जब भोर ने अपनी आँखें खोलीं,
धुंध धीमे से मुस्कराई।
पेड़ों के अनकहे रहस्य
उसकी शीतल गोद में ठहरे रहे।
अनदेखे रास्तों से भी
यात्रा चुपचाप चलती रही।
जिसे संशय ने दृष्टि से छिपा दिया था,
विश्वास ने धीरे-धीरे उजागर कर दिया।
धुंध छिपाना नहीं,
मन की धैर्य-भरी साँस है।
जिस क्षण मैंने प्रतीक्षा करना सीखा,
दूर के क्षितिज स्पष्ट हो उठे।
जी आर कवियुर
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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