जब एक बारिश की बूँद
पत्ती की नोक पर काँप रही थी,
उसके पारदर्शी हृदय में
एक नीला आकाश झिलमिला रहा था।
बादलों के गुज़र जाने के रास्ते,
उड़ चुके पंछियों की परछाइयाँ,
और दूर कहीं सूरज की मुस्कान—
सब कुछ उस छोटी-सी बूँद में समाया था।
उसे छोटा समझकर
किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया;
लेकिन उसके भीतर छिपी थी
एक पूरी दुनिया।
जब वह धरती पर गिरी,
तो स्वयं को खोया नहीं—
वह एक बीज का सपना बन गई,
और नई हरियाली को जीवन दे गई।
बूँद ने कहा—
“मेरे छोटे होने के कारण
मेरे आकाश को छोटा मत समझना;
एक बूँद के भीतर भी
पूरा ब्रह्मांड छिपा हो सकता है।”
और इस तरह एक बारिश की बूँद में
आकाश ने स्वयं धरती को छू लिया—
चुपचाप यह समझाते हुए कि
छोटी-सी चीज़ के भीतर भी
एक विशाल संसार जीवित हो सकता है।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर