नयना बिछाए रहे राह पर,
तेरे आने की आस रही आह पर।
ठहरी हुई थी मेरी निगाह पर,
तेरी यादों की छाँव रही पनाह पर।
दिल ने सजाए ख़्वाब हर चाह पर,
अश्कों की मुहर लग गई गवाह पर।
मौसम ने लिख दी दास्ताँ चाह पर,
फूलों की हँसी मिट गई तबाह पर।
रातें गुज़र गईं तेरी निगाह पर,
साँसें ठहरी रहीं एक आह पर।
दुनिया ने लाख प्रश्न किए राह पर,
हम चलते ही रहे अपनी चाह पर।
तन्हाइयों का राज रहा आह पर,
यादों का कारवाँ चला राह पर।
मिलने की एक लौ जली चाह पर,
दिल की नज़र टिकी रही राह पर।
मैं "जी आर" लिखता रहा दिल की चाह पर,
एक उम्र कट गई तेरी ही राह पर।
जी आर कवियुर
11 06 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)
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