भोर की ओस की बूँदों में
हरियाली ने धीरे से आँखें खोलीं।
पत्तों की निःशब्द हलचल में
धरती ने साँस ली।
जिन राहों से होकर हवा गुज़री,
घास ने सिर झुका लिया।
एक नन्ही कोंपल की थरथराहट में भी
जीवन का संगीत सुनाई दिया।
धूप की तपिश के बीच भी
हरियाली ने आशा नहीं छोड़ी।
सूखी धरती की छाती पर
एक नई कोंपल जन्मी।
तभी समझ आया—
प्रकृति शब्दों में नहीं बोलती,
हरियाली की हर छटा में
जीवन की साँस बसी है।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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