Saturday, August 1, 2026

हवा की उँगलियाँ


हवा की उँगलियाँ

हवा की उँगलियों ने
धीरे से पत्तों को छू लिया।
पेड़ों ने अपने मौन गीत
आकाश की ओर उठा दिए।

जैसे कोई अनछुआ प्रेम,
सुगंध अपना मार्ग खोज लाई।
अनदेखे स्पर्श की भाषा
हृदय में फूल बनकर खिल उठी।

जिसे बाँधकर रखना चाहा,
समय चुपचाप ले गया।
केवल बाँटे हुए क्षण ही
अनंत में फूल बनकर रह गए।

जी आर कवियुर 
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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