नदी का जन्म
कहीं पर्वत के हृदय में
एक बूँद पिघलकर उतर आई।
चट्टानों की सँकरी राहों से
वह नई दिशा खोजती चली।
जिसे कोई सुन न सका,
उस स्वर में उसने धरती से कहा;
एक छोटी धारा बनकर जन्मी
और दूर की घाटियों का स्वप्न देखा।
राह में मिले पत्थरों को
उसने टाला नहीं, उन्हें छूकर बहती रही।
एक छोटी-सी जलधारा भी
अपना लक्ष्य नहीं भूली।
अंततः जब कई धाराएँ मिलकर
एक नदी बन गईं,
पर्वत की निस्तब्धता में जन्मी वह बूँद
दुःख के लवण-स्वाद से भरे
समुद्र की कहानी बन गई।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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