Saturday, August 1, 2026

घंटी की प्रतिध्वनि


घंटी की प्रतिध्वनि

जब मंदिर की घंटी बजी,
भोर ने धीरे से आँखें खोलीं।
हवा के पंखों पर सवार
उसकी ध्वनि दूर तक बहती चली गई।

ध्वनि के शांत हो जाने पर भी
उसकी स्पंदन भीतर जीवित रही।
मौन की गहराइयों में
एक प्रार्थना फूल बनकर खिल उठी।

गूँजी केवल घंटी नहीं,
जागा तो मन था।
एक छोटी-सी ध्वनि में ही
अनंत का प्रकाश प्रकट हुआ।

जी आर कवियुर 
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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