Friday, August 21, 2026

बूँद में बसा आकाश

बूँद में बसा आकाश

जब एक बारिश की बूँद
पत्ती की नोक पर काँप रही थी,
उसके पारदर्शी हृदय में
एक नीला आकाश झिलमिला रहा था।

बादलों के गुज़र जाने के रास्ते,
उड़ चुके पंछियों की परछाइयाँ,
और दूर कहीं सूरज की मुस्कान—
सब कुछ उस छोटी-सी बूँद में समाया था।

उसे छोटा समझकर
किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया;
लेकिन उसके भीतर छिपी थी
एक पूरी दुनिया।

जब वह धरती पर गिरी,
तो स्वयं को खोया नहीं—
वह एक बीज का सपना बन गई,
और नई हरियाली को जीवन दे गई।

बूँद ने कहा—
“मेरे छोटे होने के कारण
मेरे आकाश को छोटा मत समझना;
एक बूँद के भीतर भी
पूरा ब्रह्मांड छिपा हो सकता है।”

और इस तरह एक बारिश की बूँद में
आकाश ने स्वयं धरती को छू लिया—
चुपचाप यह समझाते हुए कि
छोटी-सी चीज़ के भीतर भी
एक विशाल संसार जीवित हो सकता है। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

क्षितिज का निमंत्रण

क्षितिज का निमंत्रण

कहीं दूर उस मायावी छोर पर,
जहाँ आकाश और सागर एक हो जाते हैं,
संध्या के सुनहरे रंगों में सजा
क्षितिज मुझे पुकार रहा है।

दूरियों के पार उड़ने को आतुर
इस मन से वह धीरे से कहता है—
“आओ…”
और लहरें राह दिखाने लगती हैं।

डूबते सूरज की लालिमा में
जब एक नया सपना खिलता है,
हृदय बीते कल की राहों को पीछे छोड़कर
आने वाले कल की तलाश में चल पड़ता है।

क्षितिज ने कहा—
“मुझे छूने के लिए तुम्हें मेरे पास आने की आवश्यकता नहीं,
मेरी ओर बढ़ते हुए
बस अपने भीतर की सीमाओं को पार कर लेना।”

और यूँ दूर की एक रोशनी बनकर
क्षितिज सदा पुकारता रहता है—
यह याद दिलाते हुए कि
जहाँ सब कुछ समाप्त होता दिखाई देता है,
वहीं से एक नई यात्रा शुरू होती है। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

पहाड़ की साँस

पहाड़ की साँस

बादलों के स्पर्श से जागती पर्वत-ढलानों पर,
जब धुंध की उँगलियाँ धरती को धीरे से सहलाती हैं,
हवा की लय पर पत्ते गाते हैं—
जैसे पहाड़ के भीतर कोई साँस चलती हो।

चट्टानों के मौन हृदय में
छोटी-छोटी धाराएँ जन्म लेती हैं;
घाटियों की ओर बहती हर बूँद में
पहाड़ अपना जीवन बाँटता है।

जहाँ पेड़ काट दिए गए हैं,
वहाँ अब केवल खामोशी उगती है;
जड़ों को खोजती मिट्टी की आँखों में
एक पुराना दर्द उभर आता है।

पहाड़ ने कहा—
“याद रखना, मेरी साँस केवल हवा में नहीं,
तुम्हारी साँसों में भी बसी है;
अगर तुम मेरी रक्षा करोगे,
तो धरती कल भी साँस ले पाएगी।”

इसलिए पहाड़ के सीने पर
आओ, एक पेड़ लगाएँ—
और जब वह बढ़े,
तो हमारे भीतर भी
एक हरी साँस जन्म ले। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

खाली घोंसला

खाली घोंसला

पुरानी पेड़ की डाल पर
बस एक घोंसला झूल रहा था,
जो सुबहें कभी गीतों से गूंजती थीं,
अब केवल हवा में सुनाई देती थीं।

कभी पंखों की फड़फड़ाहट से भरा
वह छोटा-सा आशियाना,
आज खामोश था,
फिर भी वहाँ यादें कभी सोई नहीं थीं।

जहाँ से बच्चे उड़ चले थे,
उस राह में आकाश बहुत विशाल था,
माँ-पक्षी की प्रतीक्षा में
बस प्रेम ही था, जो कभी छोटा नहीं हुआ।

वह खाली घोंसला कह रहा था—
बिछड़ना शून्यता नहीं है;
यह वही प्रेम है, जिसने उड़ना सिखाया,
और अंततः वही प्रेम
सबसे बड़ा घोंसला बन जाता है।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

घास की मुस्कान

घास की मुस्कान

भोर की ओस की बूँदों में
घास की नोकें मुस्कुराईं।
जब कोई देख भी नहीं रहा था,
धरती ने हरियाली ओढ़ ली।

हवा ने आकर जब छुआ,
वे धीरे से झुक गईं।
पैरों के स्पर्श से गुज़रने पर भी
उन्होंने कोई शिकायत नहीं की।

जब धूप की तपिश उतरी,
वे बिना छाँव के भी खड़ी रहीं।
बारिश की एक बूँद मिली तो
फिर से ताज़गी में जाग उठीं।

तभी समझ आया—
सुंदर जीवन के लिए बड़ा होना ज़रूरी नहीं;
छोटा होकर बढ़ना भी पर्याप्त है,
यदि हृदय मुस्कुराना जानता हो।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Wednesday, August 19, 2026

दिल का दर्द छुपाएँ कैसे | ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെBilingual Hindustani–Malayalam Ghazal

दिल का दर्द छुपाएँ कैसे | ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെ
Bilingual Hindustani–Malayalam Ghazal
दिल का दर्द छुपाएँ कैसे,
ज़ख़्म कितना भी गहरा हो, दिखाएँ कैसे।

ഹൃദയവേദന മറയ്ക്കാം എങ്ങനെ,
ആഴമേറിയ മുറിവുകൾ കാണിക്കാം എങ്ങനെ.

मिज़रों में जो अश्क हैं, बताएँ कैसे,
ख़ामोश इन आँखों को समझाएँ कैसे।

മിഴികളിൽ നിറയുന്ന കണ്ണുനീർ പറയാം എങ്ങനെ,
മൗനമായ കണ്ണുകളെ ആശ്വസിപ്പിക്കാം എങ്ങനെ.

तेरी यादों को दिल से मिटाएँ कैसे,
बीते लम्हों को फिर से बुलाएँ कैसे।

നിന്റെ ഓർമ്മകൾ ഹൃദയത്തിൽനിന്ന് മായിക്കാം എങ്ങനെ,
കടന്നുപോയ നിമിഷങ്ങളെ തിരികെ വിളിക്കാം എങ്ങനെ.

इस दिल की कहानी सुनाएँ कैसे,
छुपे हुए जज़्बात जताएँ कैसे।

ഈ ഹൃദയത്തിന്റെ കഥ ചൊല്ലാം എങ്ങനെ,
ഒളിപ്പിച്ച വികാരങ്ങൾ അറിയിക്കാം എങ്ങനെ.

‘जी आर’ इस दिल को तुझसे जुदा करें कैसे,
तेरे बिना ये ज़िंदगी बिताएँ कैसे।

‘ജി ആർ’ ഈ ഹൃദയത്തെ നിന്നിൽനിന്ന് അകറ്റാം എങ്ങനെ,
നീയില്ലാതെ ഈ ജീവിതം നയിക്കാം എങ്ങനെ.

GR kaviyoor 
19 08 2026
( Thiruvalla, kaviyoor)

Sunday, August 16, 2026

The Invisible Bridge

The Invisible Bridge

Between two shores
The river kept flowing,
While distances stretched between them
Like a bond that could never be touched.

Without speaking a single word,
Two eyes spoke to each other.
Along forgotten pathways,
Memories crossed to the other side.

An unseen bridge
Rose quietly between two hearts;
To cross beyond time and distance,
Faith alone was enough.

There was no longer an “here” or “there”—
The moment two hearts became one,
The bridge was nowhere to be seen,
Yet no one was far away anymore.

GR kaviyoor 
17 08 2026
(Thiruvalla, kaviyoor)

मरुस्थल की बारिश की बूँद

मरुस्थल की बारिश की बूँद

तपती रेत के विस्तार के बीच,
जहाँ गर्मी की साँस बसी थी,
एक दिन अचानक
आकाश ने एक बूँद उपहार में दी।

प्यासी रेत की लहरों ने
उसे हथेलियों की तरह थाम लिया।
एक सूखे हुए बीज के भीतर
एक नया स्वप्न जाग उठा।

वह केवल एक बूँद थी,
फिर भी छोटी नहीं थी;
मरुस्थल की निस्तब्धता में
वह जीवन का पहला शब्द बन गई।

बारिश फिर लौटकर न आई,
फिर भी आशा वहाँ नहीं मिटी।
उस एक बूँद ने सिखाया—
बंजर भूमि में भी वसंत जन्म ले सकता है।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

नदी का जन्म


नदी का जन्म

कहीं पर्वत के हृदय में
एक बूँद पिघलकर उतर आई।
चट्टानों की सँकरी राहों से
वह नई दिशा खोजती चली।

जिसे कोई सुन न सका,
उस स्वर में उसने धरती से कहा;
एक छोटी धारा बनकर जन्मी
और दूर की घाटियों का स्वप्न देखा।

राह में मिले पत्थरों को
उसने टाला नहीं, उन्हें छूकर बहती रही।
एक छोटी-सी जलधारा भी
अपना लक्ष्य नहीं भूली।

अंततः जब कई धाराएँ मिलकर
एक नदी बन गईं,
पर्वत की निस्तब्धता में जन्मी वह बूँद
दुःख के लवण-स्वाद से भरे
समुद्र की कहानी बन गई।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

हरियाली की साँस

हरियाली की साँस

भोर की ओस की बूँदों में
हरियाली ने धीरे से आँखें खोलीं।
पत्तों की निःशब्द हलचल में
धरती ने साँस ली।

जिन राहों से होकर हवा गुज़री,
घास ने सिर झुका लिया।
एक नन्ही कोंपल की थरथराहट में भी
जीवन का संगीत सुनाई दिया।

धूप की तपिश के बीच भी
हरियाली ने आशा नहीं छोड़ी।
सूखी धरती की छाती पर
एक नई कोंपल जन्मी।

तभी समझ आया—
प्रकृति शब्दों में नहीं बोलती,
हरियाली की हर छटा में
जीवन की साँस बसी है।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

तितली की परछाईं

तितली की परछाईं

फूल से फूल तक उड़ती तितली
जब रंग बिखेरती चली गई,
घास की नन्ही-सी नोक पर
उसकी परछाईं चुपचाप ठहर गई।

उसे थामने बढ़ी उँगलियों से पहले
वह हवा में विलीन हो गई।
छू न सकने वाली उस सुंदरता का
बस एक क्षण शेष रह गया।

पंख दूर चले गए फिर भी
परछाईं वहाँ से मिट न सकी।
एक गुज़रता हुआ अस्तित्व
हृदय पर चित्र बनकर ठहर गया।

तभी समझ आया—
कुछ सुंदरताएँ पाने के लिए नहीं होतीं,
वे बिना छुए भी गुज़र जाएँ
तो हृदय में रंग भर जाती हैं।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

तेरी ख़ामोशी (ग़ज़ल)

तेरी ख़ामोशी (ग़ज़ल)
तेरी यह ख़ामोशी मुझे वाग्मी बना देती है
तेरी हर इक अदा मुझे दीवाना बना देती है

तेरी आँखों में छुपा कोई अफ़साना बना देती है
एक नज़र मेरी धड़कनों को परवाना बना देती है

तेरी यादों की महक जब साँसों में उतरती है
सूना दिल भी मेरा एक आशियाना बना देती है

तेरे मिलने की तमन्ना दिल में जब जागती है
हर राह को मेरी तेरे दर का ठिकाना बना देती है

तेरी बातों में मोहब्बत का जो रंग घुलता है
ज़िंदगी को मेरी इक हसीन तराना बना देती है

तेरी दूरी भी अजब रंग दिखाती है मुझको
आँखों में दर्द का गहरा ख़ज़ाना बना देती है

‘जी आर’ तेरी मोहब्बत का ये कैसा अफ़साना
मेरी ख़ामोशियों को भी तराना बना देती है


जी आर कवियुर 
16 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

कहता है वो(ग़ज़ल)

कहता है वो
(ग़ज़ल)
कहता है वो, मगर बात बताता नहीं है वो,
अंगारों में चमकता है, दिल में गूँजता है वो।

राज़-ए-दिल को होंठों पे कभी लाता नहीं है वो,
चुप रहकर भी हर बात समझाता है वो।

दूर रहके भी मेरी साँसों में समाता है वो,
याद बनकर हर घड़ी दिल को सताता है वो।

रात की तन्हाइयों में चाँद बन जाता है वो,
टूटते तारों में मुझको मुस्कुराता है वो।

मैं उसे भूलूँ भी तो कैसे भुला पाता है वो,
मेरी हर धड़कन में फिर लौट आता है वो।

‘जी आर’ पूछता है दिल से, ये कैसा राज़ है,
दूर रहकर भी जो हर पल पास आता है वो।

जी आर कवियुर 
15 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात, आँखों से आँखें मिलीं,
दिल की ख़ामोश धड़कनों को जैसे राहें मिलीं।

तेरी नज़रों में जाने कैसी कशिश थी उस घड़ी,
बुझी-बुझी सी मेरी आँखों को फिर चाहें मिलीं।

तेरी बातों की महक अब तक बसी है साँस में,
सूने दिल को तेरी यादों की पनाहें मिलीं।

एक पल में उम्र भर का फ़ासला मिटता गया,
जब मेरी तन्हा डगर को तेरी बाहें मिलीं।

चाँद भी ठहरा हुआ था, रात भी मदहोश थी,
तेरी यादों से सजी कितनी ही शामें मिलीं।

“जी आर” उस पहली नज़र को भूल पाएगा कहाँ,
ज़िंदगी को जब तेरी चाहत की निगाहें मिलीं।

जी आर कवियुर 
14 08 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात ( ग़ज़ल)

तेरी पहली मुलाक़ात, आँखों से आँखें मिलीं,
दिल की ख़ामोश धड़कनों को जैसे राहें मिलीं।

तेरी नज़रों में जाने कैसी कशिश थी उस घड़ी,
बुझी-बुझी सी मेरी आँखों को फिर चाहें मिलीं।

तेरी बातों की महक अब तक बसी है साँस में,
सूने दिल को तेरी यादों की पनाहें मिलीं।

एक पल में उम्र भर का फ़ासला मिटता गया,
जब मेरी तन्हा डगर को तेरी बाहें मिलीं।

चाँद भी ठहरा हुआ था, रात भी मदहोश थी,
तेरी यादों से सजी कितनी ही शामें मिलीं।

“जी आर” उस पहली नज़र को भूल पाएगा कहाँ,
ज़िंदगी को जब तेरी चाहत की निगाहें मिलीं।

जी आर कवियुर 
14 08 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

Thursday, August 13, 2026

मेरे लिए — എനിക്കായ്Bilungal gazhal

मेरे लिए — എനിക്കായ്
Bilungal gazhal 
तुम्हारे लिए मैंने छोड़ दिए दिल के सारे अरमान,
तुमने छोड़ दिया आँखों में दर्द और इंतज़ार मेरे लिए।

നിനക്കായ് ഞാൻ ത്യജിച്ചുവല്ലോ ഹൃദയത്തിലെ മോഹങ്ങൾ,
നീ നീക്കി വെച്ചതോ കണ്ണീരിൻ വേദനകൾ എനിക്കായ്.

तेरी यादें आज भी मेरी रातों में खिलती हैं,
अधूरे उन सपनों का रहा इंतज़ार मेरे लिए।

നിന്റെ ഓർമ്മകൾ ഇന്നും എൻ രാത്രികളിൽ പൂക്കുന്നു,
ഉണരാത്തൊരു സ്വപ്നമായി അവശേഷിച്ചു എനിക്കായ്.

तेरी राहों में मैं कितनी देर तक ठहरा रहा,
फिर वही तन्हाई बनी मेरा संसार मेरे लिए।

നിനക്കായി ഞാൻ കാത്തിരുന്ന വഴികൾ ഇന്നും നിശ്ശബ്ദം,
പിരിയാത്തൊരു ഏകാന്തത മാത്രം ശേഷിച്ചു എനിക്കായ്.

तेरी हँसी में मैं अपने सारे दुख भूल गया था,
तेरी ख़ामोशी बन गई दिल की पुकार मेरे लिए।

നിന്റെ ചിരിയിൽ ഞാൻ മറന്നുപോയി എൻ ദുഃഖങ്ങളെല്ലാം,
നിന്റെ മൗനം മാത്രം ഒരു ശിക്ഷയായി എനിക്കായ്.

साथ देखे हुए सपने जब समय ने धीरे-धीरे मिटा दिए,
टूटे हुए दिल का रह गया बस इज़हार मेरे लिए।

ഒരുമിച്ച് കണ്ട സ്വപ്നങ്ങൾ കാലം പതിയെ മായിച്ചപ്പോൾ,
തകർന്ന ഹൃദയത്തിൻ കഷണങ്ങൾ മാത്രം എനിക്കായ്.

तुझे पाने की चाह में जो कुछ मैंने खो दिया,
मेरी ज़िंदगी बन गई एक सवाल बार-बार मेरे लिए।

നിന്നെ സ്വന്തമാക്കാൻ ഞാൻ നഷ്ടപ്പെടുത്തിയതെല്ലാം ഓർക്കുമ്പോൾ,
എൻ ജീവിതം തന്നെ ഒരു ചോദ്യമായി എനിക്കായ്.

जी आर, अपने ही शब्दों में लिख दिया दिल का इज़हार,
शायद ये ग़ज़ल बन जाए एक यादगार मेरे लिए।

ജീ ആർ, നീയെന്ന പേരിൽ ഞാൻ കുറിച്ചുവച്ച ഈ വരികൾ,
കാലം മായ്ക്കാത്തൊരു ഓർമ്മയായി നിലനിൽക്കട്ടെ എനിക്കായ്.

GR kaviyoor 
12 08 2026
( Thiruvalla , kaviyoor)

Wednesday, August 12, 2026

काल / കാലംBilingual Hindustani Ghazal

काल / കാലം

Bilingual Hindustani Ghazal
वक़्त हाथों से हमारे यूँ गुज़रता रहा,
हर नया दिन भी कहानी-सा गुज़रता रहा।

കാലം കൈവിട്ടു മൗനമായി കടന്നുപോയി,
ഓരോ ദിനവും പുതുകഥയായ് കടന്നുപോയി।

कल की यादों में दिल अक्सर ही खोया रहा,
बीता मौसम भी मगर दिल से गुज़रता रहा।

ഇന്നലെയോർമ്മകളിൽ മനസ്സു പലപ്പോഴും അലഞ്ഞുനിന്നു,
പോയ വസന്തം ഹൃദയത്തിലൂടെ കടന്നുപോയി।

सालों की राह में कितने ही मौसम बदले,
हर नया रंग पुराने रंग में ढलता रहा।

വർഷങ്ങളുടെ വഴിയിൽ എത്രയോ കാലങ്ങൾ മാറി,
ഓരോ നിറവും പഴയ നിറമായ് മാറിപ്പോയി।

जिन लम्हों को सँजोया था बड़ी उम्मीद से,
वक़्त की लहरों में हर सपना बिखरता रहा।

പ്രതീക്ഷയോടെ കാത്തുവെച്ച നിമിഷങ്ങൾ പലതും,
കാലത്തിൻ തിരകളിൽ ഓരോ സ്വപ്നവും അലിഞ്ഞുപോയി।

उम्र बढ़ती रही, चेहरे पे निशाँ आते रहे,
आईना चुपचाप मगर सच को दिखाता रहा।

വയസ്സു കൂടിയപ്പോൾ മുഖത്തും മാറ്റങ്ങൾ വന്നു,
കണ്ണാടി മൗനമായ് ജീവിതം കാട്ടിപ്പോയി।

कुछ निशाँ दिल में आज भी महफ़ूज़ हैं मेरे,
वक़्त मिटाता रहा, यादों में बसता रहा।

ചില അടയാളങ്ങൾ ഇന്നും ഹൃദയത്തിൽ പതിഞ്ഞുനിന്നു,
കാലം മായ്ച്ചിട്ടും ഓർമ്മയായി കടന്നുപോയി।

‘जी आर’ ने भी लिख दिया उम्र का अफ़साना,
वक़्त गुज़रता रहा, गीत मगर रहता रहा।

‘ജി ആർ’ കൂടി എഴുതിയീ ജീവിതകഥയിതാ,
കാലം കടന്നുപോയാലും പാട്ടായി ശേഷിച്ചുപോയി.

GR kaviyoor 
12 08 2026
( Thiruvalla , kaviyoor)

Tuesday, August 11, 2026

भूली हुई घंटी की ध्वनि

भूली हुई घंटी की ध्वनि

एक पुराने मंदिर के आँगन में
एक घंटी निःशब्द खड़ी थी।
बीते वर्षों की उँगलियों के निशान
उस पर जम चुके थे।

कभी उसकी ध्वनि से
प्रभात जाग उठता था।
बिना राह के आने वाले भी
उसकी आवाज़ में दिशा पाते थे।

वर्ष बीतते गए,
किसी ने उसे याद नहीं किया।
फिर एक दिन हवा की उँगलियों ने
उसे धीरे से छू लिया।

अचानक उठी उस घंटानाद में
सोई हुई स्मृतियाँ जाग उठीं।
वह सचमुच भूली नहीं थी—
वह समय द्वारा सँजोकर रखी गई एक पुकार थी।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

स्वतंत्रता का बीज

स्वतंत्रता का बीज

धरती के भीतर छिपा हुआ
एक छोटा-सा बीज स्वप्न देखता रहा।
चारों ओर के अँधेरे से अधिक
उसे अपने भीतर के प्रकाश पर विश्वास था।

बंधन की चट्टानों के बीच भी
जड़ों ने अपना मार्ग खोज लिया।
ऊपर खुला हुआ आकाश
उसके स्वप्न का आह्वान बन गया।

जब वर्षा की एक बूँद ने छुआ,
सोया हुआ जीवन जाग उठा।
पहली हरियाली की पत्ती पर
भोर ने स्वतंत्रता लिख दी।

तब मानो धरती ने कहा—
स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं,
वह उस बीज का साहस है
जो स्वयं को चीरकर ऊपर उठता है।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

कोयल का विराम

कोयल का विराम

कोयल के गीतों के बीच
एक पल का मौन उतर आया।
अनसुने संगीत की तरह
सारा वन प्रतीक्षा में ठहर गया।

पत्ते निःशब्द खड़े रहे,
हवा भी धीरे से मुड़ गई।
आने वाले स्वर की प्रतीक्षा में
भोर ने भी कान लगा दिए।

वह अनगाया हुआ क्षण
गीत से भी अधिक मधुर था।
मौन की गहराई में छिपकर
अगली धुन जन्म ले रही थी।

तभी समझ आया—
संगीत को केवल स्वर नहीं चाहिए,
हृदय को छूने के लिए
कभी-कभी एक विराम भी चाहिए।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

उँगलियों के बीच का समय

उँगलियों के बीच का समय

उँगलियों के बीच से
पानी-सा समय बहता गया।
जब उसे थामने की कोशिश की,
हथेलियों में केवल यादें रह गईं।

एक पल मुस्कान बन गया,
दूसरा आँसू में ढल गया।
बीते समय के पदचिह्न
हृदय पर अंकित रह गए।

जो कुछ लौटाया नहीं जा सकता था,
वह चुपचाप दूर होता गया।
आने वाले पल ही
द्वार पर प्रतीक्षा करते रहे।

तभी जाना—
समय हमसे दूर नहीं जा रहा,
हर बीतता हुआ क्षण
हमारे भीतर एक जीवन रच रहा है।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

कागज़ की नाव

कागज़ की नाव

बरसाती जलधारा में धीरे-धीरे
कागज़ की नाव बहती चली गई।
किनारे खड़ा एक बालमन
दूर के क्षितिज निहारता रहा।

कागज़ की छोटी-सी तह में
एक लंबी यात्रा छिपी थी।
लहरों की भाषा जाने बिना
उसने धारा पर विश्वास किया और बहती रही।

जब किनारे पीछे छूट गए,
मन फिर लौटना नहीं चाहता था।
सपनों के पंख भले न हों,
फिर भी उनमें आगे बढ़ने का साहस था।

अंततः भीगकर मिट गई वह,
फिर भी यात्रा व्यर्थ नहीं थी।
जिन-जिन लहरों को उसने छुआ,
उनमें एक सपना जीवित रह गया।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

धूल का ब्रह्मांड

धूल का ब्रह्मांड

धूल के एक कण में भी
समय की कहानी बसी थी;
अनदेखे संसारों को सँजोए
वह हवा के संग बहता रहा।

उसमें मिट्टी की सुगंध थी,
बीज का मौन स्वप्न भी;
कहीं तारों की धूल-सा
सृष्टि का रहस्य झिलमिला उठा।

हथेली से छुआ तो जाना—
कुछ भी वास्तव में छोटा नहीं;
अणु जितनी सूक्ष्म दुनिया में भी
पूरा ब्रह्मांड साँस लेता है।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अक्षरों के सिलसिल (गज़ल)

अक्षरों के सिलसिल (गज़ल)
एक ख़त और लिख दूँ, यही दिल का ख़याल रह गया,
जो कहना था तुमसे, वही बनकर सवाल रह गया।

तन्हाइयों की राहों में लिखता रहा तुझे,
हर अक्षर में छुपा हुआ दिल का मलाल रह गया।

गुज़रे हुए लम्हों की आहट मिली कभी,
मुड़कर जो देखा, बस तेरा ही ख़याल रह गया।

सूखे हुए पत्तों की तरह शाम ढल गई,
भीगी हुई यादों में बीता हुआ हाल रह गया।

चुपचाप मेरी आँख से आँसू निकल पड़े,
लब पर न आ सकी जो, वो बात कमाल रह गया।

जिन राहों पर कभी तेरे संग चला था मैं,
उन राहों में आज भी अपना सा विसाल रह गया।

वक़्तों ने मुझसे छीन लिए कितने ही ख़्वाब मगर,
तेरी यादों का दिल में अजब सा बहाल रह गया।

कितनी ही बातें थीं जो तुमसे कह न सका मैं,
होंठों पे ख़ामोशी थी, आँखों में मलाल रह गया।

तेरे आँसुओं में भीगी हुई वे बातें आज तक,
मेरी रूह की धड़कन में बनकर सवाल रह गया।

सोचा था भूल जाऊँगा तुझे उम्र के साथ मैं,
लेकिन तेरी यादों का मौसम बहाल रह गया।

‘जी आर’ ने अक्षरों में अपना दर्द लिख दिया,
जो दिल से निकल गया, वही उसका कमाल रह गया।

जी आर कवियुर 
10 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

Sunday, August 9, 2026

तेरे मेरे दिल का तराना | നിന്റെ എന്റെ ഹൃദയത്തിൻ താളം

तेरे मेरे दिल का तराना | നിന്റെ എന്റെ ഹൃദയത്തിൻ താളം
A Bilingual Hindustani–Malayalam Ghazal
तेरे मेरे दिल का तराना बरसे,
तनम तनम का फ़साना बरसे।

നിന്റെ എന്റെ ഹൃദയത്തിൻ താളം പെയ്യുന്നു,
തനം തനം എന്നൊരു കാവ്യം പെയ്യുന്നു.

चाँदनी रातों में ख़्वाबों का बहाना बरसे,
तेरी यादों का कोई अफ़साना बरसे।

നിലാവിൻ രാവിൽ സ്വപ്നത്തിൻ മധുരം പെയ്യുന്നു,
നിന്റെ ഓർമ്മകളിൽ പ്രണയത്തിൻ കാവ്യം പെയ്യുന്നു.


सूनी राहों पे तेरी आहटें गूँजें,
मेरे होठों पे नया तराना बरसे।

ശൂന്യമായ വഴികളിൽ നിൻ കാൽച്ചുവടുകൾ മുഴങ്ങുന്നു,
എൻ ചുണ്ടുകളിൽ പുതുമയൊരു ഗാനം പെയ്യുന്നു.


भीगी पलकों में छुपे दर्द को छूकर,
तेरे प्यार का मीठा ज़माना बरसे।

നനഞ്ഞ മിഴികളിൽ ഒളിച്ച വേദനയെ തൊട്ട്,
നിൻ സ്നേഹത്തിൻ മധുരകാലം പെയ്യുന്നു.


रूह की गहराई में जब तू उतर जाए,
हर धड़कन में तेरा अफ़साना बरसे।

ആത്മാവിൻ ആഴങ്ങളിൽ നീയിറങ്ങുമ്പോൾ,
ഓരോ ഹൃദയമിടിപ്പിലും നിൻ കാവ്യം പെയ്യുന്നു.


दूरियों की ये दीवारें पिघल जाएँ,
मिलन का कोई ख़ूबसूरत बहाना बरसे।

അകലത്തിൻ മതിലുകളെല്ലാം അലിഞ്ഞുപോകുമ്പോൾ,
മിലനത്തിനൊരു മനോഹര നിമിത്തം പെയ്യുന്നു.


साँस-साँस में तेरी ख़ुशबू महकती रहे,
दिल की दुनिया में रंगीन ज़माना बरसे।

ശ്വാസംതോറും നിൻ സുഗന്ധം നിറഞ്ഞുനിൽക്കുമ്പോൾ,
ഹൃദയലോകത്ത് വർണ്ണമാർന്ന കാലം പെയ്യുന്നു.


तेरे नाम से रोशन हो मेरी हर शाम,
मेरी तन्हाई में तेरा तराना बरसे।

നിൻ നാമത്താൽ എൻ സന്ധ്യകൾ പ്രകാശിക്കുമ്പോൾ,
എൻ ഏകാന്തതയിൽ നിൻ ഗാനം പെയ്യുന്നു.

GR kaviyoor 
09 08 2026
( Thiruvalla, kaviyoor)

മുറിഞ്ഞ നാവുകൾ | कटी हुई ज़ुबानेंA Bilingual Hindustani GhazalBy GR kaviyoor

മുറിഞ്ഞ നാവുകൾ | कटी हुई ज़ुबानें
A Bilingual Hindustani Ghazal
By GR kaviyoor 
सत्यवक्ता आज यहाँ लांछित कहलाते हैं,
मौन धारण करने वाले पूजित कहलाते हैं।

സ്വാർത്ഥത്തിന്റെ വഴികളിൽ പലരും മുന്നേറിക്കൊണ്ടിരിക്കുന്നു,
സത്യത്തിന്റെ പാതയിലുള്ളവർ മുറിക്കപ്പെട്ട എന്നു തോന്നുന്നു.

झूठों का अभिनंदन होता, वे पूजित कहलाते हैं,
सत्य कहने वाले प्रायः वर्जित कहलाते हैं।

മനസ്സാക്ഷി കാത്തു നടന്നവർ ഏകാന്തരായി മാറുന്നു,
മുഖംമൂടി ധരിച്ച മനുഷ്യർ വാഴ്ത്തപ്പെട്ട എന്നു തോന്നുന്നു.

भय के आगे शीश झुकाने वाले पूजित कहलाते हैं,
अडिग रहकर सत्य निभाने वाले लांछित कहलाते हैं।

ചോദ്യങ്ങൾ ചോദിച്ച ശബ്ദങ്ങൾ കാലത്തിനോട് പൊരുതുന്നു,
നിശ്ശബ്ദരായവർ മാത്രം വാഴ്ത്തപ്പെട്ട എന്നു തോന്നുന്നു.

समय सदा परिवर्तन लाता, मिथ्या पराजित कहलाते हैं,
सत्य-दीप जलाने वाले वंदित कहलाते हैं।

കാലം നിശ്ശബ്ദ സാക്ഷിയായി കടന്നുപോകുന്നു,
കള്ളത്തിന്റെ കൊട്ടാരങ്ങൾ മറക്കപ്പെട്ട എന്നു തോന്നുന്നു.

जी आर, मत सत्य छोड़ना, चाहे लांछित कहलाते हैं,
काल स्वयं फिर सत्य-पथिक को पूजित कहलाते हैं।

ജി ആർ, സത്യവിളക്ക് കെടുത്താൻ കാലത്തിനും കഴിയുകയില്ല,
കാലം വിധി പറഞ്ഞശേഷം സത്യം വാഴ്ത്തപ്പെട്ട എന്നു തോന്നുന്നു.

नैना मिला के देख | കണ്ണിൽ നോക്കൂA Bilingual Romantic Ghazal (Hindi • Malayalam) By GR kaviyoor

नैना मिला के देख | കണ്ണിൽ നോക്കൂ
A Bilingual Romantic Ghazal (Hindi • Malayalam) By GR kaviyoor 

[Raga: Mishra Peelu]
[Taal: Dadra (6 Matra) – Slow / Medium Slow]
[Mood: Romantic • Intimate • Conversational • Light Classical]


नैना मिला के देख,
इश्क़ का हाल देख।

കണ്ണിൽ നോക്കൂ,
പ്രണയകാലം നോക്കൂ.

दिल की सदा सुन ले,
उसका कमाल देख।

ഹൃദയം തുറന്നാൽ,
മനസ്സിൻ ജാലം നോക്കൂ.

ख़ामोशियाँ भी पूछें,
दिल का सवाल देख।

ചിരിയിൽ മറഞ്ഞ,
മുഖത്തിന്റെ കോലം നോക്കൂ.

बिछड़े हुए लम्हों का,
बाकी मलाल देख।

മൗനം പറഞ്ഞാൽ,
ജീവന്റെ താളം നോക്കൂ.

दिल में उतर के देख,
उल्फ़त का जमाल देख।

അരികിൽ വന്നാൽ,
ഹൃദയം വിശാലം നോക്കൂ.

कहता है 'जी आर',
रूह का विसाल देख।

'ജി ആർ' പറയുന്നത്,
പ്രണയജാലം നോക്കൂ.

06 08 2026
( Thiruvalla, kaviyoor)

मिट्टी की सोंधी खुशबू का मार्ग

मिट्टी की सोंधी खुशबू का मार्ग

पहली वर्षा की सोंधी खुशबू
जब धीरे से धरती में जागी,
भूले हुए दिनों की
पदचाप फिर लौट आई।

हवा के हाथों पर सवार
यादें मुस्कान बनकर खिल उठीं।
अनदेखे रास्तों से
मन अपने घर लौट चला।

बारिश धरती पर नहीं,
भीतर की सूखी धरती पर बरसी।
एक छोटी-सी खुशबू में ही
जीवन फिर से खिल उठा।

जी आर कवियुर 
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

जड़ों की प्रार्थना

जड़ों की प्रार्थना

जड़ों ने धरती को थामे रखा,
मौन में प्रार्थना करती रहीं।
अनदेखे मार्गों से होकर
वे जीवन की धार खोजती रहीं।

जब शाखाएँ आकाश की ओर बढ़ीं,
नींव और गहराई में उतरती गई।
अनकहे त्याग
हरियाली बनकर खिल उठे।

आशीर्वाद उस वृक्ष को नहीं मिला
जो केवल ऊँचाई चाहता था,
बल्कि उन जड़ों को मिला
जो गहराई की खोज में थीं—
विनम्रता ही विकास की प्रार्थना है।

जी आर कवियुर 
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

नीलेपन की गहराई

नीलेपन की गहराई

नीलेपन की गहराइयों में
मौन लहरों-सा बहता रहा।
बादलों से अछूता विस्तार
अनंत की तरह फैलता गया।

आँखों की देखी दूरियों से कहीं आगे
हृदय अपनी यात्रा पर निकल पड़ा।
अनकहे स्वप्न
प्रकाश बनकर खिल उठे।

मैंने आकाश को नहीं,
अपने ही अंतर्मन की विशालता को मापा।
जिस क्षण मैंने गहराई को खोजा,
सारी सीमाएँ विलीन हो गईं।

जी आर कवियुर 
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

वह पंख जिसने कभी उड़ान नहीं भरी

वह पंख जिसने कभी उड़ान नहीं भरी

जिस पंख ने कभी उड़ान नहीं भरी,
उसने भी आकाश का स्वप्न देखा।
हवा के मौन निमंत्रण पर
आशा धीरे-धीरे जाग उठी।

डाली की स्नेहमयी छाया में
साहस चुपचाप खिलता रहा।
गिर जाने के भय से बड़ा
उड़ने का विश्वास था।

पहली उड़ान शुरू हुई
आकाश की ओर नहीं, भीतर की ओर।
जिस क्षण मैंने स्वयं पर विश्वास किया,
नई दिशाएँ उजागर हो उठीं।

जी आर कवियुर 
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

धरती की नाड़ी

धरती की नाड़ी

धरती की नाड़ी
वर्षा की बूँदों में धीरे-धीरे धड़क उठी।
मौन प्रार्थनाओं की तरह
जड़ें गहराइयों की ओर उतरती रहीं।

बीज अँधेरे में ठहरे थे,
फिर भी प्रकाश का स्वप्न सँजोए हुए।
अदृश्य विकास का गीत
धरती ने अपने हृदय में संजो रखा था।

हमने केवल मिट्टी को नहीं,
जीवन की धड़कन को छुआ।
जिस क्षण जड़ों ने गहराई को अपनाया,
आकाश और निकट आ गया।

जी आर कवियुर 
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Wednesday, August 5, 2026

Kudrat Ki Azaadi / कुदरत की आज़ादी - Prakruthithan Swathantryam / പ്രകൃതിതൻ സ്വാതന്ത്ര്യംBilungal gazhal by GR kaviyoor

Kudrat Ki Azaadi / कुदरत की आज़ादी - Prakruthithan Swathantryam / പ്രകൃതിതൻ സ്വാതന്ത്ര്യം
Bilungal gazhal by GR kaviyoor 
पवन में आज बहते रूप पावन को देखा,
प्रकृति के इस मचलते रूप सावन को देखा।

സ്വതന്ത്രമായി വീശുമീ തണുത്ത കാറ്റിൽ കണ്ടു ഞാൻ,
പ്രകൃതി തൻ വസന്ത ഭംഗി ഈ നാട്ടിൽ കണ്ടു ഞാൻ.

नदी की धार बहती है बिना रोक और टोके,
सदा बहते हुए इस रूप मनभावन को देखा।

തടസ്സങ്ങളില്ലാതെ ഒഴുകും പുഴകളെ നോക്കി നിൽക്കവേ,
അതിരുകൾ മായും കാടിന്റെ പാട്ടിൽ കണ്ടു ഞാൻ.

गगन में पंख फैलाए विहग उड़ते हैं निर्भय,
उन्मुक्त गगन में बहते इस नए जीवन को देखा।

അതിരുകളില്ലാത്ത നീലവാനിൽ പറക്കും പക്ഷികളെ,
സ്വതന്ത്രമായി ജീവിക്കും കൂട്ടിൽ കണ്ടു ഞാൻ.

दिशाएँ गा रही हैं गीत अपनी ही मगन में,
धरा पर गूँजते इस मधुर गावन को देखा।

മനോഹരമായ പൂക്കൾ പുഞ്ചിരിക്കും താഴ്‌വരകളിൽ,
തണൽ വിരിക്കും മരങ്ങളുടെ ചോട്ടിൽ കണ്ടു ഞാൻ.

नहीं है सरहदों का डर न बंधनों की चिंता,
हृदय में बस रहे इस सत्य सुहावन को देखा।

ബന്ധനങ്ങളേതുമില്ലാത്ത സുവർണ്ണ പ്രഭാതത്തിൽ,
പ്രകൃതി ചൊരിയും സന്തോഷത്തിന്റെ നാളിൽ കണ്ടു ഞാൻ.

बहते झरनों की गूँजती रागिनी के सुरों में,
बहती हवाओं के इस मीठे भावन को देखा।

വിജനമായ താഴ്‌വരകളിൽ പെയ്യുന്ന മഴത്തുള്ളികളിൽ,
ശാന്തമായി ഒഴുകും കുളിർകാറ്റിൽ കണ്ടു ഞാൻ.

प्रकृति के इस मुक्त आँगन में खड़े होकर 'जी आर',
प्रभु की कृपा का अनुपम ये छावन को देखा।

ഈ പ്രകൃതിതൻ നിർമ്മല ഭംഗിയിൽ 'ജി ആർ' എപ്പോഴും,
സൃഷ്ടാവിന്റെ അനുഗ്രഹത്തെ ഈ കാട്ടിൽ കണ്ടു ഞാൻ.

Monday, August 3, 2026

राख के नीचे की ऊष्मा

राख के नीचे की ऊष्मा

जब लपटें रात में शांत हो गईं,
राख मौन प्रतीक्षा करती रही।
जिस अग्नि को बुझा हुआ समझा गया,
उसकी साँस अब भी भीतर जीवित थी।

हानि की लंबी राहों पर
आशा कभी नहीं डगमगाई।
जहाँ पीड़ा राख बनकर बिखरी,
वहीं जीवन फिर अंकुरित होना चाहता था।

समय ने धीरे से कहा—
अंत वास्तव में अंत नहीं होता।
कभी-कभी एक छोटा-सा स्पर्श ही
प्रकाश को फिर जन्म देने के लिए पर्याप्त होता है।


जी आर कवियुर 
30 07 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Sunday, August 2, 2026

द्विभाषी ग़ज़ल | ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ

द्विभाषी ग़ज़ल | ദ്വിഭാഷാ ഗസൽ

हम एक सपना ढूँढते रहे,
सच की गहराई ढूँढते रहे।

ഞങ്ങൾ ഒരു സ്വപ്നം തേടിക്കൊണ്ടിരുന്നു,
സത്യത്തിന്റെ അഗാധത തേടിക്കൊണ്ടിരുന്നു.

दिल ने एक राह चुनी,
मन भी ढूँढते रहे।

ഹൃദയം ഒരു പാത തിരഞ്ഞു,
മനസ്സും തേടിക്കൊണ്ടിരുന്നു.

वक़्त की पगडंडियाँ पार करते गए,
काव्य भी ढूँढते रहे।

കാലത്തിന്റെ കൈവഴികൾ കടന്നുപോയി,
കാവ്യവും തേടിക്കൊണ്ടിരുന്നു.

ख़ामोशी के सारे परदे हटते गए,
साँझ भी ढूँढते रहे।

മൗനത്തിന്റെ മറവുകൾ നീങ്ങിപ്പോയി,
സന്ധ്യയും തേടിക്കൊണ്ടിരുന്നു.

ख़्वाबों की सीढ़ियों से आगे बढ़ते गए,
कल भी ढूँढते रहे।

കനവുകളുടെ പടവുകളിൽ നിന്ന് മുന്നേറി,
നാളും തേടിക്കൊണ്ടിരുന്നു.

'जी आर' लफ़्ज़ों में ज़िंदगी लिखते रहे,
यादें भी ढूँढते रहे।

'ജി ആർ' വരികളിൽ ജീവിതം കുറിച്ചിട്ടും,
ഓർമ്മയും തേടിക്കൊണ്ടിരുന്നു.

Saturday, August 1, 2026

घंटी की प्रतिध्वनि


घंटी की प्रतिध्वनि

जब मंदिर की घंटी बजी,
भोर ने धीरे से आँखें खोलीं।
हवा के पंखों पर सवार
उसकी ध्वनि दूर तक बहती चली गई।

ध्वनि के शांत हो जाने पर भी
उसकी स्पंदन भीतर जीवित रही।
मौन की गहराइयों में
एक प्रार्थना फूल बनकर खिल उठी।

गूँजी केवल घंटी नहीं,
जागा तो मन था।
एक छोटी-सी ध्वनि में ही
अनंत का प्रकाश प्रकट हुआ।

जी आर कवियुर 
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

हवा की उँगलियाँ


हवा की उँगलियाँ

हवा की उँगलियों ने
धीरे से पत्तों को छू लिया।
पेड़ों ने अपने मौन गीत
आकाश की ओर उठा दिए।

जैसे कोई अनछुआ प्रेम,
सुगंध अपना मार्ग खोज लाई।
अनदेखे स्पर्श की भाषा
हृदय में फूल बनकर खिल उठी।

जिसे बाँधकर रखना चाहा,
समय चुपचाप ले गया।
केवल बाँटे हुए क्षण ही
अनंत में फूल बनकर रह गए।

जी आर कवियुर 
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

धुंध की साँस

धुंध की साँस

जब भोर ने अपनी आँखें खोलीं,
धुंध धीमे से मुस्कराई।
पेड़ों के अनकहे रहस्य
उसकी शीतल गोद में ठहरे रहे।

अनदेखे रास्तों से भी
यात्रा चुपचाप चलती रही।
जिसे संशय ने दृष्टि से छिपा दिया था,
विश्वास ने धीरे-धीरे उजागर कर दिया।

धुंध छिपाना नहीं,
मन की धैर्य-भरी साँस है।
जिस क्षण मैंने प्रतीक्षा करना सीखा,
दूर के क्षितिज स्पष्ट हो उठे।

जी आर कवियुर 
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

दीपक की छाया

दीपक की छाया

एक दीपक मौन जलता रहा,
अँधेरे से उसने कुछ न कहा।
बाती पर थिरकी छोटी-सी लौ
चारों ओर आशा बिखेरती रही।

छाया पीछे चलती रही,
प्रकाश आगे राह बनाता गया।
जलते रहने के उस त्याग में
जीवन ने अपना अर्थ पाया।

जिस क्षण वह स्वयं पिघल गया,
दूसरों के लिए प्रभात जन्मा।
प्रकाश की मौन भाषा को
प्रतीक्षारत हृदय पढ़ते रहे।

जी आर कवियुर 
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

इंद्रधनुष के उस पार

इंद्रधनुष के उस पार

जब वर्षा की बूँद ने
प्रकाश को छू लिया,
सातों रंग खिल उठे,
आकाश की मौन मुस्कान में
एक नया स्वप्न जन्म लेने लगा।

जो सौंदर्य छूना संभव न था,
वही हृदय के सबसे निकट आ गया।
दूरी तो केवल आँखों का भ्रम थी,
प्रेम हर सीमा को पार बहता रहा।

चमत्कार इंद्रधनुष के उस पार नहीं था,
वह तो यहीं प्रतीक्षा कर रहा था।
विश्वास के एक छोटे-से कदम से
जीवन रंगों में खिल उठा।

जी आर कवियुर 
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

इश्क़ की राहें | പ്രണയത്തിന്റെ വഴികൾBilungal gazhal by GR kaviyoor

इश्क़ की राहें | പ്രണയത്തിന്റെ വഴികൾ
Bilungal gazhal by GR kaviyoor 
हमें इश्क़ इस तरह भा गया है,
कि हर एक दिल को छूता गया है।

മിഴികൾ നിന്നെ തേടി വന്നു,
മൗനം പ്രണയം പാടി വന്നു.

ग़मों का धुआँ दिल पे छा गया है,
मगर इक उजाला भी आ गया है।

മേഘങ്ങൾ വേദന മൂടി വന്നു,
മിന്നൽ പ്രതീക്ഷയോടെ ഓടി വന്നു.


तेरी याद फिर दिल को छूने लगी,
हर इक गीत होठों पे आ गया है।

ഓർമ്മകൾ മനസ്സിനെ തേടി വന്നു,
കവിതകൾ ഹൃദയം പാടി വന്നു.


सवेरा सुनहरी किरण लेके आया,
उम्मीदों का मौसम भी छा गया है।

പുലരി പൊൻകിരണം ചൂടി വന്നു,
പുതിയൊരു പ്രത്യാശ കൂടി വന്നു.


विरह की घटा दिल पे छा गई थी,
मिलन का सुनहरा समाँ आ गया है।

വിരഹം മിഴികളെ മൂടി വന്നു,
പുഞ്ചിരി സ്വപ്നങ്ങളെ ചൂടി വന്നു.

ज़माने ने मरहम भी दिल पर रखा,
मोहब्बत का रिश्ता निभा गया है।

കാലങ്ങൾ മുറിവുകൾ മൂടി വന്നു,
സ്നേഹം ജീവിതം കൂടി വന്നു.

'जी आर' ने जब दिल का दर खोला,
तो हर लफ़्ज़ नग़्मा बना गया है।

'ജി ആർ' ഹൃദയം തുറന്ന നേരം,
കവിത എന്നെ തേടി വന്നു.