Sunday, June 14, 2026

सूर्य और अंधकार का संवाद

सूर्य और अंधकार का संवाद


गहरे अंधकार ने एक दिन चमकते सूर्य से पूछा
मैं तुम्हें देखूँ तो कैसे मन के इस विचार ने पूछा

उत्तर मिला कि मिटना होगा तुम्हें मेरे प्रकाश में
क्या तुम खो सकते हो खुद को इस अनोखे द्वार ने पूछा

अस्तित्व अपना खोकर ही कोई पा सकता है तुमको
दीये ने टिमटिमाते हुए रातों के संसार से पूछा

जो छुपाता है वही तो रूप देता है उजाले को
यही भेद सुबह होते ही गिरते हुए अंधकार ने पूछा

पतंगा जानता है जलकर ही उसकी पहचान बनती है
सुलगती आग से फिर क्यूँ दिल की इस पुकार ने पूछा

जिसे हम अंत कहते हैं वो बस एक नई शुरुआत है
पतझड़ के डर से खिलते हुए फूलों के हार ने पूछा

मैं ढूँढूँ कहाँ तुमको जब तुम हर कण में समाए हो
राहगीर ने समंदर के बहते हुए पानी की धार ने पूछा

जहाँ तुम हो वहाँ तो कोई और रह नहीं सकता
यह सुंदर दृश्य देखने की चाह में इस संसार ने पूछा

कह रहे 'जी आर' कविता मौन बातचीत का रूप है
जो सदियों से जीवन और मृत्यु के इस पार ने पूछा

जी आर कवियुर 
08 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

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