धूल के एक कण में भी
समय की कहानी बसी थी;
अनदेखे संसारों को सँजोए
वह हवा के संग बहता रहा।
उसमें मिट्टी की सुगंध थी,
बीज का मौन स्वप्न भी;
कहीं तारों की धूल-सा
सृष्टि का रहस्य झिलमिला उठा।
हथेली से छुआ तो जाना—
कुछ भी वास्तव में छोटा नहीं;
अणु जितनी सूक्ष्म दुनिया में भी
पूरा ब्रह्मांड साँस लेता है।
जी आर कवियुर
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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