तपती रेत के विस्तार के बीच,
जहाँ गर्मी की साँस बसी थी,
एक दिन अचानक
आकाश ने एक बूँद उपहार में दी।
प्यासी रेत की लहरों ने
उसे हथेलियों की तरह थाम लिया।
एक सूखे हुए बीज के भीतर
एक नया स्वप्न जाग उठा।
वह केवल एक बूँद थी,
फिर भी छोटी नहीं थी;
मरुस्थल की निस्तब्धता में
वह जीवन का पहला शब्द बन गई।
बारिश फिर लौटकर न आई,
फिर भी आशा वहाँ नहीं मिटी।
उस एक बूँद ने सिखाया—
बंजर भूमि में भी वसंत जन्म ले सकता है।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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