पहली वर्षा की सोंधी खुशबू
जब धीरे से धरती में जागी,
भूले हुए दिनों की
पदचाप फिर लौट आई।
हवा के हाथों पर सवार
यादें मुस्कान बनकर खिल उठीं।
अनदेखे रास्तों से
मन अपने घर लौट चला।
बारिश धरती पर नहीं,
भीतर की सूखी धरती पर बरसी।
एक छोटी-सी खुशबू में ही
जीवन फिर से खिल उठा।
जी आर कवियुर
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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