Sunday, August 16, 2026

नदी का जन्म


नदी का जन्म

कहीं पर्वत के हृदय में
एक बूँद पिघलकर उतर आई।
चट्टानों की सँकरी राहों से
वह नई दिशा खोजती चली।

जिसे कोई सुन न सका,
उस स्वर में उसने धरती से कहा;
एक छोटी धारा बनकर जन्मी
और दूर की घाटियों का स्वप्न देखा।

राह में मिले पत्थरों को
उसने टाला नहीं, उन्हें छूकर बहती रही।
एक छोटी-सी जलधारा भी
अपना लक्ष्य नहीं भूली।

अंततः जब कई धाराएँ मिलकर
एक नदी बन गईं,
पर्वत की निस्तब्धता में जन्मी वह बूँद
दुःख के लवण-स्वाद से भरे
समुद्र की कहानी बन गई।

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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