मैं से हम हो जाए (ग़ज़ल)
मैं का छोटा घेरा आज खो हो जाए,
दिल का बंद दरवाज़ा खुला हो जाए।
जब मन बाँसुरी बनकर खुद को छोड़ दे,
हर साँस में कोई मीठा सुर हो जाए।
बीज अगर मिट्टी में चुपचाप सो जाए,
एक दिन वही पेड़ बड़ा हो जाए।
मुट्ठी भर अहं लेकर कब तक जीना है,
प्रेम मिले तो जीवन खड़ा हो जाए।
अपने-पराये का भेद जहाँ मिट जाए,
हर इंसान से मन फिर जुड़ा हो जाए।
क्रोध और लोभ की धूप अगर ढल जाए,
अंदर का सूखा बाग हरा हो जाए।
'जी आर' मैं खुद कहता हूँ, छोड़ दे सब बंधन,
जीवन हर पल प्रेम से भरा हो जाए।
जी आर कवियुर
02 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

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