Tuesday, August 25, 2026

राह पहचानती रोशनी

राह पहचानती रोशनी

अँधियारे से घिरी हुई राह पर,
दूर कहीं एक दीपक जल उठा,
थके हुए कदमों के पास आकर,
चुपचाप एक विश्वास जग उठा।

हवा ने आकर छूना चाहा,
बूँदों ने भी खूब सताया,
फिर भी वह लौ बुझ न सकी,
राहगीरों का साथ निभाया।

बिछड़ी हुई राहों के आगे,
एक किरण ने मोड़ दिखाया,
बिन कुछ बोले, बिन कुछ कहे,
अगला कदम कहाँ हो बताया।

टूटे सपनों के टुकड़ों में,
भोर के रंग उतरने लगे,
सूने पड़े उस जीवन-उपवन में,
फिर से कोमल फूल खिलने लगे।

खुद जलकर उस छोटी लौ ने,
चारों ओर उजियारा बाँटा,
अपना दर्द भुलाकर उसने,
दूसरों का सफर सँवारा।

जीवन की इस लंबी राह में,
जब थामने को हाथ न मिले,
नेकी की एक छोटी किरण ही,
इंसान को सवेरे तक ले चले।

जी आर कवियुर 
22 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)

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