उँगलियों के बीच से
पानी-सा समय बहता गया।
जब उसे थामने की कोशिश की,
हथेलियों में केवल यादें रह गईं।
एक पल मुस्कान बन गया,
दूसरा आँसू में ढल गया।
बीते समय के पदचिह्न
हृदय पर अंकित रह गए।
जो कुछ लौटाया नहीं जा सकता था,
वह चुपचाप दूर होता गया।
आने वाले पल ही
द्वार पर प्रतीक्षा करते रहे।
तभी जाना—
समय हमसे दूर नहीं जा रहा,
हर बीतता हुआ क्षण
हमारे भीतर एक जीवन रच रहा है।
जी आर कवियुर
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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