तेरी पहली मुलाक़ात, आँखों से आँखें मिलीं,
दिल की ख़ामोश धड़कनों को जैसे राहें मिलीं।
तेरी नज़रों में जाने कैसी कशिश थी उस घड़ी,
बुझी-बुझी सी मेरी आँखों को फिर चाहें मिलीं।
तेरी बातों की महक अब तक बसी है साँस में,
सूने दिल को तेरी यादों की पनाहें मिलीं।
एक पल में उम्र भर का फ़ासला मिटता गया,
जब मेरी तन्हा डगर को तेरी बाहें मिलीं।
चाँद भी ठहरा हुआ था, रात भी मदहोश थी,
तेरी यादों से सजी कितनी ही शामें मिलीं।
“जी आर” उस पहली नज़र को भूल पाएगा कहाँ,
ज़िंदगी को जब तेरी चाहत की निगाहें मिलीं।
जी आर कवियुर
14 08 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)
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