तेरी ही परछाई है
तेरी यादों की छाया है, तेरी ही परछाई है,
इस सूने घर के हर कोने में गहरी तन्हाई है।
सूना आँगन, मौन किताबें, चुप पूजा की चौखट,
तेरे बिन हर शय ने जैसे ओढ़ी हुई जुदाई है।
बर्तन, चौखट, खाली बिस्तर, सब गुमसुम बैठे हैं,
इन बेजान गवाहों में भी तेरी ही सच्चाई है।
दूधवाला आवाज़ लगाता, सब्ज़ीवाला आता है,
लेकिन दरवाज़े पर अब किसकी वह सुनवाई है।
बिल्ली रोए दूध की ख़ातिर, कुत्ता भी बेचैन फिरे,
घर के हर जीव ने तेरी कमी की पीर उठाई है।
डाँट तुम्हारी, प्यार तुम्हारा, दोनों याद बहुत आते,
मीठी-सी उस झिड़की में भी कितनी बड़ी भलाई है।
दूर गगन में चाँद की सूरत जब-जब नज़र आती है,
लगता है माँ मुस्काती है, देती फिर बधाई है।
आँखें नम हो जाती हैं जब यादों का मौसम आए,
दिल ने तेरी ममता की हर दौलत आज बचाई है।
कहता है 'जी आर' कि माँ, तू कहीं गई ही नहीं,
हर ख़ामोशी में जैसे तेरी ही परछाई है।
जी आर कवियुर
07 06 2026
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