फूल से फूल तक उड़ती तितली
जब रंग बिखेरती चली गई,
घास की नन्ही-सी नोक पर
उसकी परछाईं चुपचाप ठहर गई।
उसे थामने बढ़ी उँगलियों से पहले
वह हवा में विलीन हो गई।
छू न सकने वाली उस सुंदरता का
बस एक क्षण शेष रह गया।
पंख दूर चले गए फिर भी
परछाईं वहाँ से मिट न सकी।
एक गुज़रता हुआ अस्तित्व
हृदय पर चित्र बनकर ठहर गया।
तभी समझ आया—
कुछ सुंदरताएँ पाने के लिए नहीं होतीं,
वे बिना छुए भी गुज़र जाएँ
तो हृदय में रंग भर जाती हैं।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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