तेरी तन्हाई से लगता है डर,
तेरी रुसवाई से लगता है डर।
न जाने कौन-सा मौसम बदल दे रंग अपना,
तेरी जुदाई से लगता है डर।
बहुत मासूम है ये दिल, फ़रेबों को नहीं समझे,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।
कभी जो ख़्वाब आँखों में सजाकर मुस्कुराते थे,
उसी परछाई से लगता है डर।
ये दुनिया दर्द वालों की कहाँ तक साथ देती है,
किसी रुसवाई से लगता है डर।
मोहब्बत की गली में जब भी आगे बढ़ने लगता हूँ,
नई दुश्वारी से लगता है डर।
कभी जो रौशनी बनकर मेरे घर में उतरती थी,
उसी अंगड़ाई से लगता है डर।
न जाने किसलिए अब दिल ये हर आहट पे चौंके है,
तेरी शहनाई से लगता है डर।
मैं "जी आर" आज भी तेरा नाम लेकर सोचता हूँ,
तेरी बेवफ़ाई से लगता है डर।
जी आर कवियुर
05 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)
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