बरसाती जलधारा में धीरे-धीरे
कागज़ की नाव बहती चली गई।
किनारे खड़ा एक बालमन
दूर के क्षितिज निहारता रहा।
कागज़ की छोटी-सी तह में
एक लंबी यात्रा छिपी थी।
लहरों की भाषा जाने बिना
उसने धारा पर विश्वास किया और बहती रही।
जब किनारे पीछे छूट गए,
मन फिर लौटना नहीं चाहता था।
सपनों के पंख भले न हों,
फिर भी उनमें आगे बढ़ने का साहस था।
अंततः भीगकर मिट गई वह,
फिर भी यात्रा व्यर्थ नहीं थी।
जिन-जिन लहरों को उसने छुआ,
उनमें एक सपना जीवित रह गया।
जी आर कवियुर
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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