धरती की नाड़ी
वर्षा की बूँदों में धीरे-धीरे धड़क उठी।
मौन प्रार्थनाओं की तरह
जड़ें गहराइयों की ओर उतरती रहीं।
बीज अँधेरे में ठहरे थे,
फिर भी प्रकाश का स्वप्न सँजोए हुए।
अदृश्य विकास का गीत
धरती ने अपने हृदय में संजो रखा था।
हमने केवल मिट्टी को नहीं,
जीवन की धड़कन को छुआ।
जिस क्षण जड़ों ने गहराई को अपनाया,
आकाश और निकट आ गया।
जी आर कवियुर
06 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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