Friday, August 21, 2026

क्षितिज का निमंत्रण

क्षितिज का निमंत्रण

कहीं दूर उस मायावी छोर पर,
जहाँ आकाश और सागर एक हो जाते हैं,
संध्या के सुनहरे रंगों में सजा
क्षितिज मुझे पुकार रहा है।

दूरियों के पार उड़ने को आतुर
इस मन से वह धीरे से कहता है—
“आओ…”
और लहरें राह दिखाने लगती हैं।

डूबते सूरज की लालिमा में
जब एक नया सपना खिलता है,
हृदय बीते कल की राहों को पीछे छोड़कर
आने वाले कल की तलाश में चल पड़ता है।

क्षितिज ने कहा—
“मुझे छूने के लिए तुम्हें मेरे पास आने की आवश्यकता नहीं,
मेरी ओर बढ़ते हुए
बस अपने भीतर की सीमाओं को पार कर लेना।”

और यूँ दूर की एक रोशनी बनकर
क्षितिज सदा पुकारता रहता है—
यह याद दिलाते हुए कि
जहाँ सब कुछ समाप्त होता दिखाई देता है,
वहीं से एक नई यात्रा शुरू होती है। 

जी आर कवियुर 
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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