एक पल को घड़ी की सुइयाँ,
जैसे थमकर रह गईं,
समय के सारे हिसाब मिटे,
बस धड़कनें कुछ कह गईं।
बरसात के थम जाने पर,
पत्ती पर एक बूँद चमकी,
बीते दिनों की यादों में,
खामोशी कोई धुन बन गई।
बिछड़ी हुई राहों के पार,
एक स्नेह-स्पर्श रह गया,
धीरे-धीरे मिटते चेहरों में,
एक मुस्कान फिर भी चमकती रही।
रुकना जिसे कभी न आया,
वह समय आगे बढ़ता गया,
फिर भी जीवन के कुछ अनमोल पल,
दिल में सदा के लिए ठहर गए।
जी आर कवियुर
22 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)
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