नज़रों में ठहरी हुई थीं,
अनकही कहानियाँ सभी।
शब्दों की आवश्यकता न थी,
दिल सब कुछ सुन रहा था।
मुस्कान की हल्की परत में,
दर्द कहीं छिपा हुआ था।
गहरी दृष्टि की गहराई में,
यादें अब भी चमक रही थीं।
कभी-कभी एक पल ही,
दिलों को बात करने को काफी है।
आँखों की उस खामोशी में,
सच्चाइयाँ जीवित थीं।
जी आर कवियुर
06 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)
No comments:
Post a Comment