प्रभात मधुर मुस्कान सजाकर खड़ा है,
पक्षियों का समूह सुरीले स्वर बिखेरता है,
घास पर ओस मोतियों-सी चमकती है,
मन को सुंदर दृश्य सहला जाते हैं।
दूर कहीं एक पगडंडी मुड़ती जाती है,
यात्राएँ नई कथाएँ बुनती रहती हैं,
समीर सुगंध लेकर पास चली आती है,
आशाएँ अंतर में चुपचाप खिलती हैं।
नीले गगन में मेघ रथ तैरते हैं,
विचार पंख फैलाकर उड़ने लगते हैं,
अनुभूतियाँ नए रंगों से सजती हैं,
सृष्टि अद्भुत रूप धारण कर लेती है।
जी आर कवियुर
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)
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