(ग़ज़ल)
समंदर ने दी दिल को गहराइयों की पुकार में,
मिला इक नया ही जहाँ डूबते विस्तार में।
हर इक मौज अपने ही अंदाज़ से कुछ कह गई,
छुपा था कई राज़ सदियों से उस धार में।
मूँगों की बस्ती में ख़ामोश रंग बोलते,
हज़ारों उजाले मिले एक ही अँधियार में।
जो उतरा तो मोती ही मोती नज़र आने लगे,
ख़ज़ाना मिला हौसलों के ही व्यापार में।
सफ़र ने सिखाया कि डर छोड़ देना चाहिए,
यही फ़लसफ़ा मिल गया उस अथाह पार में।
समंदर नहीं सिर्फ़ पानी का इक सिलसिला,
वो इक आईना है हमारे ही संसार में।
जी आर ने जाना कि गहराइयों का है ये असर,
मिले अस्ल मोती हमेशा ही अपने विचार में।
जी आर कवियूर
26 06 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

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