धरती के भीतर छिपा हुआ
एक छोटा-सा बीज स्वप्न देखता रहा।
चारों ओर के अँधेरे से अधिक
उसे अपने भीतर के प्रकाश पर विश्वास था।
बंधन की चट्टानों के बीच भी
जड़ों ने अपना मार्ग खोज लिया।
ऊपर खुला हुआ आकाश
उसके स्वप्न का आह्वान बन गया।
जब वर्षा की एक बूँद ने छुआ,
सोया हुआ जीवन जाग उठा।
पहली हरियाली की पत्ती पर
भोर ने स्वतंत्रता लिख दी।
तब मानो धरती ने कहा—
स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं,
वह उस बीज का साहस है
जो स्वयं को चीरकर ऊपर उठता है।
जी आर कवियुर
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
No comments:
Post a Comment