इकसठ का सफ़र (ग़ज़ल)
मैं आज इकसठ का हूँ मगर दिल से जवान हूँ,
ज़िंदगी के नशे में अब तलक डूबा हुआ हूँ।
सच को लेकर इस जहाँ में कब किसी से क्या कहा हूँ,
अपने ही एहसास की दुनिया में अक्सर रह गया हूँ।
मन में जो आया उसे काग़ज़ पे लिखना चाहता था,
जाने कितनी बार ख़ुद को रोक कर फिर रह गया हूँ।
अंगूठे की कैद में दिन-रात यूँ उलझा रहा मैं,
मोबाइल के जाल में अनजाने ही फँस गया हूँ।
चाँद खिड़की पर खड़ा था, चाँदनी आवाज़ देती,
स्क्रीन की चमक में लेकिन उससे भी कट गया हूँ।
दोस्त मिलते हैं मुझे अब सिर्फ़ तस्वीरों के भीतर,
भीड़ में रहकर भी देखो किस क़दर तनहा हुआ हूँ।
अपनों के उजले कल की ख़ातिर दूरियों को चुन लिया,
आज उनको कामयाब देख कर खुश हो रहा हूँ।
मैं 'जी आर' कहता हूँ, सुन लो मेरी पहचान भी,
उम्र के इस मोड़ पर भी ख़्वाब में जीता हुआ हूँ।
जी आर कवियूर
16 06 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

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