जो राहें कभी चलकर गुज़रीं,
याद बनकर पीछे ठहर गईं।
समय के कोमल पदचिह्न,
मन में अंकित रह गए।
जब पेड़ों ने छाया फैलायी,
बीते दिन फिर जाग उठे।
भूले हुए समझे जाने वाले पल,
फिर सामने आ खड़े हुए।
पीछे मुड़कर देखती राहों में,
यात्रा का अर्थ दिखाई दिया।
बीते हुए हर एक कदम ने,
आज के मुझको गढ़ा था।
जी आर कवियुर
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)
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