सांझ की गोद में लौ कांप उठी,
बाती का प्रकाश धीरे घटने लगा,
हवाएँ चारों ओर घूमती रहीं,
फिर भी उजाला संघर्ष करता रहा।
अंधकार के कदम निकट आ गए,
परछाइयाँ दीवारों पर फैल गईं,
साहस तनिक भी फीका न पड़ा,
विश्वास भीतर पहरा देता रहा।
भोर का संकेत दूर दिखाई दिया,
किरणें यात्रा के लिए तैयार थीं,
अंत पराजय में नहीं बदला,
उसका अस्तित्व संदेश बन गया।
जी आर कवियुर
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)
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