माटी की गोद में जन्मा एक दिन,
साथ लिए बारिश की सौंधी खुशबू,
कुम्हार के हाथों आकार मिला,
घूमते चाक पर खिला एक सपना।
उँगलियों की ममता पाकर,
नरम मिट्टी में जीवन जागा,
अग्नि की तपिश से गुजरने पर,
नया सा साहस मन में जागा।
माँ की रसोई के एक कोने में,
घर के स्वाद सँभालता रहा,
धधकती चूल्हे की गर्मी के पास,
कितने भूखे मनों को तृप्त किया।
समय बदला, बर्तन भी बदले,
रसोई का रूप भी बदल गया,
फिर भी मिट्टी की उस सौंधी खुशबू-सा,
वह बीता कल दिल में रह गया।
टूटकर भी मिट्टी में मिल जाएगा,
जहाँ से इसकी शुरुआत हुई,
अग्नि में तपे इस जीवन ने,
बस प्रेम की एक धुन छोड़ दी।
इंसान भी तो मिट्टी का बेटा है,
अंततः मिट्टी में लौट जाना है,
अहंकार सभी यहीं छोड़कर,
माटी की गोद में समा जाना है।
रचनाकार
जी आर कवियुर
22 08 2026
(तिरुवल्ला, कवियुर)
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