पुरानी पेड़ की डाल पर
बस एक घोंसला झूल रहा था,
जो सुबहें कभी गीतों से गूंजती थीं,
अब केवल हवा में सुनाई देती थीं।
कभी पंखों की फड़फड़ाहट से भरा
वह छोटा-सा आशियाना,
आज खामोश था,
फिर भी वहाँ यादें कभी सोई नहीं थीं।
जहाँ से बच्चे उड़ चले थे,
उस राह में आकाश बहुत विशाल था,
माँ-पक्षी की प्रतीक्षा में
बस प्रेम ही था, जो कभी छोटा नहीं हुआ।
वह खाली घोंसला कह रहा था—
बिछड़ना शून्यता नहीं है;
यह वही प्रेम है, जिसने उड़ना सिखाया,
और अंततः वही प्रेम
सबसे बड़ा घोंसला बन जाता है।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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