Tuesday, August 11, 2026

अक्षरों के सिलसिल (गज़ल)

अक्षरों के सिलसिल (गज़ल)
एक ख़त और लिख दूँ, यही दिल का ख़याल रह गया,
जो कहना था तुमसे, वही बनकर सवाल रह गया।

तन्हाइयों की राहों में लिखता रहा तुझे,
हर अक्षर में छुपा हुआ दिल का मलाल रह गया।

गुज़रे हुए लम्हों की आहट मिली कभी,
मुड़कर जो देखा, बस तेरा ही ख़याल रह गया।

सूखे हुए पत्तों की तरह शाम ढल गई,
भीगी हुई यादों में बीता हुआ हाल रह गया।

चुपचाप मेरी आँख से आँसू निकल पड़े,
लब पर न आ सकी जो, वो बात कमाल रह गया।

जिन राहों पर कभी तेरे संग चला था मैं,
उन राहों में आज भी अपना सा विसाल रह गया।

वक़्तों ने मुझसे छीन लिए कितने ही ख़्वाब मगर,
तेरी यादों का दिल में अजब सा बहाल रह गया।

कितनी ही बातें थीं जो तुमसे कह न सका मैं,
होंठों पे ख़ामोशी थी, आँखों में मलाल रह गया।

तेरे आँसुओं में भीगी हुई वे बातें आज तक,
मेरी रूह की धड़कन में बनकर सवाल रह गया।

सोचा था भूल जाऊँगा तुझे उम्र के साथ मैं,
लेकिन तेरी यादों का मौसम बहाल रह गया।

‘जी आर’ ने अक्षरों में अपना दर्द लिख दिया,
जो दिल से निकल गया, वही उसका कमाल रह गया।

जी आर कवियुर 
10 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

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