खाली कक्ष में प्रतिध्वनि ठहर गई,
दीवारों ने कथाएँ छिपाकर रखीं,
निगाहों की खोज वाले दृश्य खो गए,
समय निश्चल होकर ठहर गया।
बिखरी स्मृतियाँ फिर जाग उठीं,
हृदय ने हर कमी को गिना,
दूरी छाया बन साथ चलती रही,
पीड़ा ने अंतर्मन को छू लिया।
आशा ने एक छोटी ज्योति जलाई,
अंधकार में नई दिशा उभर आई,
अनुभव ने अर्थों का उपहार दिया,
जीवन पूर्णता की ओर बढ़ चला।
जी आर कवियुर
20 06 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)
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