जिस पंख ने कभी उड़ान नहीं भरी,
उसने भी आकाश का स्वप्न देखा।
हवा के मौन निमंत्रण पर
आशा धीरे-धीरे जाग उठी।
डाली की स्नेहमयी छाया में
साहस चुपचाप खिलता रहा।
गिर जाने के भय से बड़ा
उड़ने का विश्वास था।
पहली उड़ान शुरू हुई
आकाश की ओर नहीं, भीतर की ओर।
जिस क्षण मैंने स्वयं पर विश्वास किया,
नई दिशाएँ उजागर हो उठीं।
जी आर कवियुर
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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