सागर की एक कहानी
गहरे सागर के नीले पानी में,
तैरती थी एक नन्हीं सी जान।
छोटी सी ज़िंदगी, छोटा सा सुक़ून,
लहरों के संग बहती अनजान।
तभी बुलाते एक जाल के घेरे में,
थम गई उस मासूम की साँस।
इंसानी हाथों ने छीन लिया,
उस छोटे से जीवन का एहसास।
प्रकृति का यह नियम बड़ा अजीब है,
एक का जीवन, दूजे का आहार।
आज उसका अंत हुआ, कल हमारी बारी,
यही तो है इस सृष्टि का व्यवहार।
जैसे ही उठते हैं भारी जाल आसमान की ओर,
खत्म हो जाती है उस मछली की दास्ताँ।
आते-जाते रहते हैं यहाँ सब मुसाफ़िर,
पर अमर रहता है यह अनंत आसमाँ।
जी आर कवियुर
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(तिरुवल्ला, कवियुर)

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