती है,
किसी रुसवाई से लगता है डर।

मोहब्बत की गली में जब भी आगे बढ़ने लगता हूँ,
नई दुश्वारी से लगता है डर।

कभी जो रौशनी बनकर मेरे घर में उतरती थी,
उसी अंगड़ाई से लगता है डर।

न जाने किसलिए अब दिल ये हर आहट पे चौंके है,
तेरी शहनाई से लगता है डर।

मैं "जी आर" आज भी तेरा नाम लेकर सोचता हूँ,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।

जी आर कवियुर 
 05 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

सागर की एक कहानी

 सागर की एक कहानी 



गहरे सागर के नीले पानी में,

तैरती थी एक नन्हीं सी जान।

छोटी सी ज़िंदगी, छोटा सा सुक़ून,

लहरों के संग बहती अनजान।


तभी बुलाते एक जाल के घेरे में,

थम गई उस मासूम की साँस।

इंसानी हाथों ने छीन लिया,

उस छोटे से जीवन का एहसास।


प्रकृति का यह नियम बड़ा अजीब है,

एक का जीवन, दूजे का आहार।

आज उसका अंत हुआ, कल हमारी बारी,

यही तो है इस सृष्टि का व्यवहार।


जैसे ही उठते हैं भारी जाल आसमान की ओर,

खत्म हो जाती है उस मछली की दास्ताँ।

आते-जाते रहते हैं यहाँ सब मुसाफ़िर,

पर अमर रहता है यह अनंत आसमाँ।


 जी आर कवियुर 

03 06 2

026

(तिरुवल्ला, कवियुर)

मैं से हम हो जाए (ग़ज़ल)

 
मैं से हम हो जाए (ग़ज़ल)




मैं का छोटा घेरा आज खो हो जाए,
दिल का बंद दरवाज़ा खुला हो जाए।

जब मन बाँसुरी बनकर खुद को छोड़ दे,
हर साँस में कोई मीठा सुर हो जाए।

बीज अगर मिट्टी में चुपचाप सो जाए,
एक दिन वही पेड़ बड़ा हो जाए।

मुट्ठी भर अहं लेकर कब तक जीना है,
प्रेम मिले तो जीवन खड़ा हो जाए।

अपने-पराये का भेद जहाँ मिट जाए,
हर इंसान से मन फिर जुड़ा हो जाए।

क्रोध और लोभ की धूप अगर ढल जाए,
अंदर का सूखा बाग हरा हो जाए।

'जी आर' मैं खुद कहता हूँ, छोड़ दे सब बंधन,
जीवन हर पल प्रेम से भरा हो जाए।

जी आर कवियुर 
02 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)


ज़िंदा रहने की l ജീവിക്കാൻ ഞങ്ങൾ - bilungal gazhal

 ज़िंदा रहने की l ജീവിക്കാൻ ഞങ്ങൾ - bilungal gazhal




ज़िंदा रहने की हम ख़्वाब रखते हैं,  
जान जाने से पहले तेरा नाम रखते हैं।  

ജീവിക്കാൻ ഞങ്ങൾ സ്വപ്നങ്ങൾ കാണുന്നു,  
മരണം വരും മുൻപേ നിന്റെ പേര് കാണുന്നു।  

तेरी यादों को दिल में गुलाब रखते हैं,  
ज़ख्म कितने भी हों मुस्कुराहट तमाम रखते हैं।  

നിന്റെ ഓർമ്മകൾ ഹൃദയത്തിൽ പുഷ്പങ്ങൾ കാണുന്നു,  
എത്ര മുറിവുണ്ടെങ്കിലും പുഞ്ചിരി നിറച്ച് കാണുന്നു।  

लोग पढ़ लें न चेहरा हमारे दर्दों का,  
हम निगाहों पे ख़ामोशियाँ आम रखते हैं।  

മുഖം ആരും വായിക്കാതിരിക്കാൻ വേദന മറച്ച് കാണുന്നു,  
നോട്ടങ്ങളിൽ നിശബ്ദതയുടെ ഭാഷ കാണുന്നു।  

वक्त बदले तो बदल जाए दुनिया सारी,  
हम मगर इश्क़ का वही निज़ाम रखते हैं।  

കാലം മാറിയാലും ലോകം മാറിയാലും,  
പ്രണയത്തിന്റെ അതേ നിയമം കാണുന്നു।  

धूप में जल के भी छाँव बाँटते फिरते,  
दिल में दरिया सा इक एहतराम रखते हैं।  

സൂര്യത്തിൽ കത്തിയാലും നിഴൽ പോലെ കാണുന്നു,  
ഹൃദയത്തിൽ സമുദ്രം പോലെ ആദരം കാണുന്നു।  

जो बिछड़कर भी रूह में उतर जाते हैं,  
उनके किस्से हम सुबह-ओ-शाम रखते हैं।  

വേർപെട്ടിട്ടും ആത്മാവിൽ കുടിയേറുന്നവരെ,  
അവരുടെ കഥകൾ രാവും പകലും കാണുന്നു।  

हार जाए न कहीं हौसला तन्हाई में,  
हम दुआओं में कई इंतज़ाम रखते हैं।  

തനിമയിൽ പ്രതീക്ഷ തകരാതിരിക്കാനായി,  
പ്രാർത്ഥനകളിൽ ആശ്വാസങ്ങൾ കാണുന്നു।  

'जी आर' अपने सुख़न में तेरी खुशबू लेकर,  
हम ग़ज़ल कहने का कुछ तो मुक़ाम रखते हैं।  

'ജീ ആർ' എന്ന പേരിൽ നിന്റെ സുഗന്ധം ചേർത്ത്,  
ഗസൽ എഴുതുന്ന ഒരു ഉയരം കാണുന്നു।

GR kaviyoor 
28 05 2026
( Kaviyoor , thiruvalla)