Tuesday, August 25, 2026

सोच के पार — एक रूहानी ग़ज़ल

सोच के पार — एक रूहानी ग़ज़ल
अब आ गया वो वक़्त, एक नज़र के पार
जब कोई हो गया इस क़दर के पार

तेरी ख़ामोशियों में छुपी थी एक ख़बर
मैं पढ़ता रहा तेरी आँखों की नज़र के पार

न कोई राह बची थी, न कोई रहगुज़र
तू साथ था तो आसान था हर सफ़र के पार

तेरे ख़याल ने ऐसा किया मुझ पर असर
कि भूल बैठा मैं दुनिया की हर ख़बर के पार

जहाँ ख़त्म हो गई थी मेरी सारी तलाश-ए-नज़र
वहीं मिल गया मुझे तेरा शहर के पार

नाप सकता नहीं कोई मोहब्बत की ये गहराई
ये दिल उतर गया तेरी नज़र के पार

जी आर, अब तो यही हाल है इस दिल का
वो ले गया मुझे अपनी नज़र के पार

रचनाकार
जी आर कवियुर 
22 08 2026

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